लघु कथा
शब्दों का वज़न
डॉ. रीटा अरोड़ा
“पापा, आज ऑफिस में मैंने भी उसे साफ़-साफ़ सुना दिया।”
रोहन ने घर आते ही कहा।
पिता ने अख़बार मोड़ते हुए पूछा- “क्या हुआ?”
“वही… मीटिंग में सबके सामने मेरी बात काट दी। लहजा भी ठीक नहीं था। मैंने भी उसी वक्त ऐसा जवाब दिया कि फिर कुछ बोल ही नहीं पाया।”
पिता हल्का-सा मुस्कुराए- “तो तुम्हें अच्छा लगा?”
रोहन थोड़ा ठिठका- “उस समय तो लगा कि मैंने बाज़ी मार ली।”
“और अब?”
“अब… पता नहीं। बात बढ़ गई। माहौल भी खराब हो गया।”
पिता कुछ देर चुप रहे।
फिर बोले- “बेटा, बोलना तो हम बहुत छोटी उम्र में सीख जाते हैं, लेकिन कब, कहाँ और कितना बोलना है, यह सीखने में पूरी उम्र लग जाती है।”
रोहन ने कहा- “लेकिन अगर सामने वाला गलत हो तो चुप भी तो नहीं रहा जा सकता।”
“चुप रहना जरूरी नहीं है,” पिता ने कहा, “पर हर जवाब ऊँची आवाज़ में देना भी जरूरी नहीं।”
“तो क्या करें?”
“अपनी बात कहो, लेकिन इस कोशिश में मत रहो कि आखिरी शब्द तुम्हारा ही हो।”
रोहन चुप हो गया।
पिता बोले- “हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि भाषा सिर्फ तर्क जीतने के लिए नहीं होती। यही भाषा प्यार जताती है, रिश्ते बनाती है, ज्ञान बाँटती है और किसी का दिल भी रख लेती है।”
“पर कभी-कभी गुस्सा आ ही जाता है।”
“आएगा,” पिता ने सहजता से कहा, “तभी तो असली परीक्षा होती है। सामने वाले का व्यवहार उसके बारे में बताता है, लेकिन तुम्हारा जवाब तुम्हारे बारे में।”
रोहन ने धीरे से पूछा- “मतलब बात सही हो, फिर भी बोलने का तरीका गलत हो सकता है?”
“बिल्कुल। सही बात भी गलत लहजे में कही जाए तो उसका असर खो जाता है।”
कुछ देर बाद रोहन बोला- “शायद मैं आज अपनी बात मनवाने से ज्यादा, खुद को सही साबित करने में लगा था।”
पिता मुस्कुराए- “यही तो फर्क समझना है।”
फिर धीमे से बोले-
“सवाल चाहे कितनी भी बदतमीज़ी से पूछा जाए, जवाब सलीके से देना। लोग अक्सर सवाल भूल जाते हैं, लेकिन आपका जवाब याद रखते हैं।”
रोहन ने सिर झुका कर कहा- “अगली बार जवाब देने से पहले सोचूँगा।”
पिता बोले- “बस इतना ही काफी है। शब्द छोटे होते हैं बेटा, लेकिन उनका वज़न बहुत बड़ा होता है।”
रोहन मुस्कुराया।
शायद उस दिन उसने बोलना नहीं,
बोलने का सलीका सीखा था।
~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
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