जसवीर त्यागी की पृथ्वी घूमती है और अन्य कविताएं
पृथ्वी घूमती है
=========
मैंने एक सुंदर भव्य चमकदार
घर देखा
उसकी हर चीज बोलती थी
पेड़-पौधे,पत्थर
यहाँ तक की पालतू जानवर भी
अपनी ओर खींचते थे
घर के बाहर लगी नेमप्लेट पर
पति-पत्नी दोनों के नाम अंकित थे
पति का नाम पहले
पत्नी का पीछे था
जबकि स्त्री एक राजनैतिक पद पर थी
पुरुष सिर्फ पति था
पुरूष को बचपन की पाठशाला में पढ़ा पाठ
आज तक याद था
कि पृथ्वी
सूर्य के इर्द-गिर्द घूमती है।
■
कविता
÷÷÷÷
कोई मार्मिक कविता पढ़ता हूँ
पढ़ने के बाद
बेचैन हो जाता हूँ
इसलिए नहीं
कि मुझे कोई बीमारी है
दरअसल सच तो यह है
मार्मिक कविता पढ़कर
पाठक बेचैन न हो
यह बीमारी है।
■
दुःखों का विस्तार
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷
दुःख बढ़ रहे हैं
नये-नये दुःख जन्म ले रहे हैं
दिन-प्रति-दिन
दुःखों का दायरा बढ़ता जा रहा है
दुःखों को दूर करने वाली दवाईयां
कम हो रही हैं
दुःखों को समझने
और सुलझाने वाले इंसान घटते जा रहे हैं
दुःख व्यापक
और उनके निदान सिकुड़ते जा रहे हैं
व्यापकता और सिकुड़न के बीच
दाने-सा पिसता हुआ इंसान
पल-पल कम हो रहा है।
■
तुम वीर योद्धा हो
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷
तुम्हें लगता है
तुम्हारे दुःख ज़्यादा हैं दूसरों से
तुम्हारे ही आँगन में
टूटकर गिरा है परेशानियों का पहाड़
दुःख के तूफान ने
तहस-नहस की है
सिर्फ़ तुम्हारी ही खुशियों की
हरी-भरी क्यारियाँ
जैसे तुम दुःख को जानते हो
वैसे ही वह भी जानता है तुम्हें
दो-चार बार के वार से
तुम घुटने टेकोगे नहीं
छोड़कर नहीं जाओगे रण भूमि
नहीं करोगे पराजय स्वीकार
जीवन-समर में लड़ोगे तुम
अपनी अंतिम साँस तक
शूरवीर हो
लड़ोगे दुःख रूपी दुश्मन से बार-बार
दुःख उतरता है
अपनी पूर्ण शक्ति के साथ
तुमसे जीतने के लिए
वह अच्छी तरह जानता-समझता है
उसका मुकाबला है अपराजेय संग
दुःख बार-बार
चुपके-चुपके पग धरता है
वह भी सच्चे वीर योद्धा से डरता है।
हँसी
÷÷÷
जंजाल के जंगल में फँसे
आदमी के लिए
बाहर निकलने का रास्ता है
हँसी।
■
यकीं
÷÷÷
मंजिल है दूर
रास्ता है लंबा
छोटे हैं पाँव
फिर भी है यकीं
पा लूँगा मंजिल
एक दिन
हिम्मत और हौसला
हैं मेरे हमसफ़र
फिर मुझे
किस बात का डर?
●
