जसवीर त्यागी की बेरोजगारी केंद्रित कविताएँ
सूखा
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शिक्षा की सर्वोच्च डिग्री लिए
एक बेरोजगार युवा मुझसे मिलने आया
आने से पूर्व मिलने का समय मांगा
औपचारिक दुआ-सलाम के बाद
मैंने पूछा-खाना खाओगे?
वह बोला-गुरुजी आप क्यों परेशान होते हैं?
उसका कथन मेरे सवाल का उत्तर न था
मैंने भोजन की थाली मंगवायी
भोजन करने के बाद
उसमें अपने दुःख को कहने की कुछ हिम्मत आयी
संसार में,न जाने कितने काबिल युवा हैं?
जो लंबे समय से बेरोजगारी की बीमारी से ग्रस्त हैं
बेरोजगारी महामारी की तरह
दिन-प्रति-दिन फैलती जा रही है
युवाओं के स्वप्न
झरनों की तरह सूखते जा रहे हैं
इस दुर्दांत समय में
सिर्फ़ संवेदनाओं के सरोवर ही नहीं सूख रहे हैं
इंसान की आँखों का पानी भी सूखता जा रहा है।
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चार लड़के और शहतूत का पेड़
चार लड़के चारों मित्र
चारों बेरोज़गार
चारों हंसते-रोते हैं साथ-साथ
निकलते हैं साथ-साथ
रोज़गार की तलाश में
एक जगह से दूसरी
दूसरी से तीसरी
लौटते हैं जब वे घर शाम को
बग़ैर बताए ही जान लेते हैं
गुजरे दिन का हाल
चारों लड़कों को न लगती है धूप
न बारिश और न ही ठण्ड
बेरोज़गारी की एक लंबी काली चादर
हर वक़्त तनी रहती है उन पर
चारों लड़के पढ़ते हैं अख़बार
भागते हैं यहां से वहां
देते हैं परीक्षाएँ
करते हैं देर रात तक सवाल-जवाब
चिलचिलाती धूप में लौटते हैं घर
हाथों में थामें
ऊँची-ऊँची डिग्रियाँ
राह में एक दिन
मिलता है शहतूत का पेड़
चारों लड़के रूककर देखते हैं
शहतूत से लदा पेड़
एक ने कहा– शहतूत
मीठे होंगे– दूसरे ने कहा
आख़िरी बार
कब खाए थे शहतूत ?
याद नहीं आ रहा
तीसरा सोच रहा है टहनी पकड़े
चौथा चुप और शांत,
सोच रहा है
आदमी और पेड़ के सबंधों पर
चारों लड़कों ने
एक अलग सिरे पर रख दी हैं
ऊँची- ऊँची डिग्रियां
चारों लड़के मिल रहे हैं पेड़ से
मानो उनका कोई ज़िगरी दोस्त
लौटा है फ़ौज से
लम्बे अरसे के बाद
चारों लड़के भूल गए हैं
उन्हें तलाश है रोज़गार की
भूल गए हैं दुनियादारी का जमा-घटा
उनके सामने है अब
किस डाल पर लटके हैं?
ज्यादा से ज्यादा शहतूत
चारों लड़के मस्त हैं
जब दुनिया के
तमाम पहुंचे हुए लोग
सब कुछ निगल जाना चाहते हैं
एक ही घूँट में
ऐसे अभिन्न दौर में चारों लड़के
सभी में बाँट देना चाहते हैं
थोड़े- थोड़े शहतूत
चारों लड़के चले जाएंगे
अलग- अलग चारों दिशाओं में
चाहकर भी मिल नहीं पाएंगे
अगर मिलेंगे भी
तो कहाँ खा पाएंगे ?
इकट्ठे मिलकर शहतूत
चारों लड़के गुम हो जाएंगे
दुनिया की भीड़ में
भूल जाएंगे मीठे-मीठे लम्बे शहतूत
भूल जाएंगे शहतूत का पेड़
लेकिन कैसे भूल पाएगा पेड़
कि एक दिन तपतपाती धूप में
आए थे चार बेरोज़गार लड़के ।
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बारोज़गार
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ऊँची-ऊँची डिग्रियाँ लिए
बेरोज़गार युवक-युवतियों को जब देखता हूँ
मन दुःख की दलदल में डूब जाता है
उनके सपने किसका शाप भोग रहे हैं?
वे किस अपराध की सजा काट रहे हैं?
वे कब तक
अपनी इच्छाओं के शिशुओं को
बिलखता हुआ लखते रहेंगे?
वे बेरोज़गार
कब तक अपने माता-पिता की बीमारियों का
घरेलू उपचार करते रहेंगे?
भाई अपनी बहनों को कब तक
राखी के त्योहार पर
झूठे आश्वासन देते रहेंगे?
बेरोज़गार युवक-युवतियाँ
कब तक हितैषियों के सवालों का
सामना करते रहेंगे?
क्या कर रहे हो आजकल?
कब उनकी जिंदगी की गाड़ी
पटरी पर प्रवेश पायेगी?
जब भी किसी बेरोज़गार को देखता हूँ
सोचता हूँ
कौन-सा दिन होगा वह
जब वे बेरोज़गार नहीं
बारोज़गार कहलाएंगे।
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बेरोजगार
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बेरोजगार लड़का
रात को दबे पाँव घर में घुसता है
यह सोचकर,कि बूढ़े पिता सो चुके होंगे
पिता हकीकत जानते हैं
नींद की मुद्रा बनाकर
मुँह फेरकर लेटे रहते हैं
पिता और पुत्र
दोनों को सच्चाई पता है
कोई अनभिज्ञ है
तो वह रोजगार है।
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बेरोज़गार लड़का
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रोज़मर्रा की दिनचर्या के अनुरूप
बेरोज़गार लड़का निकल पड़ा है घर से
रोज़गार की तलाश में
लड़का कई जगहों पर जाकर
सवाल-जवाब करेगा
और एक द्वार खुलने की आस लिए
कई द्वार खटखटाएगा
इस तरह खाली पेट
पीकर दो-चार कड़वे अनुभवों के घूँट
लौट आएगा रीते हाथ शाम को घर
लड़का इस बात से अनभिज्ञ है
कि रोज़मर्रा की दिनचर्या के अनुरूप
उसके घर से निकलने के बाद
किसी ने बजाई होगी मन्दिर की घण्टी
फैला दी होगी अगरबत्ती की महक चारों ओर
चमचमा उठी होगी दीये की लौ
हाथ जोड़े कोई खड़ा होगा ध्यानमग्न
शीश झुका दिया होगा किसी ने
आराध्य के चरणों में
और आँखों की कोरों से चुपचाप
ढुलक गये होंगे कुछ आँसू चढ़ावे के रूप में
रोज़मर्रा की दिनचर्या के अनुरूप।
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कागज़-कलम
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दुनिया के
सबसे सुंदर कागज़-कलम हैं वे
जो किसी बेरोजगार को
रोज़गार मिलने की ख़ुशी देते हैं।
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छुट्टी
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इंसान के पास रोज़गार हो
तो छुट्टी किसी फूल-सी लगती है
रोज़गार के बिन
किसी शूल-सी चुभती है।
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खोटे सिक्के
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वे लगभग अपनी आधी उम्र पार कर चुके थे
नौकरी तलाशते-तलाशते थक गये उनके पांव
पकने लगे बाल
अख़बार और किताबों को उलटते-पलटते
आँखों के इर्द-गिर्द बनते टूटते थे जाले
वे अब भागकर नहीं पकड़ पाते थे
अपनी रोज़मर्रा की बस
पूछे जाने पर
झट से नहीं बता पाते थे
वीर रस का स्थायी भाव
उनकी जीवन की बगिया से
धीरे-धीरे सूखते चले गये
लाल,पीले,और गुलाबी रंगों के फूल
प्रेमिकाएं रोती-बिलखती
करती हुई बार-बार मिन्नतें मनुहार
ब्याही गयीं सात समन्दर पार
वे माँ-बाप,घर-परिवार,समाज
सभी की निगाहों में खोटे सिक्के ही साबित हुए
वास्तव में उनकी हालत
संग्रहालय में रखी प्राचीन पुस्तकों जैसी थी
जिनके अनमोल पृष्ठ पलटे जाने पर हर बार
डर लगता था फट जाने का ।
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दुविधा
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बड़ी दुविधा है
बारोज़गार के लिए
बेरोजगार से
संवाद करना।
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बेरोज़गार की नींद
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बेरोज़गार को
देर से आती है नींद
संवेदनाओं की सड़क पर
विचारों के वाहन
देर रात तक
आते-जाते रहते हैं।
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बेरोजगार
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वह सौ रुपये का फटा हुआ
कोई नोट था
फेंकना कोई चाहता न था
लेकिन! पास भी
कोई रखना चाहता न था।
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बेरोजगार
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वह सौ रुपये का फटा हुआ
कोई नोट था
फेंकना कोई चाहता न था
लेकिन! पास भी
कोई रखना चाहता न था।
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बेरोजगार
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मन की मुंडेर पर
खामोशियों की झालर
टँगी रहती है
हलचल की हवा चलती है
हौले-हौले झालर हिलती है।
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वे आसमान के सितारे हैं
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सरकार को,नेता को
अपने-अपने क्षेत्र के
भूखे,बेघर,गरीब लोगों के लिए
रहने-जीने की व्यवस्था करनी चाहिए
निर्धन,बेघर,बेरोजगार मजदूर
सिर्फ़ वोट बैंक नहीं है
वे भी हमारी-तुम्हारी तरह
जीते-जागते इंसान हैं
वे जीवन संघर्ष और
चुनौतियों की चट्टानी पहचान हैं
उनके ख़ून पसीने से ही
जिन्दगी के अंधेरे हारे हैं
उनके बलबूते ही
दुनिया के चमत्कार सारे हैं
वे भी इंसानियत के आसमान के
चमकते सितारे हैं
वे भी किसी की
आँख के तारे हैं।
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बेरोज़गार लड़का
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रोज़मर्रा की दिनचर्या के अनुरूप
बेरोज़गार लड़का निकल पड़ा है घर से
रोज़गार की तलाश में
लड़का कई जगहों पर जाकर
सवाल-जवाब करेगा
और एक द्वार खुलने की आस लिए
कई द्वार खटखटाएगा
इस तरह खाली पेट
पीकर दो-चार कड़वे अनुभवों के घूँट
लौट आएगा रीते हाथ शाम को घर
लड़का इस बात से अनभिज्ञ है
कि रोज़मर्रा की दिनचर्या के अनुरूप
उसके घर से निकलने के बाद
किसी ने बजाई होगी मन्दिर की घण्टी
फैला दी होगी अगरबत्ती की महक चारों ओर
चमचमा उठी होगी दीये की लौ
हाथ जोड़े कोई खड़ा होगा ध्यानमग्न
शीश झुका दिया होगा किसी ने
आराध्य के चरणों में
और आँखों की कोरों से चुपचाप
ढुलक गये होंगे कुछ आँसू चढ़ावे के रूप में
रोज़मर्रा की दिनचर्या के अनुरूप।
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