डॉ. आंबेडकर के दृष्टिकोण से भारतीय प्रवासी समुदाय और जातिवाद : एक समीक्षा

डॉ. आंबेडकर के दृष्टिकोण से भारतीय प्रवासी समुदाय और जातिवाद : एक समीक्षा

डॉ. रामजीलाल

 

डॉ बी. आर .अंबेडकर ने 1916 में और फिर 1946 में चेतावनी दी थी कि यदि हिंदू दुनिया भर के अन्य क्षेत्रों में चले गए, तो भारतीय जाति का मुद्दा एक वैश्विक समस्या बन जाएगा। एक सदी से भी अधिक समय बाद, उनकी भविष्यवाणी सच हो गई है, क्योंकि लगभग 37.28 मिलियन लोग सभी महाद्वीपों में एक मजबूत भारतीय प्रवासी हैं। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, लगभग 17,760,528 गैर-निवासी भारतीय (NRI) हैं, जो विदेश में रहने वाले भारतीय नागरिक हैं, साथ ही 19,520,317 भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO) हैं, जिसमें भारतीय वंश के विदेशी नागरिक शामिल हैं। इससे कुल प्रवासी भारतीय आबादी, या वैश्विक भारतीय प्रवासी, लगभग 37.28 मिलियन हो जाती है। इसे और विभाजित करने के लिए: – गैर-निवासी भारतीय (NRI): भारतीय मूल के लोग (PIOs/OCIs): लगभग 19.52 मिलियन (भारतीय मूल के विदेशी नागरिक); और NRIs और भारतीय मूल के लोगों की सबसे ज़्यादा आबादी वाले टॉप देश हैं यूनाइटेड स्टेट्स: लगभग 6.08 मिलियन; यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE): लगभग 4.34 मिलियन; कनाडा: लगभग 3.25 मिलियन; मलेशिया: लगभग 2.90 मिलियन; और सऊदी अरब: लगभग 2.75 मिलियन। यह अलग-अलग तरह का और तेज़ी से बढ़ता हुआ ग्लोबल समुदाय आज दुनिया में भारतीय डायस्पोरा की अहमियत को दिखाता है भारतीय प्रवासी समुदाय को प्रायः भारत की सांस्कृतिक विविधता, आर्थिक सफलता और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय प्रभाव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

लाखों भारतीय मूल के लोग ब्रिटेन, उत्तरी अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, खाड़ी देशों तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में बस चुके हैं। उन्होंने शिक्षा, चिकित्सा, व्यापार, प्रौद्योगिकी, राजनीति, प्रशासन और सांस्कृतिक जीवन में उल्लेखनीय योगदान दिया है। लेकिन प्रवासी भारतीयों की उपलब्धियों के साथ एक असुविधाजनक प्रश्न पर विचार करना भी आवश्यक है: क्या विदेशों में बसने से जाति-व्यवस्था कमजोर हुई है, अथवा उसके कुछ भेदभावपूर्ण रूप भारतीय प्रवासियों के साथ विदेशों तक पहुँच गए हैं?

डॉ. बी. आर. आंबेडकर का चिंतन इस प्रश्न की पड़ताल के लिए एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक आधार प्रदान करता है। आंबेडकर के लिए जाति केवल व्यवसायों का विभाजन या सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न नहीं थी। यह श्रेणीबद्ध असमानता की ऐसी व्यवस्था थी जो जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा निर्धारित करती, सामाजिक संबंधों को सीमित करती और कुछ समुदायों को समान मानवीय गरिमा से वंचित रखती थी। अस्पृश्यता के विरुद्ध उनका संघर्ष स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना से जुड़ा था। ये सिद्धांत आज भी उन सभी समाजों में प्रासंगिक हैं जहाँ जातिगत बहिष्कार किसी न किसी रूप में मौजूद है।

भारतीय प्रवासी समुदाय एक समान सामाजिक समूह नहीं है। इसमें विभिन्न जातियों, धर्मों, भाषाओं, क्षेत्रों, वर्गों, व्यवसायों और लैंगिक पहचानो के लोग शामिल हैं। कुछ लोग उच्च शिक्षा प्राप्त करके पेशेवर या उद्यमी बने हैं, जबकि अन्य कृषि, निर्माण, घरेलू सेवा, परिवहन, कारखानों और कम वेतन वाले कार्यों में लगे हैं। कुछ के पास नागरिकता, संपत्ति और आर्थिक सुरक्षा है; दूसरे अस्थायी रोजगार, नियोक्ताओं पर निर्भरता अथवा अनिश्चित आव्रजन स्थिति से जूझते हैं। इसलिए विदेशों में जाति के प्रभाव का अध्ययन वर्ग, नस्ल, लिंग और आर्थिक शक्ति से उसके संबंधों को समझे बिना अधूरा रहेगा।

1.आंबेडकर का जाति संबंधी विश्लेषण:

आंबेडकर का प्रारंभिक शोधपत्र Castes in India: Their Mechanism, Genesis and Development, जिसे उन्होंने 1916 में प्रस्तुत किया और जो 1917 में प्रकाशित हुआ, जाति की निरंतरता में अंतर्विवाह अर्थात् अपनी जाति के भीतर विवाह करने की व्यवस्था की केंद्रीय भूमिका को स्पष्ट करता है। उनकी पुस्तक Annihilation of Caste (1936) ने जातिगत ऊँच-नीच के सामाजिक और धार्मिक आधारों को चुनौती दी। आंबेडकर का तर्क था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी सार्थक हो सकता है जब समाज में भी समानता और मानवीय गरिमा स्थापित हो।

यह दृष्टिकोण प्रवासी समुदायों के अध्ययन में विशेष महत्त्व रखता है। यदि जाति परिवार, विवाह, सामाजिक संपर्क, धार्मिक-सामुदायिक संस्थाओं और जन्म-आधारित प्रतिष्ठा के माध्यम से कायम रहती है, तो केवल भौगोलिक स्थान बदलने से उसका अंत आवश्यक नहीं है। कोई व्यक्ति भारतीय गाँव या शहर छोड़कर लंदन, टोरंटो, न्यूयॉर्क, सिडनी या दुबई में बस सकता है, लेकिन अपने परिवार और सामाजिक परिवेश से प्राप्त कुछ मान्यताओं तथा व्यवहारों को साथ ले जा सकता है। ये व्यवहार नए परिवेश में बदल भी सकते हैं, फिर भी मित्रता, विवाह, धार्मिक सहभागिता और सामाजिक नेटवर्क को प्रभावित कर सकते हैं।

आंबेडकर ने औपचारिक राजनीतिक समानता और वास्तविक सामाजिक समानता के बीच अंतर पर भी बल दिया। संविधान समान अधिकारों की गारंटी दे सकता है, लेकिन इन अधिकारों का वास्तविक मूल्य तभी है जब व्यक्ति अपमान, बहिष्कार और जन्म-आधारित हीनता के बिना उनका उपयोग कर सके। आंबेडकर के लिए बंधुत्व केवल राष्ट्रीय एकता का नारा नहीं था; इसका अर्थ था एक-दूसरे को समान मनुष्य के रूप में स्वीकार करना। प्रवासी समुदायों की संस्थाओं और सामाजिक संबंधों को इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

2.डॉ.बी.आर.आंबेडकर :पुनरुत्पादन प्रणाली

यद्यपि अंतरजातीय संबंधों में परिवर्तन हुआ है परंतु जाति है कि जाती नहीं. जाति व्यवस्था टूटने की अपेक्षा विदेशों में भी प्रवासी भारतीयों में बरकरार है. डॉ.बी.आर.अंबेडकर के पुनरुत्पादन की प्रणाली के तीन आधारभूत स्तम्भ -अंतर्विवाह, क्रमिक असमानता व धार्मिक मान्यताएं हैं. स्वदेश से संबंध के कारण जाति चेतना निरंतर और पहचान के रूप में भी प्रयोग किया जाता है .विभिन्न देशों में वैवाहिक वेबसाइट और संगठन के माध्यम से जाति व्यवस्था को पुनर्जीवित किया जा रहा है .अंबेडकर के अनुसार पुनरुत्पादन की प्रणाली के स्तम्भ- अंतर्विवाह, क्रमिक असमानता व धार्मिक मान्यता है .यह तीनों ही प्रवासी भारतीयों के द्वारा दोहराए जा रहे हैं .अंतर्विवाह-94% वैवाहिक विज्ञापनों में जाति उल्लेख मिलता है .अंतरजातीय विवाह पर कलंक ,व्यक्तिगत संघर्ष ,उत्पीड़न व हिंसा की चर्चा होती रहती है. सामाजिक पूंजी- स्वर्ण जातियों ने विदेश में सामाजिक -आर्थिक , बौद्धिक और जाति -पूंजी इकट्ठी की है .सांस्कृतिक वर्चस्व – धार्मिक मान्यताओं , परम्पराओं, भारतीय संस्कृति, त्योहारों को समारोहों व,सम्मेलनों में लोकप्रिय संगीत, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में अपनी-अपनी जाति का महा मंडन किया जाता है .परिणाम स्वरूप जातीय वर्चस्व घटने की अपेक्षा प्रवासी भारतीयों में विदेश में भी संरक्षण निरंतर जारी है.

ब्रिटेन में भारतीय प्रवासी समुदाय पर हुआ शोध इस विषय में महत्त्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करता है। कुमार और बोरकर के 2026 के अध्ययन, “Reproduction of Caste Inequality and Anti-Caste Resistance Among the Indian Diaspora in the United Kingdom,” में बताया गया है कि जातिगत असमानताएँ धार्मिक-सामुदायिक संस्थाओं, अंतर्विवाह, खान-पान संबंधी प्रथाओं, सामुदायिक संगठनों और अनौपचारिक सामाजिक नेटवर्कों के माध्यम से दोहराई जा सकती हैं। अध्ययन जातिगत असमानता के विरुद्ध धार्मिक, सामाजिक-राजनीतिक और छात्र संगठनों द्वारा किए गए प्रतिरोध को भी दर्ज करता है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रवासी समाज जातिवाद के पुनरुत्पादन का स्थल भी हो सकता है और उसके विरुद्ध संघर्ष का भी। लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति को समान गरिमा प्राप्त हो।

3.क्या जातिवाद विदेशों में भी कायम रहता है?

विदेशों में जाति भारतीय समाज की ऐतिहासिक व्यवस्था के बिल्कुल समान कानूनी रूप में कार्य नहीं करती। उसका स्वरूप संबंधित देश के कानून, जनसंख्या, धार्मिक संस्थाओं, सामुदायिक संरचनाओं और प्रवासियों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। फिर भी जातिगत पहचान विदेशों में सामाजिक महत्व बनाए रख सकती है। पारिवारिक नेटवर्क विवाह के चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं, सामुदायिक संगठन जाति या उप जाति पर आधारित संबंधों को बनाए रख सकते हैं और कुछ परिस्थितियों में जाति सामाजिक समूहों में प्रवेश, रोजगार संबंधी संपर्क तथा वैवाहिक स्वीकारता को प्रभावित कर सकती है।

4.महाद्वीपों में जाति: एक तुलना

विदेश में रहने वाले बड़े भारतीय जाति झगड़ों की खोज से 74 नतीजे मिले। यहाँ महाद्वीपों में जाति भेदभाव का एक तुलना वाला ओवरव्यू दिया गया है:

1. नॉर्थ अमेरिका (USA और कनाडा, 5.6 मिलियन भारतीय डायस्पोरा): इक्वालिटी लैब्स के अनुसार, 67% दलितों को काम की जगह पर जाति भेदभाव का सामना करना पड़ता है, 25% को शारीरिक या मौखिक हमले का सामना करना पड़ता है, और 33% छात्रों को पढ़ाई में जाति भेदभाव का सामना करना पड़ता है। 2020 का सिस्को सिस्टम्स केस इस मुद्दे का एक उदाहरण है, जहाँ दो ऊँची जाति के मैनेजरों ने एक दलित इंजीनियर के साथ भेदभाव किया। फरवरी 2023 में, सिएटल अमेरिका का पहला शहर बना जिसने जाति भेदभाव पर रोक लगाने वाला कानून पास किया, जिसे बाद में कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी, फ्रेस्नो ने भी अपनाया। गुरु रविदास गुरुद्वारों और वाल्मीकि मंदिरों को अमेरिका और ब्रिटेन में अलग-अलग जाति के आधार पर बनाए गए पहले पूजा स्थलों के रूप में मान्यता मिली है। इंडोगैमी को एशियाई मैट्रिमोनियल पब्लिकेशन के ज़रिए बनाए रखा जाता है जो जाति के आधार पर जीवनसाथी ढूंढते हैं।

2. यूरोप और ब्रिटेन (5 मिलियन साउथ एशियन): U.K. में हुई रिसर्च से पता चलता है कि जाति की पहचान, दबदबे वाली जातियों के लिए एक बंद नेटवर्क तक खास पहुंच का ज़रिया बनती है, जिससे पिछड़े ग्रुप को सिस्टमैटिक नुकसान होता है। तिर्की बनाम चंढोक केस में, U.K. एम्प्लॉयमेंट ट्रिब्यूनल ने फैसला सुनाया कि इक्वालिटी एक्ट 2010 के तहत जाति “एथनिक ओरिजिन” के तौर पर क्वालिफाई करती है। दलितों के लिए इस्तेमाल की गई अपमानजनक भाषा “निगर” शब्द जैसी है, जिसका इस्तेमाल ब्लैक लोगों के खिलाफ किया गया है। ऊंची जाति के स्टूडेंट अक्सर ऑक्सफोर्ड में एंटी-कास्ट अंबेडकर फोरम में जाने से बचते हैं और घर लौटने से पहले जाति से जुड़ी दौलत जमा करने के लिए अक्सर विदेश में पढ़ाई करते हैं। खास तौर पर, डॉ. बी.आर. अंबेडकर 20वीं सदी में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट यूनियन के प्रेसिडेंट बनने वाले पहले एशियाई थे; बाद में वे भारतीय संविधान के निर्माता बने। उनके बाद, डॉ. के.आर. नारायणन दूसरे एशियाई प्रेसिडेंट बने और बाद में भारत के प्रेसिडेंट के तौर पर काम किया।

3. कैरेबियन,लैटिन अमेरिका और फिजी: जजमानी सिस्टम बंधुआ मज़दूरी के ज़माने में खत्म हो गया, लेकिन शादियों और मंदिर कमेटियों के ज़रिए जाति सिस्टम अभी भी बना हुआ है। त्रिनिदाद और गुयाना में, जहाँ जाति का सिस्टम कमज़ोर हो गया है, वहीं ब्राह्मणवादी पुजारियों का दबदबा बना हुआ है।

4. साउथ अफ्रीका (केन्या और तंजानिया सहित, 2.8 मिलियन इंडियन डायस्पोरा): इस इलाके के ज़्यादातर शुरुआती इंडियन व्यापारी, खासकर गुजराती पटेल और लोहाना, एक ट्रेड नेटवर्क का हिस्सा थे। जाति बिज़नेस नेटवर्क और एंडोगैमी के ज़रिए चलती है, और जातिवाद आम है। मॉरिशस में जाति-आधारित काम न होने की वजह से सबसे ज़्यादा इंटीग्रेशन है।

5. गल्फ और वेस्ट एशिया (9 मिलियन): इस इलाके में सबसे बड़ा इंडियन डायस्पोरा है, जिसकी पहचान टेम्पररी लेबर माइग्रेशन है। जाति का डायनामिक्स रिक्रूटमेंट नेटवर्क, हाउसिंग सेग्रीगेशन और जाति या गाँव के ऑर्गनाइज़ेशन के ज़रिए दिखता है। दलित वर्कर को डबल मार्जिनलाइज़ेशन का सामना करना पड़ता है।

6. ओशिनिया – ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड (1 मिलियन भारतीय डायस्पोरा): ऑस्ट्रेलिया में हाल ही में हुई एक स्टडी से पता चलता है कि जाति को लेकर भेदभाव छोटे-छोटे तरीकों से बना हुआ है, जिसे अक्सर मीडिया नजरअंदाज कर देता है। हालांकि, जाति को लेकर गालियां और समुदाय को अलग-थलग करने वाले इवेंट अभी भी होते हैं, जिनमें “भीमी लोगों के साथ घुलने-मिलने” से मना किया जाता है। “भीमी” शब्द, जिसका मतलब जाति-आधारित पहचान से है, आमतौर पर अनौपचारिक रूप से इस्तेमाल किया जाता है।

5.प्रवासी जीवन में आंबेडकर की प्रासंगिकता:

आंबेडकर का चिंतन केवल ऐतिहासिक अस्पृश्यता की आलोचना नहीं है। यह समकालीन संस्थाओं का मूल्यांकन करने की कसौटी भी प्रदान करता है। स्वतंत्रता का अर्थ है जन्म-आधारित प्रतिबंधों के बिना समाज में भागीदारी का अधिकार। समानता का अर्थ है जातिगत श्रेष्ठता और हीनता को अस्वीकार करना। बंधुत्व का अर्थ है सामाजिक दूरी और अपमान के स्थान पर पारस्परिक सम्मान पर आधारित संबंध स्थापित करना।

आंबेडकर का शिक्षा, संगठन और संघर्ष पर बल प्रवासी समुदायों के लिए भी प्रासंगिक है। शिक्षा लोगों को भेदभाव पहचानने और अपने अधिकार समझने में सहायता करती है। संगठन उन लोगों को सहयोग दे सकते हैं जो सामाजिक रूप से अलग-थलग हैं या शिकायत करने में संकोच करते हैं। सामूहिक कार्रवाई नियोक्ताओं, विश्वविद्यालयों, सरकारों और सामुदायिक संस्थाओं को निष्पक्ष नीतियाँ अपनाने के लिए प्रेरित कर सकती है।

आंबेडकर का दृष्टिकोण इस धारणा को भी चुनौती देता है कि राष्ट्रीय प्रतिष्ठा या आर्थिक सफलता अपने आप सामाजिक प्रगति का प्रमाण है। कोई प्रवासी समुदाय समृद्ध और प्रभावशाली हो सकता है, फिर भी उसके कुछ सदस्य सामाजिक बहिष्कार का सामना कर सकते हैं। प्रगति की वास्तविक कसौटी यह है कि गरिमा और अवसर कितने व्यापक रूप से साझा किए जाते हैं, न कि केवल किसी समुदाय ने कितनी संपत्ति या प्रतिष्ठा अर्जित की है।

लेखक के पूर्व प्रकाशित लेखों में आंबेडकर, अस्पृश्यता और जातिवाद के प्रश्नों को भारतीय समाज के लोकतांत्रिक रूपांतरण तथा सामाजिक न्याय से जोड़कर देखा गया है। समाज वीकली (यूके ), द एशियन इंडिपेंडेंट (यूके)और प्रतिबिंम मीडिया (चंडीगढ़) में प्रकाशित उन चर्चाओं का विस्तार करते हुए यह लेख भारतीय सीमाओं से बाहर जाति के प्रश्न की पड़ताल करता है। जातिगत भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष केवल भारत तक सीमित नहीं है; यह उन सामाजिक संबंधों से भी जुड़ा है जिन्हें प्रवासी अपने साथ ले जाते हैं, नए संदर्भों में बदलते हैं या चुनौती देते हैं।

6.समानता के लिए कार्यक्रम:

समानता के लिए कार्यक्रम अधोलिखित है:

पहला, सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भेदभाव-विरोधी कानून स्पष्ट, प्रभावी और उन लोगों के लिए सुलभ हों जिन्हें जातिगत बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। जहाँ मौजूदा कानून अस्पष्ट हों, वहाँ विधायकों को यह विचार करना चाहिए कि क्या कानूनी स्पष्टीकरण या विशिष्ट संरक्षण आवश्यक है। ऐसा करते समय संवैधानिक मूल्यों और मानवाधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।

दूसरा, विश्वविद्यालयों और नियोक्ताओं को गोपनीय शिकायत-व्यवस्था, निष्पक्ष जाँच और शिकायतकर्ताओं को प्रतिशोध से बचाने की व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए। प्रशिक्षण में जातिगत भेदभाव को स्पष्ट किया जाना चाहिए, लेकिन किसी पूरे धर्म, राष्ट्रीयता या जातीय समुदाय को दोषी मानने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।

तीसरा, धार्मिक और सामुदायिक संस्थाओं को अपनी प्रथाओं की समीक्षा करनी चाहिए। सांस्कृतिक जीवन में उनके योगदान को और मजबूत बनाया जा सकता है, यदि पूजा, सहभागिता, कल्याणकारी सेवाओं और नेतृत्व में जातिगत ऊँच-नीच के आधार पर प्रतिबंध न हों। सामुदायिक संगठनों को समानता के स्पष्ट सिद्धांत अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

चौथा, सरकारों, शोधकर्ताओं और नागरिक संगठनों को प्रमाण-आधारित अनुसंधान को बढ़ावा देना चाहिए। विभिन्न देशों में जातिगत भेदभाव के स्वरूप, आवृत्ति और परिस्थितियों पर विश्वसनीय आँकड़ों की आवश्यकता है। शोध में जातिगत पूर्वाग्रह, नस्लवाद, वर्ग-आधारित शोषण और अन्य असमानताओं के बीच अंतर किया जाना चाहिए, साथ ही उनके परस्पर संबंधों का भी अध्ययन होना चाहिए। दलित, रविदासिया, आंबेडकरवादी और अन्य जाति-विरोधी संगठनों के योगदान को भी दर्ज किया जाना चाहिए।

अंततः प्रवासी समुदायों को जाति, वर्ग, लिंग, धर्म और राष्ट्रीयता की सीमाओं से परे सहयोग विकसित करना चाहिए। ऐसा सहयोग किसी पूरे समुदाय के विरुद्ध शत्रुता पैदा किए बिना भेदभाव को चुनौती दे सकता है। उद्देश्य एक प्रकार के जन्म-आधारित पूर्वाग्रह को दूसरे पूर्वाग्रह से बदलना नहीं, बल्कि संस्थाओं और सामाजिक संबंधों को समानता के आधार पर बदलना होना चाहिए।

भारतीय प्रवासी समुदाय प्रवास की संभावनाओं और अंतर्विरोधों, दोनों को सामने लाता है। वह दिखाता है कि लोग सीमाएँ पार करके सफल जीवन बना सकते हैं और दुनिया भर के समाजों में योगदान दे सकते हैं। साथ ही, वह यह भी याद दिलाता है कि स्थान बदलने से सामाजिक मान्यताएँ अनिवार्य रूप से समाप्त नहीं होतीं। अलग-अलग परिस्थितियों में जाति को चुनौती दी जा सकती है, उसका पुनरुत्पादन हो सकता है, उसे छिपाया जा सकता है या उसका स्वरूप बदल सकता है।

डॉ. आंबेडकर की स्थायी शिक्षा यह है कि समानता का मूल्यांकन औपचारिक घोषणाओं से नहीं, बल्कि लोगों के वास्तविक जीवन के अनुभवों से होना चाहिए। विदेशों में भारतीय मंदिरों, गुरुद्वारों, सामुदायिक संस्थाओं और सांस्कृतिक संगठनों की उपस्थिति अपने आप में समस्या नहीं है। निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या वे समान गरिमा को बढ़ावा देते हैं या जन्म-आधारित ऊँच-नीच को बनाए रखते हैं। इसी प्रकार, विदेशी समाजों के लोगों द्वारा किए गए भेदभाव की जाँच प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए और उसे प्रवासी समुदायों के भीतर मौजूद जातिगत असमानताओं से अलग करके भी समझना चाहिए।

लक्ष्य ऐसा प्रवासी समाज होना चाहिए जहाँ वंश और जाति किसी व्यक्ति का सामाजिक मूल्य निर्धारित न करें, धार्मिक पहचान बहिष्कार का आवरण न बने और सामुदायिक एकता दूसरों के अपमान पर आधारित न हो। आंबेडकर का स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का विचार इस परिवर्तन का मजबूत आधार प्रदान करता है। अंतिम कसौटी यह नहीं है कि विदेशों में भारतीय अपनी सांस्कृतिक विरासत को कितना सुरक्षित रखते हैं, बल्कि यह है कि क्या वे उस विरासत की मानवीय और लोकतांत्रिक संभावनाओं को विकसित करते हुए अस्पृश्यता तथा जातिगत भेदभाव को जहाँ भी मौजूद हो, समाप्त करने का प्रयास करते हैं।

निष्कर्ष:

आंबेडकर के अनुसार प्रवासी जातिवाद सांस्कृतिक अवशेष नहीं निर्यातित क्रमिक असमानता है .डॉ भीमराव अंबेडकर दृष्टिकोण के अनुसार जातिवाद के विनाश के लिए केवल कानून ही पर्याप्त नहीं हैं अपितु सामाजिक सुधारों की अनिवार्यता है. संविधान,कानून व न्यायिक व सिए टल जैसे प्रतिबंध अत्यधिक सहायक सिद्ध हो सकते हैं यदि सामाजिक सुधारों की नींव को अंतरजातीय- भोजन और अंतरजातीय विवाहो के आधार पर सुदृढ़ किया जाए. परंतु इसके लिए मानसिकता में सकारात्मक मूल चूल परिवर्तन अति आवश्यक है. संवैधानिक नैतिकता बनाम सामुदायिक नैतिकता -प्रवासी भारतीय अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा ,फ्रांस इत्यादि देशों में समता वादी संविधानों के आधार पर संचालित व्यवस्थाओं के अंतर्गत रहते है जहां प्रवासी भारतीय राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति(अमेरिका) ,प्रधानमंत्री (ब्रिटेन)व कनाडा 2.8 मिलियन प्रवासी भारतीयों के 22 सांसद व विदेश मंत्रालय सहित चार मंत्री हैं .जब इन देशों मूल निवासी सामुदायिक का पालन करते हैं तो प्रवासी भारतीयों भी सामुदायिक नैतिकता अपनानी चाहिए.सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र अधूरा है अमेरिका में 30 से अधिक अंबेडकर वादी संगठन -अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर, अंबेडकर किंग स्टडी सर्किल, टेक्सास बौद्ध एसोसिएशन इत्यादि सामाजिक लोकतंत्र का अभ्यास कर रहे हैं .दलित प्रवासी भारतीयों ने अंबेडकरवाद को अंतरराष्ट्रीय बनाने में अभूतपूर्व योगदान दिया है. सॉलिडेरिटी नेटवर्क यूके ,कास्ट वॉच यूके,इक्विटी लैब्स यूएसए इत्यादि ने जाति को नस्लीय भेदभाव उन्मूलन अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सीआईडी में लाया है . सीएटल जीत अंबेडकर के संवैधानिकतावाद की वैश्विक विजय के रूप में है.

अंततः आंबेडकर की चेतावनी सत्य सिद्ध हुई- आज जाति एक विश्व समस्या है. अंबेडकरवाद इसके निदान के लिए शिक्षा, संगठन ,संघर्ष अंतरजातीय -विवाह,अंतरजातीय- भोज और कानून में स्पष्ट सुरक्षित श्रेणी रूप में भारतीय संविधान के समतावादी सिद्धांतों निर्यात परमावश्यकर है . करनाल से कैलिफोर्निया तक जाति विनाश के बिना वैश्विक बंधुत्व बिल्कुल खोखला है .इस वैश्विक समस्या के निदान के लिए मानसिकता में बदलाव आवश्यक है.

डॉ. रामजीलाल, सामाजिक वैज्ञानिक और पूर्व प्रिंसिपल, दयाल सिंह कॉलेज, करनाल। (हरियाणा-भारत)

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