साहित्य आलोचना के सरोकार
जुल्म की बात ही क्या: काव्य समीक्षा
मनजीत मानवी के काव्य संग्रह ‘जब कोई दस्तक देता है ‘ की ओमसिंह अशफ़ाक द्वारा की गई समीक्षा
ओमसिंह अशफ़ाक
“जुल्म की बात ही क्या/जुल्म की औकात ही क्या/जुल्म बस ज़ुल्म है/आगाज़ से अंज़ाम तलक”!
-साहिर लुधियानवी।
**
मनजीत ‘मानवी’ की कविता में आरम्भ से अंत तक मुख्यतः यही स्वर सुनाई पड़ता है।
मनजीत की कविता में बीते वर्ष (2012) की सामाजिक सांस्कृतिक फिज़ा के पितृसत्तात्मक,अन्यायकारी, पक्षपाती,उत्पीड़नकारी परितिस्थतियों के विभिन्न रूपों के आगाज़ के संकेत हैं।
और उसका विमर्श सघन रूप में मौजूद है,तो ‘दामिनी प्रकरण’ यथार्थ के धरातल पर उन परिस्थितियों का अंजाम है।
पाँच खंडों में विभक्त, एक सौ बारह पृष्ठों पर फैली इन कविताओं में प्रेम, विरह, उत्पीड़न,अन्याय, स्त्री विमर्श से लेकर दर्शन और अस्तित्व संबंधी प्रश्नों को छेड़ती कविताएँ भी हैं और अंत में तीन-चार ग़ज़ल-नज़्म भी।
उनकी कविता का स्वर स्वभावतः मद्धम है, वहाँ स्वर का ऊंचा अलाप नहीं है, लेकिन यह स्वर दीर्घ है जोकि संग्रह की शुरूआत से अंत तक अपनी तान नहीं छोड़ता है।
“मैं अकारण जनमी लड़की/ तलाश रही हूँ/अपना ठिकाना/ अपना संबल/चल रहे हैं साथ मेरे/हजार जुगनू हजार जंगल/”…
(‘तलाश’ घर-बेघर खंड, पृ. 1,2)
उपरोक्त पंक्तियों में कवयित्री स्त्री के अस्तित्व, उसकी ‘रिलेवेंस’ उसके होने के कारण और सार्थकता पर सोचते हुए समाज में एक जगह तलाशती है जो कम से कम उसके मानवीय अस्तित्व के लिए अनुकूल तो हो?
स्त्री उत्पीड़न के घटाटोप अंधकार को प्रश्नांकित करती यह सोच द्वन्द्वात्मक तो है ही- इसमें आशावाद के जुगनू भी टिमटिमाते हैं:
“यह खेत घर गांव आंगन खेत-खलिहान/पाठशाला मदरसे परिजन मित्रगण/ये देश,मेरा अपना है/फिर क्यों सहम जाती हूँ मैं/दरवाजे पर पड़ी दस्तक से/”...
लिंग आधारित असुरक्षा की भावना यहाँ स्पष्ट संकेत करती है कि यदि वास्तव में ही उपरोक्त सारा माल-असबाब और देश उसका होता तो फिर भला उसको किसका डर हो सकता है?
उसको तो “जन्म लेते ही/ ये विशाल दुनिया छोटी पड़ जाती है संभल-संभल कर सांस लेनी पडती हैं/सपनों की तत्काल सजा मिलती है/..”
फिर भी ‘मेरा भारत महान’ बना रहता है। अपनी-‘पुरानी सभ्यता और संस्कृति’ की दुहाई देते हुए और फिर भी ‘विकास के मानदंड, निर्दोष बने रहते हैं?’
संतोष की बात यह है कि कवयित्री इस ‘खौफनाक हकीकत’ को भी जानती हैं:
“राशन की चिंता/पोषण की चिंता मंहगाई की चिंता/घर चलाने की चिंता/देश बचाने की चिंता/…
इस कविता में स्त्री-पुरूष के इतिहास के ब्लूपिंट रचते हुए कवयित्री समाज के समक्ष एक बुनियादी सवाल रखती है कि आरिखर ‘तुम जिओगी-कब’ ?(पृ. 21)
ज़ाहिर है कि श्रम और शोषण की चक्की में पिसती स्त्री को आजीवन सुकून से जीने के चंद पल भी नसीब नहीं होते हैं।
उसके 11 लाख करोड़ डालर मूल्य के वार्षिक “घरेलू श्रम” की न तो कहीं गिनती होती है और न ही भुगतान किया जाता है।
दुनिया में तमाम रिकॉर्ड तोड़ बड़े-बड़े घोटालों के बीच आज भी यह विश्व का सबसे “बड़ा घोटाला” है, जिसका यथावत उजागर होना अभी बाकी है।
उपरोक्त कविता की पृष्ठभूमि में ये ध्वनि जरूर सुनाई पड़ती है। बशर्ते सुनने वाले के कान और दिमाग सही जगह पर हों।
यहाँ अपने श्रम का मूल्य और सुरक्षित आवास को तलाशती स्त्री पूछती है:
“कहाँ है मेरा घर/ कहीं गर्व से कहीं उपद्रव से/हर दिन हो रहा है/हवाओं में एलान/मैं जो न हिंदू हूँ/न मुसलमान/न पिता/न पंडित/न अन्नदाता/न धरतीपुत्र, कोई बताए/मैं कहाँ जाऊं”/..
यक़ीनन स्त्री के इस सवाल का जवाब किसी ने नहीं दिया है। उपनिषदों से लेकर आज तक की मैत्रेयी कात्यायनी यह सवाल बार-बार और लगातार उठाती रही हैं जिसे अनसुना करके टाला जाता रहा है।
क्योंकि यह ऐसा सवाल है जो सामाजिक व्यवस्था की नींव को हिला डालता है। इसके समक्ष वर्ण व्यवस्था, वेद शास्त्र, पितृसत्ता सब ध्वस्त हो जाते हैं।
पंडित मौलवी, पादरी, क्षत्री, छत्रप, राष्ट्र गौरव गायक या तो बगले झांकने लगते हैं या फिर आँय-बाँय-साँय बकने लगते हैं।
और फिर ध्यान बांटने के लिए सांप्रदायिकता, फासीवाद, नाज़ीवाद, जातिवाद का तेज नुस्खा तैयार किया जाता है।
इन प्रश्नों से बचने के लिए स्त्री-जगत को सदियों से पुरूषवादी विचारधारा का टॉनिक पिलाया जाता रहा है।
लेकिन आज उसने जान लिया है कि- “एक स्त्री अगर अकेली नहीं है। तो वह लगभग मौजूद नहीं है।” यानी उसे किसी की पत्नी, मां, बहन, बेटी होने में ही अपना अस्तित्व खोजना पड़ता है।
उसे पुरुष निर्भरता का पाठ निरन्तर पढ़ाया जाता रहा है। और वही उसका स्वभाव बना दिया गया है। मनजीत की कविता ने इस तथ्य की पहचान बख़ूबी करली है:
“मुझे बख़्श दो/मेरी छोटी सी जान/कोयल की कूक और इंच भर आसमान/…”
ताकि वह अपने बारे में भी कुछ सोच सके। अपने होने को भी महसूस सके:
वह “ढूंढ रही है कब से एक छोटी सी खिड़की/जहाँ रह सकूं जिंदा/ बिना किसी डर के/..
अब ये स्त्री “पूँजी की रण-भट्टी में जलने” और “मुनाफे की मंडी में बिकने” के लिए राजी नहीं है:
उसने ठान ली है एक “अनकही जिद/ताकत की धुरी को/पलटने की जिद/शास्त्रों से रिवाजों से टकराने की जिद/सत्ता के किलों को गिराने की जिद/न्याय की दुनिया बसाने की जिद/..”
यहाँ आकर मद्धम स्वर, सप्तम में पहुँच जाता है क्योंकि ‘मानवी’ की स्त्री, पितृसत्ता और साम्राज्यवाद के गठजोड़ की शिनाख्त कर लेती है। उससे टकराने और नई दुनिया बसाने का संकल्प करती है।
बेशक यहाँ तक पहुँचने में उसे बहुत कष्ट सहने पड़े हैं। अपना काफी लहू भी बहाना पड़ा है:
“मेरे सामने खुले थे कई रास्ते/ एक तरफ कुआँ था/एक तरफ जंगल/एक तरफ सराय/..मैंने जंगल को चुना/काँटों में गड़ गई और अफसोस नहीं किया/लहू बहता गया जड़ जमती गई/”…
दूसरे खंड में बाद की तीन कविता “खाई, आज फिर और क्षितिज को छोड़कर (जोकि छोटी मगर गहरी हैं) शेष सब कविताएँ ‘बात और आवाज़’ को प्रतीक, बिम्ब अथवा चित्र के रूप में इस्तेमाल करती हैं।
और हुए गहन मानसिक कश-म-कश, द्वन्द्व और आन्तरिक दुःखों को अभिव्यक्ति देती प्रतीत होती हैं।
संवेदना की गहनता पाठक को बांध लेती है और वह सोच के दरिया में डूबता उतराता रहता है:
“आज बरसों बाद सुनी मैंने / अपनी आवाज/और मैं आश्वस्त हो गई/कि दुःखों का सफर अभी लंबा है”/(पृष्ठ 40)..या
“जमीं हुई खामोशी/कभी मिली बेधड़क सारी परतें खोलकर..(पृष्ठ 41) सबसे छिपाती रही/वह अपनी पीर/इस भरोसे कि वक्त बदलेगा/बंद गाँठें खुलेंगी”/(पृष्ठ 49)
“वक्त बदला/सरोकार बदले/मगर पीर उसके मन की/आज भी तालों में जड़ी है/बहुत गहरी गड़ी है/”…
इस स्थिति के बावजूद ‘मानवी’ का आत्मविश्वास नहीं डगमगाता है:
“कहीं बिखरी-कहीं अटूट/कहीं घायल कहीं साबुत/हर संकट/ हर निराशा में/जुगनू-सी चमकती है/सीधी-सच्ची बात/अनेक भटके दुःखों को/रास्ता दिखाती है/..”
तीसरे खंड में ‘खुशी से लेकर ‘बिखरे पन्ने’ तक की कविताएँ प्रभावित करती हैं: “खुशी वह धूप है/जो सूरज की मोहताज नहीं/.. (पृष्ठ 59)
“टूटकर मिट्टी में गड़ गया/वह पीला पत्ता/फिर से जुड़ गया/वह पीला पत्ता/..(पृष्ठ 58)
“अकेला मन आज भी/एक साबुत शाम को तरसता है/..(पृष्ठ 60)
भटके हुए दर्द को/पुनः स्थापित करती है/अपनी अटूट विश्वनीयता/.. (पृष्ठ 61)
“सब कुछ खत्म होने पर भी/सब कुछ खत्म नहीं होता/फिर हरा हो जाता है/जीवन का बसंत..(पृष्ठ 62)
“बहुत कम अतंर रह गया है/ इन दिनों जीने और मर जाने के बीच/कितने दरिया/कितने सहरा (इस बीच) कौन जाने/”… (पृष्ठ 63)
उपरोक्त कविताओं की पंक्तियाँ सुक्ति का रूप धरकर मन से निकली हैं। उनमें मन की टीस भी है और काव्य के नये बिम्ब और प्रतीक भी। कहीं-कहीं शमशेर जैसी रंगत भी है।
अकेलेपन के दर्द के बावजूद अभिलाषा है कि “यूँही दिन निकले/यूँ ही जीवन चले/…”
चौथे खंड में प्रेम और विरह की कविताएँ हैं लेकिन वहाँ विरह भी निराश को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता है और प्रेम महज स्थूल जिस्मानी प्रेम नहीं है बल्कि हर स्थिति में अपनी सार्थकता और सोदेश्यता तलाशता है-
“कैसी विचित्र है । प्रीत की आस / ज्यों-ज्यों बढ़ती है / गहराता जाता है । निर्जनता का एहसास… (पृष्ठ 71)
जहाँ तमाम पोथियाँ और ग्रंथ हो जाते हैं व्यर्थ । जहाँ फतवे और फरमान /खो देते हैं अर्थ । जहाँ न कुछ पाने की कोशिश है / न कुछ बचाने की. ..” (पृष्ठ 73)
औरतें बूंद-बूंद सींचती हैं जिसे वह अक्सर प्यार नहीं / प्यार की हसरत है शायद… (पृष्ठ 74)
जब-जब आता है / तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में। ये धरती दुःखों के बीच हल्की हो जाती है… (पृष्ठ 77)
कभी कोई बूँद मेरी पीर लिये बरसे वहाँ । तुम हो जहाँ । कैसा अकथ रिश्ता है / बूँद और समन्दर का न भय न बंधन बस अनकहा समर्पण. … आगोश में बुलाती एक अनंत गहराई और खामोश निर्विरोध डूबते जाने की ख़्वाईश… (पृष्ठ 79)
उक्त पंक्तियाँ प्रेम की निश्छल अनुभूति के विलक्षण चित्र प्रस्तुत करती हैं। अब विरह के कुछ नमूने दृष्टव्य हैं –
“देर तक रहती है । आँख में नमी जब सूखने लगता है / आस का दरिया (पृष्ठ 80) ये गुनगुना / अधबुना / जिंदगी का गीत / जो हर आहट पर/ मचलने लगता है / इक बच्चे की तरह / (पृष्ठ 83)
दिल कहता है/कभी मिलेंगे हम/ यूँ ही बेइरादा/और नाकाम सी तमाम बातें/करते चले जाएँ/…वक्त की चाप/सूरज की ताप/दुख और संताप थम जाए/ जम जाए सब कुछ पल के लिए/ (पृष्ठ 84)
विरह में भी कवयित्री का भरोसा देखने लायक है-
जो सुनहरी घास के तिनके सा/ जमीन में गड़ा हुआ। जैसे समुद्री रेत पर / जर्जर किसी सीप में / कोई मोती अड़ा हुआ… (पृष्ठ 85)
ऐसे बिम्ब और चित्र अनेक प्रौढ़ कवियों की रचना में भी आजकल दुर्लभ ही हैं
“मैं जहाँ से चली थी। वहाँ भी जंगल था। जहाँ पहुंची वहाँ भी जंगल है / चलती ठहरती / गिरती, संभलती/ खिलती, बुझती, मैं पग-पग उग रही हूँ / जंगल की शिराओं में… (पृष्ठ 88)।
अंतिम खंड में विविध प्रसंग की कविताएँ हैं जिनमें विश्लेषण, मूल्यांकन और व्यंग्य भी है:
“राजसत्ता खामोश है/राजनीति मदहोश है/मर रहा निर्दोष है/ हालात के उन्माद में/.. (पृष्ठ 91)
“मन तू जलते रहने का हौसला तो कर/रात में चलते रहने का फैसला तो कर/”.. (पृष्ठ 92)
यदि पाठक बेहतरीन छन्दोबद्ध बालकविता का आनंद लेना चाहें तो ‘छोटू’ शीर्षक वाली कविता जरूर पढ़ें ताकि उसकी सार्थकता का अनुभव कर सकें:
“मैं छः साल का नन्हा बच्चा/छोटू मेरा नाम/पट्टाखे की फैक्टरी में/ करता हूँ मैं काम/आई गई कितनी सरकारें/विकास का नारा सभी बघारें/कोई बताए ये विकास है/ किस चिड़िया का नाम/..(पृष्ठ 95)।
“एक बच्चा जो है/वही होता है और जो होता है/वही नजर आता है/एक बच्चा जब बड़ा हो जाता है/कड़ा हो जाता है/जो है,वह नहीं होता है/अक्सर जो नहीं होता/वही नजर आता है/बड़ा होने की कोशिश में/कुछ कच्चा,कहीं खो जाता है/कुछ सच्चा कहीं खो जाता है”/..(पृष्ठ 100)
विरोधाभास और पांखड का कितना यथार्थपरक, विश्लेषणात्मक और विश्वसनीय काव्यात्मक चित्रण इस कविता में प्रस्तुत किया गया है,जानकर प्रसन्नता होती है।
इसी खंड में गजल के ‘फॉरमेट’ में तीन और ‘नज्म’ की विधा में एक गज़ल भी मौजूद है :
“खुद को बदलने से क्यों डर रह हैं आप।
जिंदा हैं और हर घड़ी मर रहे हैं आप।”..(यह कैसा मंजर,पृष्ठ 107)
“अभी तो बाकी है,मेरी आंख में पानी।
अभी कहाँ तेरे दर्द की, इंतहा हुई है।”..(वो हकीकत, पृष्ठ 106)
“न दर्द की सीमा कोई,न प्यार की सीमा,
हर हाल में चाहेंगे, तुझको चाहने वाले”। (ऐ जिंदगी पृष्ठ 105)
“कैसी हैं ये दूरियाँ,कैसे हैं ये फासले।
लाख जोड़ों महफ़िलें दिल मगर जुड़ता नहीं।”
सभी शे’र बामकसद और पुरअसर हैं।
(क्या कहें, किससे कहें पृष्ठ
109)
अंतिम दो कविताओं में कुछ हद तक निराशा का स्वर सुनाई पड़ सकता है, लेकिन वहाँ भी कवयित्री सारतः आशा का दामन नहीं छोड़ती है।
मनजीत ‘मानवी’ की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि इतने कष्टों- बिछोड़ों और संघर्षों के बाद भी उसका हौसला अपराजेय बना रहा है। पता नहीं इतने से वजूद में, उतनी हिम्मत कहाँ से आई है?
शायद संघर्षों से ही आई होगी-और इसी का नाम जीवन है।
पुस्तक परिचय

कविता संग्रह: जब कोई दस्तक देता है।
कवयित्री : मनजीत ‘मानवी’
प्रकाशक : मानव प्रकाशन कोलकाता
मूल्य : 150 रुपये (पेपर बैक) पृष्ठ 114)
(2013 में)
———————
