मुनाफे में लौटे IDBI बैंक का निजीकरण क्यों? ₹53 हजार करोड़ के सौदे के पीछे की कहानी

मुनाफे में लौटे IDBI बैंक का निजीकरण क्यों? ₹53 हजार करोड़ के सौदे के पीछे की कहानी

विश्लेषणात्मक रिपोर्ट | 15 अक्टूबर 2026

ओमप्रकाश तिवारी

 

IDBI बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। केंद्र सरकार की कैबिनेट समिति ने 14 अक्टूबर को कनाडा के फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की सहयोगी कंपनी को बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। सौदे की कीमत 52,878 करोड़ रुपये तय हुई है। इसके बाद केंद्र सरकार के पास 15 प्रतिशत और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी रह जाएगी।

The logo of IDBI Bank is seen on the facade of its headquarters in Mumbai, India, April 18, 2023. REUTERS/Niharika Kulkarni/File photo

यह सौदा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस बैंक को कभी गंभीर वित्तीय संकट से निकालने के लिए सरकार और LIC को पूंजी लगानी पड़ी थी, वह अब हजारों करोड़ रुपये का मुनाफा कमा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार बैंक बेचकर किस उद्देश्य को हासिल करना चाहती है? क्या यह घाटे से छुटकारा पाने का फैसला है या सरकारी क्षेत्र में कारोबार करने की नीति में बदलाव का हिस्सा?

संकट से मुनाफे तक का सफर

IDBI बैंक की वित्तीय स्थिति एक समय इतनी खराब हो गई थी कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को उसके कामकाज पर प्रतिबंध लगाने पड़े। 5 मई 2017 को बैंक को Prompt Corrective Action यानी PCA के दायरे में रखा गया। यह कदम बैंक के बढ़ते फंसे कर्ज और वित्तीय नुकसान के कारण उठाया गया था।

बैंक को संकट से निकालने के लिए पहले केंद्र सरकार और बाद में LIC ने पूंजी उपलब्ध कराई। जनवरी 2019 में LIC ने बैंक में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर नियंत्रणकारी हिस्सेदारी हासिल की। इसके बाद RBI ने IDBI बैंक को नियामकीय उद्देश्यों के लिए निजी क्षेत्र के बैंक के रूप में वर्गीकृत किया।

बैंक की स्थिति में सुधार के बाद RBI ने 10 मार्च 2021 को PCA संबंधी प्रतिबंध हटा दिए। उसी साल सरकार ने बैंक में रणनीतिक विनिवेश और प्रबंधन नियंत्रण हस्तांतरित करने की सैद्धांतिक मंजूरी दी। अक्टूबर 2022 में संभावित खरीदारों से रुचि पत्र आमंत्रित किए गए।

इस तरह निजीकरण की प्रक्रिया किसी एक दिन का फैसला नहीं, बल्कि कई वर्षों से चल रही कवायद का परिणाम है।

स्रोत: वित्त मंत्रालय की 14 अक्टूबर 2026 की प्रेस विज्ञप्ति और 2021 की कैबिनेट मंजूरी।

 

आज बैंक की वित्तीय स्थिति कैसी है?

IDBI बैंक के वित्त वर्ष 2025-26 के आधिकारिक वित्तीय परिणामों के अनुसार, बैंक ने 9,513 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया। वित्त वर्ष 2024-25 में यह 7,515 करोड़ रुपये था। सालाना आधार पर मुनाफे में लगभग 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

बैंक के कुछ प्रमुख आंकड़े इस प्रकार हैं:

* शुद्ध मुनाफा: 9,513 करोड़ रुपये।

* कुल कारोबार: 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक।

* सकल NPA: 2.32 प्रतिशत।

* शुद्ध NPA: 0.15 प्रतिशत।

* पूंजी पर्याप्तता अनुपात: 26.65 प्रतिशत।

ये आंकड़े बताते हैं कि बैंक अब उस वित्तीय संकट की स्थिति में नहीं है, जिसके कारण उसे कभी नियामकीय प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा था। फंसे कर्ज का अनुपात भी पहले की तुलना में काफी कम हुआ है।

हालांकि, मुनाफे में वृद्धि का अर्थ यह नहीं कि बैंक के सामने कोई चुनौती नहीं है। वित्त वर्ष 2025-26 में शुद्ध ब्याज आय 14,626 करोड़ रुपये से घटकर 13,512 करोड़ रुपये रह गई। इससे पता चलता है कि मुनाफे और मुख्य बैंकिंग आय के रुझानों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

स्रोत: IDBI बैंक के वित्त वर्ष 2025-26 के आधिकारिक वित्तीय परिणाम।

फिर सरकार बैंक क्यों बेच रही है?

सरकार की घोषित विनिवेश नीति का उद्देश्य केवल घाटे में चल रही कंपनियों को बेचना नहीं है। सरकार रणनीतिक विनिवेश के जरिए उन उपक्रमों से भी प्रबंधन नियंत्रण हटाना चाहती है, जिनमें निजी निवेशक पूंजी, तकनीक और प्रबंधन की नई व्यवस्था ला सकते हैं।

वित्त मंत्रालय ने IDBI बैंक के मामले में भी यही तर्क रखा है। सरकार का कहना है कि रणनीतिक खरीदार बैंक की कारोबारी क्षमता का बेहतर उपयोग कर सकता है और बैंक को भविष्य में सरकारी सहायता पर निर्भर रहने की जरूरत कम हो सकती है।

इस नीति का दूसरा पहलू सरकारी संसाधनों का उपयोग है। बैंक में अपनी हिस्सेदारी बेचकर केंद्र सरकार को राजस्व मिलेगा। यह रकम सरकारी वित्तीय व्यवस्था में आएगी और उसका उपयोग निर्धारित बजटीय प्रक्रियाओं के तहत किया जा सकेगा।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। बैंक की हिस्सेदारी बेचने से मिलने वाली रकम एकमुश्त होती है, जबकि बैंक भविष्य में भी मुनाफा कमा सकता है। इसलिए यह फैसला केवल तत्काल मिलने वाली राशि से नहीं, बल्कि बैंक के भविष्य के मूल्य और सार्वजनिक क्षेत्र में उसकी भूमिका के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।

₹52,878 करोड़ के सौदे में किसे कितनी रकम मिलेगी?

केंद्र सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी और LIC अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगी। दोनों की कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी का मूल्य 52,878.08 करोड़ रुपये तय हुआ है।

इस रकम का वितरण भी दोनों के बेचे गए शेयरों के अनुपात में होगा। इसलिए यह पूरी राशि केंद्र सरकार के खाते में नहीं जाएगी। LIC को भी अपने हिस्से की बिक्री से रकम मिलेगी।

सौदे के बाद केंद्र सरकार और LIC के पास संयुक्त रूप से 34 प्रतिशत हिस्सेदारी रहेगी, लेकिन बहुमत हिस्सेदारी और प्रबंधन नियंत्रण निजी खरीदार के पास जाने का प्रस्ताव है। वास्तविक हस्तांतरण के लिए RBI की नियामकीय प्रक्रिया सहित आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी।

क्या निजी प्रबंधन से बैंक बेहतर हो जाएगा?

यही इस सौदे का सबसे महत्वपूर्ण, लेकिन अभी अनुत्तरित सवाल है।

सरकार का तर्क है कि निजी निवेशक बेहतर प्रबंधन, तकनीक और पूंजी के माध्यम से बैंक की विकास क्षमता बढ़ा सकता है। यह एक संभावित लाभ है, लेकिन इसे पहले से सुनिश्चित परिणाम नहीं माना जा सकता।

दूसरी ओर, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केवल मुनाफा कमाने वाली संस्थाएं नहीं होते। उनसे वित्तीय समावेशन, छोटे कारोबारों को कर्ज देने, ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराने और सार्वजनिक नीतियों को लागू करने जैसी अपेक्षाएं भी जुड़ी होती हैं।

इसलिए यह देखना होगा कि निजीकरण के बाद IDBI बैंक अपनी शाखाओं, कर्मचारियों, ग्राहकों और छोटे कर्जदारों के प्रति क्या नीति अपनाता है। साथ ही, नियामकीय निगरानी और बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा की स्थिति भी महत्वपूर्ण होगी।

क्या सरकार को बैंक बेचने के बजाय उसे अपने पास रखना चाहिए था?

यह नीतिगत बहस है, जिसका जवाब केवल बैंक के मुनाफे से नहीं दिया जा सकता।

बैंक को संकट से निकालने में सार्वजनिक धन और LIC के संसाधनों की भूमिका रही। अब जब बैंक मुनाफे में है, तो उसकी भविष्य की कमाई और सार्वजनिक नियंत्रण बनाए रखने के संभावित लाभों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

इसके विपरीत, सरकार यह तर्क दे सकती है कि बैंक में निवेश और प्रबंधन की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र को सौंपने से सार्वजनिक संसाधनों को दूसरे कामों में लगाने की गुंजाइश बढ़ेगी। निजी निवेशक को नियंत्रण देने से प्रतिस्पर्धा और कारोबारी विस्तार को भी बढ़ावा मिल सकता है।

इन दोनों पक्षों का आकलन करने के लिए यह जानना जरूरी है कि सौदे की कीमत बैंक के दीर्घकालीन मूल्य के मुकाबले कितनी उचित है, भविष्य में कितना मुनाफा संभव है और निजीकरण से बैंकिंग सेवाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

निष्कर्ष: घाटे से छुटकारा नहीं, सरकारी नियंत्रण में बदलाव

IDBI बैंक का मामला सरकारी बैंक के घाटे से निकलने के बाद उसके भविष्य के स्वामित्व और नियंत्रण से जुड़ा है। वित्तीय आंकड़े बताते हैं कि बैंक की स्थिति में सुधार हुआ है और वह मुनाफा कमा रहा है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि सरकार केवल मौजूदा घाटे से छुटकारा पाने के लिए बैंक बेच रही है।

असल मुद्दा यह है कि सरकार बैंक का प्रबंधन नियंत्रण निजी निवेशक को सौंपने के पक्ष में है, जबकि अपने और LIC के पास कुछ हिस्सेदारी बनाए रखने का प्रस्ताव है।

अब इस सौदे की सफलता का आकलन सिर्फ इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि सरकार को कितनी रकम मिली। यह भी देखना होगा कि बैंक की वित्तीय मजबूती बनी रहती है या नहीं, ग्राहकों और कर्मचारियों के हित कैसे सुरक्षित रहते हैं और बैंक अपनी सार्वजनिक उपयोगिता से जुड़ी जिम्मेदारियों को किस तरह निभाता है।

अंततः सवाल यह नहीं है कि IDBI बैंक आज घाटे में है या मुनाफे में। सवाल यह है कि सार्वजनिक संसाधनों से संकट से उबरे और अब मुनाफा कमाने वाले बैंक का नियंत्रण निजी हाथों में सौंपना दीर्घकाल में देश की बैंकिंग व्यवस्था के लिए कितना उपयोगी साबित होगा।

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