एक नर्स की नजर से

एक नर्स की नजर से

रत्ना भदौरिया

कोरोना का समय बीत गया, पर उसकी सबसे भयावह स्मृति शायद उन मौतों में नहीं है जिन्हें हमने देखा, बल्कि उन सवालों में है जिनसे हमने धीरे-धीरे आँखें फेर लीं। जिन दिनों अस्पतालों के बाहर ऑक्सीजन के लिए भटकती भीड़ थी, उन दिनों हमें पहली बार इतनी स्पष्टता से दिखाई दिया था कि मनुष्य की जिंदगी और किसी व्यवस्था की तैयारी के बीच कितना गहरा संबंध है। एक साँस रुकती थी और उसके साथ किसी परिवार का पूरा संसार रुक जाता था। बीमारी अपना काम कर रही थी, लेकिन उसके पीछे हमारी व्यवस्था की कमियाँ भी मृत्यु की ओर धकेल रही थीं।
तब हमें लगा था कि इस त्रासदी के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पहले जैसी नहीं रहेगी। इतनी बड़ी आपदा के बाद शायद सरकारें समझेंगी कि अस्पताल केवल भवन नहीं होते, वे उस विश्वास की अंतिम जगह होते हैं जहाँ नागरिक अपनी असहायता लेकर पहुँचता है। शायद जिला अस्पतालों को इतना सक्षम बनाया जाएगा कि गंभीर मरीज को केवल इसलिए बड़े शहर की ओर न भेजना पड़े कि उसके अपने जिले में जीवन बचाने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। शायद ऑक्सीजन, आईसीयू, वेंटिलेटर, डॉक्टर और नर्सें किसी आकस्मिक संकट की सूची नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य की स्थायी संरचना बनेंगे।
लेकिन समय बीतता गया और महामारी धीरे-धीरे हमारे सार्वजनिक विवेक से उतरती चली गई।
यही विस्मृति सबसे चिंताजनक है।
क्योंकि किसी आपदा से उबर जाना और उससे सीख लेना दो अलग बातें हैं। आपदा समाप्त हो सकती है; उसकी चेतावनी नहीं। अगर एक महामारी ने हमें यह दिखाया कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था कहाँ-कहाँ कमजोर है, तो उसके बाद उन कमजोरियों का बने रहना केवल प्रशासनिक कमी नहीं रह जाता, वह एक सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न बन जाता है।
आज हमें पूछना चाहिए कि उस समय की घबराहट ने हमारी स्थायी तैयारी में कितना रूप लिया। कितने सरकारी अस्पतालों में ऐसी क्षमता विकसित हुई जो अगली बड़ी आपदा के सामने खड़ी रह सके? कितने जिला अस्पतालों में गंभीर मरीज के लिए पर्याप्त बिस्तर, प्रशिक्षित चिकित्सक, वेंटिलेटर और निर्बाध ऑक्सीजन उपलब्ध है? कितनी व्यवस्थाएँ ऐसी हैं जिन्हें किसी महामारी की घोषणा के बाद सक्रिय करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि वे पहले से तैयार हैं?
इन प्रश्नों का महत्व इसलिए नहीं कि हम अतीत को कुरेदना चाहते हैं। इसलिए कि अगली आपदा अतीत की तारीख देखकर नहीं आएगी।
और जब वह आएगी, तब हमारी घोषणाएँ नहीं, हमारी तैयारी काम आएगी।
यहीं से विकास की वह चमक भी थोड़ी संदिग्ध दिखाई देने लगती है जिस पर हम बहुत गर्व करते हैं। किसी देश की समृद्धि केवल उसकी ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और विशाल निर्माणों से नहीं आँकी जा सकती। उसकी वास्तविक समृद्धि उस क्षण में दिखाई देती है जब उसका सबसे कमजोर नागरिक संकट में पड़ता है और राज्य उसके पीछे खड़ा मिलता है।
इसलिए मंदिरों का प्रश्न उठाना मंदिरों के विरुद्ध होना नहीं है। आस्था मनुष्य की निजी गरिमा का हिस्सा है और उसके लिए बने स्थानों का अपना सांस्कृतिक अर्थ है। प्रश्न वहाँ पैदा होता है जहाँ हम सार्वजनिक संसाधनों और सामाजिक प्राथमिकताओं की बात करते हैं। तब यह पूछना स्वाभाविक है कि जिस समाज में भव्य निर्माण के लिए इच्छाशक्ति और संसाधन जुटाए जा सकते हैं, उसी समाज में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को उसी गंभीरता से मजबूत करने की बेचैनी क्यों नहीं दिखाई देती।
एक मंदिर मनुष्य को आध्यात्मिक आश्रय दे सकता है; अस्पताल उसे जीवन का अवसर देता है। दोनों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना अनावश्यक है। लेकिन जब कोई नागरिक अस्पताल के दरवाजे पर अपनी अंतिम उम्मीद लेकर पहुँचता है, तब उसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि वहाँ डॉक्टर हो, दवा हो, बिस्तर हो, ऑक्सीजन हो और वह तकनीक हो जो उसकी साँस को थाम सके।
उस क्षण उसे किसी बहस की नहीं, व्यवस्था की आवश्यकता होती है।
दुर्भाग्य यह है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की सफलता बहुत शांत होती है। किसी मरीज की जान समय पर बच जाती है तो उसका कोई उद्घाटन नहीं होता। किसी जिला अस्पताल में पर्याप्त डॉक्टर मौजूद रहते हैं तो कोई उत्सव नहीं होता। कोई वेंटिलेटर समय पर चल जाता है और किसी परिवार का घर उजड़ने से बच जाता है—उसकी कोई भव्य तस्वीर नहीं बनती।
शायद यही कारण है कि स्वास्थ्य व्यवस्था राजनीति की दृश्य दुनिया में अक्सर पीछे छूट जाती है।
क्योंकि राजनीति को दिखाई देने वाली उपलब्धियाँ पसंद आती हैं; स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि अक्सर वही होती है जो दिखाई नहीं देती—एक मृत्यु का टल जाना।
लेकिन नागरिक के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
जिस परिवार ने बीमारी के सामने अपनी पूरी जमा-पूँजी खो दी, उसके लिए स्वास्थ्य केवल सरकारी नीति का विषय नहीं है। वह उसके जीवन की आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न है। निजी उपचार की बढ़ती लागत और कमजोर सार्वजनिक व्यवस्था के बीच सबसे अधिक दबाव उसी पर पड़ता है जिसके पास विकल्प सबसे कम हैं। बीमारी उसके शरीर को जितना नहीं तोड़ती, कई बार उसका इलाज उसके परिवार की आर्थिक रीढ़ उतनी ही तोड़ देता है।
ऐसे में मजबूत सरकारी अस्पताल केवल चिकित्सा सुविधा नहीं होते; वे सामाजिक न्याय का एक मौन आधार होते हैं।
वे गरीब आदमी को यह भरोसा देते हैं कि उसकी जिंदगी बाजार में बोली लगने वाली वस्तु नहीं है।
इसीलिए सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना किसी एक विभाग की मांग नहीं, लोकतंत्र की बुनियादी जिम्मेदारी है।
लोकतंत्र केवल यह नहीं कि नागरिक अपनी सरकार चुन सके।
लोकतंत्र यह भी है कि संकट की घड़ी में चुनी हुई व्यवस्था नागरिक को अकेला न छोड़े।
कोरोना ने हमें यही सबसे कठोर पाठ पढ़ाया था।
सवाल यह है कि हमने उसे पढ़ा भी था या केवल परीक्षा समाप्त होने का इंतजार किया था?
आज यदि हम उस समय की ओर पीछे देखते हैं तो हमारे सामने केवल मृत्यु के दृश्य नहीं होने चाहिए। हमारे सामने वे अधूरे काम भी होने चाहिए जो उन मौतों ने हमें सौंपे थे। हमें यह देखना चाहिए कि क्या हमने अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था को इतना मजबूत किया है कि अगली बार ऑक्सीजन किसी परिवार की आखिरी आशा बनकर सड़कों पर न खोजी जाए।
क्योंकि किसी महामारी की सबसे बड़ी त्रासदी केवल यह नहीं कि लोग मरते हैं।
सबसे बड़ी त्रासदी तब होती है जब उनकी मृत्यु के बाद भी व्यवस्था वैसी ही बनी रहती है।
मृतकों को लौटाया नहीं जा सकता।
लेकिन उनकी मृत्यु से निकली चेतावनी को जीवित रखा जा सकता है।
उनके नाम पर स्मारक बनाने से अधिक जरूरी है ऐसी व्यवस्था बनाना जिसमें किसी अगले परिवार को वही शोक न झेलना पड़े।
यही हमारी परीक्षा है।
और शायद यही वह प्रश्न है जिसे हमें बार-बार अपने सामने रखना चाहिए—
हमने कोरोना से केवल मृत्यु देखी थी, या मृत्यु के पीछे खड़ी अपनी व्यवस्था को भी पहचाना था?
अगर पहचाना था, तो अब उसका बदला हुआ चेहरा कहाँ है?
और अगर चेहरा नहीं बदला, तो फिर उन लाखों साँसों की स्मृति हमारे लिए आखिर थी क्या?

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