के हक्सर द्वारा नेहा बोरा के लिए लिखा गया मार्मिक संदेश

के हक्सर द्वारा नेहा बोरा के लिए लिखा गया मार्मिक संदेश

जब मैंने शादी की, तब मुझे पता था कि मैं सिर्फ़ एक बच्चा चाहता हूँ। और मन ही मन मैं चाहता था कि वो एक बेटी हो।

मुझे एक बेटी का आशीर्वाद मिला।

जब पहली बार मैंने उसे गोद में लिया, तो मैंने उससे एक खामोश वादा किया। तुम्हें कभी मेरा समय बाँटना नहीं पड़ेगा। तुम्हें कभी मेरी तरफ़ से ध्यान का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा। मेरे पास जो कुछ भी है, वो सब तुम्हारा होगा।

मैंने चार-पाँच बच्चों वाले परिवार देखे थे। माता-पिता सुबह से रात तक भागते रहते थे, फिर भी कोई न कोई बच्चा इंतज़ार में रह जाता था। मुझे यह भी लगता था कि हमारे देश में लोग बहुत ज़्यादा हो गए हैं और प्रकृति इसकी कीमत चुका रही है। एक बच्चा सही लगता था। जिम्मेदारीपूर्ण लगता था।

सालों तक मैंने इस पर कभी सवाल नहीं उठाया।

फिर इस साल मैंने नेहा बोरा को देखा।

वह 29 साल की हैं, जेएनयू में पीएचडी कर रही हैं, उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके खटीमा कस्बे से थिएटर कलाकार हैं।

जब नीट पेपर लीक हुआ, तो उन्होंने उन छात्रों के लिए जंतर-मंतर पर बैठ गईं जिन्हें वे जानती तक नहीं थीं। उन बच्चों के लिए जिन्होंने सालों पढ़ाई की थी। उन माता-पिता के लिए जिन्होंने कोचिंग पर अपनी जमा-पूँजी खर्च कर दी थी और फिर भी सब खो दिया।

उन्होंने 23 दिन तक कुछ नहीं खाया।

जब उन्होंने अनशन शुरू किया तब उनका वज़न 66 किलो था। उन्होंने सात किलो से ज़्यादा वज़न खो दिया। आखिरी दिनों में डॉक्टर दिन में तीन-चार बार उनका खून निकाल रहे थे।

जिस रात मैंने यह पढ़ा, मैं सो नहीं सका। मुझे बार-बार अपनी बेटी उसकी जगह नज़र आती रही। दिल्ली की तपती सड़क पर। दुबली। थकी हुई। डॉक्टर बार-बार उसकी नब्ज़ पकड़ते हुए। और मुझे पता था कि मैं वहाँ खड़े होकर यह सब नहीं देख पाऊँगा। मैं उसे रुकने की मिन्नतें करता।

लेकिन नेहा तब तक नहीं रुकीं जब तक काम पूरा नहीं हो गया। और जब सब खत्म हुआ तो उन्होंने कहा कि उनके शरीर को खाना खाना भूल गया है। उसे फिर से सीखने की ज़रूरत है, जैसे कोई बच्चा सीखता है। उसके बाद भी, कमज़ोर होने के बावजूद, वे बिहार गईं और उन 600 से ज़्यादा छात्रों से मिलीं जिन्हें गिरफ्तार किया गया था। वे आराम करने घर नहीं गईं। वे उन्हीं के पास गईं जो उनके साथ खड़े रहे थे।

मैं एक डाउज़र हूँ। रोज़ मैं ऊर्जा के साथ काम करता हूँ। मैंने सीखा है कि गुस्सा भारी होता है। वह जल्दी जल जाता है। कोई भी इंसान 23 दिन बिना खाना खाए सिर्फ़ गुस्से पर नहीं जी सकता। इतना दूर सिर्फ़ प्यार ही ले जा सकता है।

फिर मैंने पढ़ा कि उनके पिता सेना में थे और परिवार एक पोस्टिंग से दूसरी पोस्टिंग में घूमता रहता था।

मेरी पत्नी के पिता भी सेना में थे। मैं उन्हें कभी ससुर नहीं कहता। मेरे लिए वे बस पापा हैं। मेरी पत्नी 13 स्कूलों में पढ़ीं। तेरह पहली सुबहें। तेरह बार ऐसी कक्षा में जाना जहाँ किसी को उनका नाम नहीं पता था। तेरह बार उन दोस्तों को अलविदा कहना जिन्हें वे फिर कभी नहीं देख पाईं। सेना के बच्चे मुस्कुराना, बैग बाँधना और फिर से शुरू करना सीख जाते हैं। कोई उनसे नहीं पूछता कि कितना दर्द होता है। मैं अपनी पत्नी में यह ताकत हर दिन देखता हूँ। मैंने नेहा में भी वही देखा।

रांची में एक आदमी ने उनके चेहरे पर स्याही फेंकी और उन्हें देश-विरोधी कहा। उन्होंने कहा कि दिल्ली में वे पहले ही पेलेट और लाठी का सामना कर चुकी हैं। स्याही उन्हें नहीं डराएगी।

स्याही धुल जाती है। ऊर्जा के काम में हम कहते हैं कि लोग जो कुछ आप पर फेंकते हैं, वह तभी टिकता है जब आप उसे अंदर ले लेते हैं। नेहा बिना कभी पेंडुलम थामे यह बात जानती नज़र आती हैं।

उनके परिवार को उनकी बात मंज़ूर नहीं थी। घर में झगड़े हुए। लेकिन अनशन के दौरान उनकी माँ जंतर-मंतर आईं।

मुझे नहीं पता उन्होंने एक-दूसरे से क्या कहा। मुझे जानने की ज़रूरत भी नहीं। मैं एक अभिभावक हूँ। मैं जानता हूँ एक माँ क्या महसूस करती है जब वह अपनी बेटी को सड़क पर कमज़ोर और दुबली देखती है, फिर भी खड़ी हुई। उस पल हर तर्क भूल जाता है। बस इतना रह जाता है कि यह मेरी बच्ची है।

नेहा ने कहा कि उन्होंने अभी तक अपने पिता से बात नहीं की है।

मैं उन्हें नहीं जानता। लेकिन मैं भी एक पिता हूँ और जानता हूँ कि हमारे जैसे पुरुषों के लिए कुछ बातें ज़ोर से कहना कितना मुश्किल होता है। तो अगर वे अभी तक नहीं कह पाए, तो मुझे चेन्नई से उनके लिए कहने दीजिए।

बेटा, हमें तुम पर गर्व है। अब जाओ और ठीक से कुछ खा लो।

इस सब के बीच एक खयाल मेरे मन में आया जिसकी मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी। काश मेरी एक और बेटी होती। नेहा जैसी।

इससे मेरी अपनी बेटी कम नहीं होती। वह मेरी दुनिया है। हमेशा रहेगी। लेकिन नेहा ने मुझसे एक कठिन सवाल पूछवाया।

हम पूरी ज़िंदगी अपने बच्चों को सुरक्षित रखने और उन्हें आगे बढ़ाने में बिता देते हैं। क्या हम उन्हें कभी यह सिखाते हैं कि पीछे मुड़कर देखें कि कौन छूट रहा है? और अगर एक दिन वे किसी और के लिए खड़े हो जाएँ, तो क्या हम उनके साथ खड़े होंगे जैसे नेहा की माँ खड़ी हुईं? या हम उनसे घर लौट आने और चुप रहने को कहेंगे। हमारा काम उस रोशनी की रक्षा करना है, भले ही वह हमें डराए।

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बेटियों के तमाम मां–बाप इसे ज़रूर पढ़ें।

(प्रशांत भूषण से साभार)

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