डॉ रीटा अरोड़ा की कविता- 55 के बाद

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

कविता

55 के बाद

डॉ रीटा अरोड़ा

पच्चपन के बाद
औरत को किसी की तलाश नहीं होती,
उसे बस
अपना पता चाहिए।

बहुत जी लिया उसने
मायके की बेटी बनकर,
ससुराल की बहू बनकर,
बच्चों की माँ बनकर,
किसी की पत्नी बनकर…

हर रिश्ते में
ख़ुद को थोड़ा-थोड़ा बाँटती रही,
और जाने कब
उसका अपना हिस्सा
सबसे छोटा रह गया।

अब वह
सुबह की चाय
अपनी पसंद के कप में पीना चाहती है,
खिड़की के पास बैठकर
कुछ देर चुप रहना चाहती है।

किसी को जवाब दिए बिना,
किसी की नाराज़गी से डरे बिना,
बस…
अपने मन की आवाज़ सुनना चाहती है।

अब कोई पूछे-
“कहाँ जा रही हो?”
तो वह मुस्कुराकर कह सके-
“पता नहीं…
बस थोड़ी देर
ख़ुद से मिलने जा रही हूँ।”

उसे अब
हर बात पर समझौता नहीं करना,
हर दर्द को मुस्कान में नहीं छिपाना,
हर रिश्ते को बचाने के लिए
ख़ुद को नहीं खोना।

वह घूमना चाहती है,
किताबों में खोना चाहती है,
पुराने गीतों पर
चुपचाप मुस्कुराना चाहती है,
और कभी-कभी
बिना किसी वजह के
सजना चाहती है।

अब उसे
किसी की नज़र में सुंदर नहीं लगना,
बस आईने में
ख़ुद से नज़रें मिलानी हैं।

उसका “मैं”
स्वार्थ नहीं है,
यह उन वर्षों की
बची हुई साँस है
जो उसने
सबके नाम कर दी थी।

अब उसके सपने
बहुत बड़े नहीं हैं-
बस एक शांत सुबह,
थोड़ी धूप,
एक प्याला चाय,
कुछ अपने लोग,
थोड़ी-सी यात्रा
और ढेर सारा सुकून।

पच्चपन के बाद
औरत अकेली नहीं होती…

वह बस
पहली बार समझती है कि
ज़िंदगी दूसरों के लिए जीते-जीते
ख़ुद को भूल जाना
त्याग नहीं,
और अब ख़ुद को याद कर लेना भी
स्वार्थ नहीं।

अब वह
ज़िंदगी बदलना नहीं चाहती,
बस…

बची हुई ज़िंदगी
अपनी तरह से जीना चाहती है।

~ डॉ रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

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