भारत नाम पड़ने की कहानी

भारत नाम पड़ने की कहानी

देवदत्त पटनायक

हज़ारों वर्षों तक भारत को एशिया भर में अनेक नामों से जाना जाता रहा, और हर नाम व्यापार मार्गों, राजनीतिक संपर्कों और सांस्कृतिक कल्पना को दर्शाता था। इनमें से अधिकांश नाम अंततः सिंधु नदी से निकले, जो उपमहाद्वीप की उत्तर-पश्चिमी सीमा थी।

प्राचीन फ़ारस में दारा प्रथम के ईसा पूर्व छठी शताब्दी के शिलालेखों में भारत को “हिन्दुश” कहा गया। पुरानी फ़ारसी में संस्कृत के “स” को नियमित रूप से “ह” में बदला जाता था, इसलिए “सिंधु” “हिन्दु” बन गया। आगे चलकर यह क्षेत्र केवल “हिन्द” कहलाने लगा, और फिर सल्तनत व मुग़ल दरबारों में “हिन्दुस्तान” के रूप में प्रसिद्ध हुआ। अरब लेखकों ने फ़ारसी रूप को अपनाकर इसे “अल-हिन्द” कहा। इस्लाम से बहुत पहले से अरब व्यापारी पश्चिमी भारत से व्यापार करते थे, और अल-बीरूनी जैसे विद्वानों ने इसी नाम से भारत का विस्तृत वर्णन किया। “सिन्द” विशेष रूप से सिंध क्षेत्र को दर्शाता था, जबकि “अल-हिन्द” हिन्द महासागर के पार फैले व्यापक भारतीय जगत् को।

चीनी यात्री भारत को कई नामों से जानते थे। हान काल के स्रोतों में “शेन्दु” शब्द मिलता है, जो संभवतः मध्य एशियाई उच्चारण के माध्यम से “सिंधु” से बना। ह्वेनसांग जैसे बौद्ध तीर्थयात्रियों ने “तियानझू” शब्द का प्रयोग किया, जो शास्त्रीय बौद्ध परंपरा में भारत का नाम बन गया। आधुनिक चीनी में “यिन्दू” शब्द प्रचलित है।

दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत को एक राजनीतिक क्षेत्र से अधिक एक पवित्र भूगोल के रूप में स्मरण किया जाता था। कंबोडिया, जावा, थाईलैंड और चम्पा ने भारत को उत्तर भारत के पवित्र परिदृश्य — हिमालय और गंगा — के माध्यम से देखा। संस्कृत शिलालेखों में “भारत” शब्द आता है, जो तीर्थयात्रा की उत्तरी भूमि का प्रतीक था। कंबोडिया के मंदिरों में मेरु पर्वत की प्रतिकृति बनी, और जलाशय गंगा के प्रतीक माने गए। यहाँ तक कि “मेकोंग” शब्द भी “मा गंगा” यानी “माता गंगा” से व्युत्पन्न माना जाता है।

वहीं समुद्री दक्षिण-पूर्व एशिया भारत को “कलिंग” के नाम से जानता था, जो ओडिशा और आंध्र से जुड़ा पूर्वी तट था। व्यापार और बौद्ध संपर्कों के माध्यम से “केलिंग” और “क्लिंग” जैसे रूप फैले, और जापानी स्मृति तक पहुँचे। इस प्रकार एशिया के बड़े भाग में उत्तर भारत को “भारत” — नदियों और पर्वतों की पवित्र भूमि — के रूप में याद किया गया, और प्रायद्वीपीय भारत को “कलिंग” — व्यापारियों, भिक्षुओं और नाविकों की भूमि — के रूप में।

कोरिया की भी अपनी स्मृति रही। हियो ह्वांग-ओक की कथा के अनुसार, “अयुता” नामक देश की एक राजकुमारी ने पहली शताब्दी ईस्वी में राजा सुरो से विवाह किया। आधुनिक राजनयिक परंपरा अयुता की पहचान अयोध्या से करती है, परंतु इतिहासकारों ने अन्य संभावनाएँ भी सुझाई हैं — थाईलैंड का अयुत्थया (जिसका नाम स्वयं अयोध्या से लिया गया), अथवा कावेरीपट्टिनम जैसे तमिल समुद्री केंद्र और पांड्य राज्य, जो हिन्द महासागरीय व्यापार से गहराई से जुड़े थे। यह कथा दर्शाती है कि भारत को एशिया भर में किसी राष्ट्र के रूप में नहीं, बल्कि महासागरों, तीर्थयात्रा और मिथक से बँधे एक पवित्र और वाणिज्यिक जगत् के रूप में याद किया जाता था। इन व्यापारियों के लिए ‘धम्मो सनंतनो’ का अर्थ है बौद्ध धर्म। देवदत्त पटनायक के फेसबुक वॉल से साभार 

लेखक – देवदत्त पटनायक

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