जुमलों की झोली और उत्तर प्रदेश का अधूरा भविष्य

जुमलों की झोली और उत्तर प्रदेश का अधूरा भविष्य

रत्ना भदौरिया

उत्तर प्रदेश के बाबा जी जुमलों की झोली लेकर घूम रहे हैं। उस झोली में महिलाओं के लिए लुभावने उपहार हैं, युवाओं के हिस्से में बेरोज़गारी की लंबी प्रतीक्षा है और भविष्य के नाम पर कुछ चमकते हुए वादे। मगर सवाल यह है कि क्या किसी प्रदेश का भविष्य उपहारों की घोषणा से बनता है, या उन बुनियादी व्यवस्थाओं से, जिनके अभाव में एक पूरी पीढ़ी अपना वर्तमान खो देती है?

महिलाओं को उपहार देने की घोषणा करना आसान है; उन्हें भयमुक्त जीवन, सम्मान, सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता देना कठिन। युवाओं को रोजगार की पर्चियों के सपने दिखाना आसान है; उनके हाथों को ऐसा काम देना कठिन, जिससे वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें। सत्ता अक्सर आसान कामों का उत्सव मनाती है और कठिन सवालों के सामने मौन की दीवार खड़ी कर देती है।

जिस उत्तर प्रदेश को सुनहरे भविष्य की तस्वीरों में सजाया जा रहा है, उसी के स्कूलों में शिक्षा की बुनियादी सुविधाओं का सवाल खड़ा है। कितने विद्यार्थियों के पास पढ़ने के लिए समुचित पुस्तकालय हैं? कितनों को शांत अध्ययन-कक्ष और पर्याप्त शैक्षिक संसाधन उपलब्ध हैं? कितने युवा केवल प्रतिभा और मेहनत के बल पर आगे बढ़ सकते हैं, बिना इस चिंता के कि साधनों की कमी कहीं उनके सपनों को उनसे पहले बूढ़ा न कर दे?

जिस प्रदेश में किताबों तक पहुँच एक संघर्ष हो, वहाँ सुनहरे भविष्य के विज्ञापन किस अँधेरे को ढँक रहे हैं?

स्वास्थ्य व्यवस्था का सच भी मंचों की रोशनी से नहीं, अस्पतालों की वास्तविक स्थिति से सामने आता है। बीमारी किसी भाषण की प्रतीक्षा नहीं करती। उसे दवा चाहिए, चिकित्सक चाहिए, बिस्तर चाहिए और समय पर उपचार चाहिए। गरीब की साँस किसी सरकारी नारे से नहीं बचती। उसके लिए व्यवस्था का अर्थ किसी उत्सव का मंच नहीं, जीवन और मृत्यु के बीच खड़ा एक भरोसेमंद हाथ है।

कोरोना महामारी के वे भयावह दिन आज भी हमारी सामूहिक स्मृति पर एक गहरे घाव की तरह दर्ज हैं—नदियों के किनारों पर मिले शव, गंगा में बहते और तटों पर दफनाए गए मृतकों के दृश्य, अपनों को खोते परिवार और उपचार के लिए भटकते लोग। वे दृश्य केवल एक त्रासदी की याद नहीं, बल्कि इस सवाल की विरासत हैं कि संकट की घड़ी में व्यवस्था अपने नागरिकों के साथ कहाँ खड़ी थी। उन मृतकों की स्मृति को किसी राजनीतिक दावे के नीचे दबाया नहीं जा सकता।

और अब, जब विकास की सुनहरी तस्वीरें फिर सामने रखी जाती हैं, तब उन सवालों का उत्तर भी सामने आना चाहिए। कितने युवाओं को स्थायी रोजगार मिला? सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता और संसाधनों में क्या सुधार हुआ? अस्पतालों में उपचार की उपलब्धता कितनी बढ़ी? महिलाओं की सुरक्षा और स्वावलंबन के लिए कौन-से ठोस परिणाम हासिल हुए?ये सवाल किसी प्रदेश की छवि बिगाड़ने के लिए नहीं, उसकी वास्तविक स्थिति समझने के लिए हैं।

क्योंकि प्रदेश की तरक्की होर्डिंग पर चमकते रंगों से नहीं, नागरिकों के जीवन में आए बदलावों से मापी जाती है। सत्ता की सफलता इस बात में नहीं कि वह कितनी बार अपने विकास का ढोल पीटती है, बल्कि इसमें है कि उसे अपने नागरिकों के प्रश्नों से कितना कम बचना पड़ता है।

जुमलों की झोली कुछ समय के लिए आँखों को चमका सकती है, लेकिन खाली पुस्तकालय, रोजगार की प्रतीक्षा में खड़े युवा, उपचार के लिए भटकते परिवार और सुरक्षा की माँग करती महिलाएँ उस चमक का हिसाब माँगती रहेंगी।

उत्तर प्रदेश को केवल सुनहरे भविष्य की तस्वीर नहीं चाहिए; उसे ऐसा वर्तमान चाहिए जिसमें युवा अपने सपनों के लिए पलायन को मजबूरी न समझें, महिलाएँ उपहारों से पहले अपना सम्मान और सुरक्षा महसूस करें, विद्यार्थी संसाधनों के अभाव में पीछे न छूटें और किसी बीमार परिवार को इलाज के लिए अपनी असहायता न बेचनी पड़े।

क्योंकि प्रदेश का भविष्य झोली में रखे वादों से नहीं बनता—वह उन हाथों से बनता है, जिन्हें रोजगार मिले; उन आँखों से, जिन्हें किताबें मिलें; और उन साँसों से, जिन्हें समय पर इलाज मिले।

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