राजकुमार कुम्भज की तीन कविताऍं
1
ये धिक्कार बने औज़ार
ऊॅंचाइयों पर खड़ा एक आदमी
नीचे ज़मीन पर देखता है कुछ इस तरह
कि कुऍं में झाँकता एक दूसरा आदमी
डरता है,काँपता है,खींचते हुए पानी
पसीने से लथपथ चढ़ता है सीढ़ियाँ
पानी पिलाता है उसे,वह जो है ऊपर
ऊॅंचाइयों पर खड़ा एक आदमी
कारण देरी थूकता है दूसरे के मुँह पर
वह जो दूसरा फिर-फिर पोंछता है मुँह
और धिक्कारता है भीतर ही भीतर
मैं चाहता हूँ कि किसी भी एक दिन
ये धिक्कार बने औज़ार.
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2.
पार्टी फंड और फंडे के नाम
उसके उठ खड़े होने की ख़बर में
उसके लिए सिर्फ़ अफ़सोस है ढ़ेर सारा
और कहीं मिले,नहीं मिले कह नहीं सकते
लेकिन वह राशनकार्ड और देशी ठेके पर
उसके जैसे ही दोस्तों सॅंग ज़रूर मिलेगा
झंडे उठाते हुए मिलेगा,फटे कपड़ों में
नारे लगाते मिलेगा,धॅंसी ऑंखें,नॅंगे पाँव
महॅंगाई विरूद्ध जुलूस में मिलेगा आगे
कटिबद्ध और प्रतिबद्ध भी मिलेगा इतना
कि जैसे अपढ़ होने का साक्षात सबूत
कोई गवाह नहीं,कोई सफ़ाई नहीं
ख़ुशी-ख़ुशी आज ही हो जाएगा शहीद
पार्टी फंड और फंडे के नाम.
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3.
चार बूँदें पसीना है क़ीमत मेरी
चार बूंदें पसीना है क़ीमत मेरी
झुरमुटों से आता हूँ निर्मल उजास हूँ मैं
सदियों से देता रहा हूँ दस्तक़ इसी तरह
मेरा भरोसा करो मैं ही दस्तावेज़ों में
मैं ही दस्तावेज़ों से बाहर भी सकुशल
कभी-कभी दरारों से भी आता हूँ बेशक़
दीवारें,दरारें तत्काल गिरा देने की ख़ातिर
बख़ूबी जानता हूँ कि गुफ़ाऍं भी कम नहीं
प्रतिबंध भी हैं इन्हीं दिनों बहुतेरे चारोंओर
टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर टेढ़े-मेढ़े बिखरे हैं सच
सीधे रास्ते आता हूँ मैं सीधी कार्रवाई जैसे
झुरमुटों से आता हूँ निर्मल उजास हूँ मैं
चार बूँदें पसीना है क़ीमत मेरी.
