प्रेम के पलों को सहेजती कहानियां

मनोज कुमार प्रीत के कहानी संग्रह समझोगे नहीं तुम पर समीक्षात्मक टिप्पणी

प्रेम के पलों को सहेजती कहानियां

जयपाल

 

समझोगे नहीं तुम मनोज कुमार प्रीत का कहानी संग्रह है जिसे प्रीत साहित्य सदन, लुधियाना ने पिछले साल ही 2025 में प्रकाशित किया है l इस संग्रह में बिना शीर्षक सात कहानियां हैं जिनका अंत ‘समझोगे नहीं तुम’ अर्थात पुस्तक के शीर्षक से ही होता है। हालांकि सुविधा के लिए इन्हें क,ख,ग,घ,ङ,च और छ उप शीर्षकों में बांटा गया है। कहानियों को इस तरह के शीर्षक देना नया प्रयोग हो सकता है लेकिन पाठक के लिए यह असुविधाजनक है। पाठक के लिए शीर्षक बहुत महत्वपूर्ण होता है, विशेषकर उन कहानियों को याद रखने के लिए और उसकी आगे चर्चा के लिए। प्रेमचंद की बहुत सी कहानियों को आज हम उनके शीर्षकों के कारण ही याद रख पाए हैं l
बहरहाल इन कहानियों को मानवीय संबंधों के अन्तर्विरोधों की कहानियां कहा जा सकता है । सातों कहानियां एक तरह के परिवेश को बुनती हैं।इन कहानियों में जहां बचपन की नजदीकियां और युवा अवस्था का प्रेम है वहां जीवन के संघर्ष और परिवार के दबाव के कारण नायक और नायिका का एक दूसरे से दूर चला जाना केंद्रीय विषय है l क और घ कहानी का कथानक इसी विषय के इर्द-गिर्द घूमता है। इन दोनों कहानियों में नायक और नायिका के जीवन संघर्षों के कारण दोनों की शादी तो नहीं हो पाती लेकिन दोनों शादी के बाद मिल पाते हैं और फिर अपने-अपने रास्ते हो लेते हैं। इन कहानियों में भावनाओं का अतिरेक है। दोनों एक दूसरे के प्रति समर्पित हैं। दोनों के संवाद बहुत ही भावुक कर देने वाले हैं। इन आत्मीय संवादों में लेखक ने अपनी आत्मा को उड़ेल दिया है मानो रचनाकार का अपना जीवन भी इन्हीं संघर्षों से होकर गुजरा हो।

वर्तमान दौर में युवा पीढ़ी का अपने कैरियर के लिए परिवार को भूल जाना यहाँ तक कि समय पर शादी ना करना और अंत में अविवाहित रहने का निर्णय कर लेना निश्चित रूप में युवा पीढ़ी को अनिश्चित जीवन की ओर ले जाता है। संग्रह की ‘ख’ कहानी की मुख्य पात्र मंझली दीदी इसी अनिश्चितता का शिकार है जो माता-पिता की उपेक्षा करती है, कुछ नहीं बताती,अंत तक शादी को टालती रहती है और अविवाहित ही रह जाती है । माता पिता मन मसोस कर रह जाते हैं।
घ अर्थात चौथी कहानी में लगभग पचास साल पहले के ग्रामीण जीवन के परिवार के आत्मीय रहन-सहन, आपसी प्यार और निकट सम्बंधों की कथा है l लेकिन परिवार के कुछ सदस्य अगर आगे बढ़ जाते हैं तो वे पैसे को सब कुछ समझ लेते हैं। इस कहानी का पात्र विनोद भी अपने व्यवसाय के उन्नत हो जाने पर अपने प्रिय मित्र और रिस्तेदार के प्रति संवेदना विहीन व्यवहार करता है। यह टूटते पारिवारिक मूल्यों की कहानी है।

संग्रह की पांचवीं कहानी फागुनी और राजुल की अद्भुत समर्पण की प्रेम कथा है। राजुल के एक्सीडेंट होने के बाद भी वह उसी से विवाह करने का निर्णय लेती है लेकिन उस परिवार के रूढ़ी गत संस्कारों के कारण एक दिन परिवार को छोड़कर चली जाती है लेकिन राजुल कुछ भी समझ नहीं पाता। संग्रह की छठी कहानी रजनी और रानू के आपसी प्रेम की कहानी है जिसमें रानू अपनी बात खोलकर कभी भी नहीं कह पाता । रजनी के बार बार पूछने पर भी वह शादी के लिए हाँ नहीं करता रानू के इस संकोची स्वभाव के कारण रजनी उसे छोड़कर विदेश जाने का निर्णय कर लेती है ।

यह कहानी प्रेम संबंधों में संकोची स्वभाव को एक बड़ी समस्या के रूप में पेश करता है । संग्रह की अंतिम कहानी नाना जी और दोहते का संवाद है । इस संवाद में नाना जी अपने दोहते को अपने गांव के जीवन की रसपूर्ण कथा सुनाते हैं कि किस प्रकार वे गांव में अभाव का जीवन जीते थे लेकिन जीवन में एक सकून था, शांति थी । सबका दुख-दर्द अपना दुख-दर्द था । लेकिन शहर में सुविधाएं तो थी पर जीवन गायब था l सब अपने आप में सिमटे हुए।

कुल मिलाकर सातों कहानियों में मानवीय प्रेम को बचाने का रचनात्मक प्रयास है। यह प्रेम मानवीय मूल्यों, मानवीय परम्पराओं, संयुक्त परिवार की आत्मीयता,आपसी सहयोग,गांव की सादगी आदि में बसा हुआ है। इसके साथ-साथ साथ कहानीकार दो युवा प्रेमियों के बीच उपजे प्रेम के पलों को भी संजोकर रखना चाहता है। इन कहानियों में इस प्रेम की धड़कन को आसानी से महसूस किया जा सकता है l

कहानियों की भाषा बहुत ही सरल और स्वाभाविक है। ये कहानियां भारतीय ग्रामीण जीवन शैली के दस्तावेज हैं। कहानीकार मनोज कुमार प्रीत को बहुत-बहुत बधाई!

पुस्तक-समझोगे नहीं तुम (कहानी संग्रह)
कीमत–200/- पेपर बैक
रचनाकार–मनोज कुमार प्रीत
प्रकाशक—प्रीत साहित्य सदन
लुधियाना (पंजाब)-141008

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