ऑंतरिक बेचैनी का रचनात्मक अवकाश है कविता.

लेख

ऑंतरिक बेचैनी का रचनात्मक अवकाश है कविता

राजकुमार कुम्भज

मेरी कविताऍं,मेरी ऑंतरिक बेचैनी का रचनात्मक अवकाश हैं.अवकाश से आशय और अभिप्राय यही है कि एक बेचैनी से दूसरी बेचैनी के बीच जो अभिव्यक्त हुआ है,वह मुझे कुछ समय के लिए मुक्त करता है और मुक्त रखता है.बाद इसके दूसरी बेचैनी और फिर दूसरी कविता का प्रस्फुटन.कलंक यह है कि हर बेचैनी अधूरी है और हर कविता अधूरी है.

इसलिए यह कहने और स्वीकारने में मुझे कोई संदेह,परेशानी अथवा दिक़्क़त नहीं है कि मैं अधूरी कविताओं का अधूरा कवि हूँ.मैं पूर्णतः कवि होने का दावा भी नहीं कर सकता हूँ.ये विनम्रता नहीं,बल्कि एक संवेदनशील संक्षिप्त सच्चाई है.

दूसरी सच्चाई ये है कि कविता ज़िम्मेदारी सिखाती है.कविता ज़िम्मेदारी के लिए,ज़िम्मेदारीपूर्वक लड़ना सिखाती है.कविता सिखाती है कि पृथ्वी सभी का घर है,जिसमें विभिन्न स्तरों पर विभिन्न विविधताऍं सदैव ही गूंजती रहतीं हैं और कविता ये भी सिखाती है कि अंधेरों के बावजूद उपलब्ध होने वाले उजास पर सभी का बिना शर्त समान अधिकार है.

उजास पर एकाधिकार की अवधारणा का निरंतर प्रतिरोध करना कविता का मूल आचरण है.कविता के इस ऐतिहासिक आचरण में ईमानदारी से विचरण करना कदापि सहज उपक्रम नहीं है.वह एक असामान्यता है.असामान्यता का होना,कविता में लोकतंत्र के लोकार्पण का होना है.

कविता के लोकतंत्र में असामान्यता और असहमति के प्राण बसते हैं.असामान्यता और असहमति के लिए कविता में पर्याप्त सम्मानजनक जगह तथा सहमति ज़रूरी है, लेकिन अगर असहमति के लिए सम्मान और जगह में संकुचन आ रहा है,तो इसका एक ही अर्थ है कि लोकतंत्र ख़तरनाक मानव-निर्मित,मानव-विरोधी मोड़ पर है.जहां आम आवाज़ें ग़ायब हैं.जहां पुकारती पुकारें ग़ायब हैं.बस एक प्रायोजित भीड़ है चारों ओर,जो विचारहीनता के सौजन्य-सौंदर्य से आच्छादित होकर विकलतापूर्वक कानफोड़ू शोर मचा देने के लिए अभिशप्त है.ये मामला न सिर्फ़ असामान्य विस्मयकारी है,बल्कि लोकतंत्र के भविष्य को भी संदिग्ध बनाता है.

कविताओं का संसार असामान्य विस्मयकारी विचित्रताओं से भरा एक ऐसा हांफता-कांपता संसार है,जिसमें मनुष्यता की खोज निरंतर प्रश्नाकुल बनी रहती है.

मैं क्या कुछ लिखना चाहता हूं और क्या कुछ लिख जाता हूं,सच कहता हूं कि ज़रा भी समझ नहीं पाता हूं. प्रश्न हैं कि निरंतर-निरंतर बनते-बिगड़ते रहते हैं और मैं निरंतर-निरंतर उलझता रहता हूं. बस यही और इतना ही कह सकता हूं कि मेरी कविताओं ने मुझे जीवन जीने का वह सलीक़ा और साहस सिखाया है,जो किसी भी पुस्तक में नहीं है.

यहां ये कहना ज़रा भी अन्यथा नहीं है कि समय और समाज से बड़ा दूसरा पुस्तकालय संसार में कहीं भी नहीं है.संसार का यही पुस्तकालय संसार को सब कुछ सिखाता है.मैंने कोशिश की और मैं सीखता गया. मैं सीखता गया और‌ लिखता गया. मैं लिखता गया और भूलता गया. मैं भूलता गया और फिर-फिर लिखता गया. कबीर की भाषा में कहूं, तो मैं जागता रहा और भागता रहा.

इस तरह लिखने-भूलने और जागने-भागने के बीच,सीखने-समझने की अपार संभावनाओं के कौतुक उपलब्ध हुए, जिसमें हार-जीत को, कुटिलतापूर्वक स्थानांतरित होते देखने की अपार विशेषताऍं,अपार विचित्रताऍं और अपार विविधताऍं देखने को मिलीं. आश्चर्य यही रहा कि वहां मुझे, उनमें, वे सब की सब अपनी ही परछाइयां नज़र आईं.

वैसे देखा जाए तो परछाइयां या तो धूप में नज़र आती हैं या कि फिर जल में.

दर्पण और कविता में वे जो परछाइयां नज़र आती हैं,वे तमाम-तमाम परछाइयां कविता की कोशिश हैं.

कविता की कोशिश का नितांत निजी होते हुए भी,नितांत निजी रह पाना नितांत असंभव है और जो असंभव है उसे संभव कर देना राजनीतिक-कला है.

समकालीन राजनीति के विचारहीन कलात्मक आंदोलनकारी समीकरणों ने हर निजता और निजता की सुकोमल आभासी परछाइयों का अपहरण कर लिया है.

ये परछाइयां बनते-बनते बिगड़ने लगती हैं, बल्कि बनने से पहले ही बिगाड़ दी जाती हैं. या यों कहें कि स्थापित सत्ताऍं, संभवतः प्रत्येक परिवर्तनकारी वयस्क-विचार की भ्रूण-हत्या का भागीदार बन जाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं.

इन परछाइयों को देखने-दिखाने की पर्याप्त स्वतंत्रताऍं होती हैं. हर कोई अपनी-अपनी अर्जित‌ परंपराओं,विचारधाराओं तथा सामाजिक-सांस्कृतिक-सॅंस्कारों के अनुसार अपनी-अपनी परछाइयों का आकलन कर सकता है.चूंकि आजकल धूप और जल के छल अनेक हैं.

किसी भी छल-कपट की महत्ता को कविता सिरे से अस्वीकार करती है, किन्तु सामान्य मनुष्य के सामान्य सामाजिक जीवन में,वे जो तमाम-तमाम अवांछित-सॅंस्कारसंपन्न शक्तियां सक्रिय हैं, उनके लिए तो उनकी छल-कपटपूर्ण व्यवहार-कुशलताऍं ही अधिक महत्वपूर्ण और मूल्यवान आभूषण हैं.

कविता अगर किसी भी दमन और शोषण के प्रतिरोध में हिस्सेदार नहीं है, तो वह अपनी मौलिक आभा और आज़ादी के अवमूल्यन का कारण भी सहज ही हो जाती है. माना कि कविता नारा या बयान नहीं है,लेकिन नारा या बयान बन जाने से कम भी तो नहीं है?

कविता की पक्षधरता तथा मनुष्यता की पक्षधरता को आख़िर कैसे परिभाषित किया जा सकता है?

कविता बेचैन हवाओं की भाषा का औज़ार है. मैं एक कवि हूं और जैसाकि स्वाभाविक ही है कि मैं अपने समकालीन समाज के आसपास को देख-समझकर बेचैन हो जाता हूं.एक बेचैनी के बाद दूसरी बेचैनी और फिर इसी संताप में एक कविता के बाद दूसरी कविता का प्रस्फुटन.

अंततः और अतएव आग्रह यही है कि मेरी कविताऍं, मेरी ऑंतरिक बेचैनी का रचनात्मक अवकाश के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं.

21.10.26

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