कविता
सूत्रपात (Inception)
– मंजुल भारद्वाज
1980 के दशक की तस्वीरों की
बाढ़ में डूब गया है
सोशल मीडिया…
क्रांति की होड़ मची है
हर व्यक्ति को लगता है
वो क्रांति कर रहा है
कहीं पीछे ना छूट जाए
इसलिए तुरंत 1980 के दशक की
फ़ोटो सोशल मीडिया पर
अपलोड कर रहा है…
इंस्टेंट क्रांति का यही
इंस्टेंट सुख और मोक्ष
देता है सोशल मीडिया….
और सिद्ध करता है
भेड़ चाल …
Inception एक शब्द है
जिसको अंकुरित करते हैं
मुनाफाखोर
यह पूंजीवादी भी हैं
साम्यवादी भी हैं
लोकतांत्रिक भी हैं
मतलब सब वादी और यादि सम्मिलित हैं
भेड़ बनाने और उनको हांकने में….
1980 में आप आधे अधूरे थे
पूरा होने के लिए
जी जान लगा रहे थे
अधूरे पन को आधे से पूरा कर रहे थे
पर हालत यह थी कि
ना घर के थे
ना घाट के….
आज inception करने वालों ने
उसे स्टाईल बना कर
आपको सेलेब्रिटी बना कर
महंगाई
बेरोज़गारी
पेपर लीक
बाढ़
बलात्कार
मलबे में दबे छात्रों की
मौत,बेबसी और मातम से
एक झटके में मुक्त कर दिया ….
शिक्षा पर बड़ा ज़ोर होता है
शिक्षित व्यक्ति
समाज
देश तर्क शील, विचार शील होता है
पर इंसेप्टर जानते हैं
भावना शिक्षा के ऊपर भारी है
भावना आस्था को सर्वस्व बना
गटर स्नान को मुक्ति बना देती है….
इसलिए
इंस्पेटर भावनाओं से खेलते हैं
छलावा करते हैं
छलावे को देशव्यापी क्रांति बना देते हैं…
सोशल मीडिया का एल्गोरिथम
कैसे किसी व्यक्ति
समूह,समाज और देश का
नैरेटीव एक क्लिक से बदल देता है
और
व्यक्ति,समाज,देश भेड़ बकरी बन
उसको फॉलो करता है…
1980 के दशक की
2026 में हो रही
भेड़ क्रांति की सबको बधाई….
