यात्रा संस्मरण
गोवा डायरी 2026 (5) चौथा दिन –
साउथ गोवा की ओर, एक हादसा भी…
संजय श्रीवास्तव
चौथे दिन हमने नॉर्थ गोवा से साउथ गोवा की ओर रुख किया। अमूमन गोवा पहली बार जाने वालों के मन में यही सवाल होता है कि वो कहां ठहरें, किस गोवा में जाएं—नॉर्थ या साउथ। पिछली बार पांच साल पहले मैं जब गोवा पहली बार गया तो ये सोचकर गया था कि पांच दिन नॉर्थ में रुकेंगे और पांच दिन साउथ में। लेकिन नॉर्थ का मस्त करने वाला माहौल वहीं का बनाकर रख दिया। हमने तब नॉर्थ को करीब पूरा ही खंगाल मारा था। बस बीच में एक दिन पणजी और ओल्ड गोवा का रुख किया था।

गोवा जाने वाले तमाम लोग कहते हैं कि असली गोवा तो साउथ ही है। वहां सुकून है और गोवा का असली रंग, असली जायका वहीं मिलता है। यकीनन गोवा के ये दोनों जिले अपनी फितरत में एकदम अलग हैं। नॉर्थ में अगर मस्ती, गहमागहमी, तेजी, ग्लैमर और नाइट लाइफ है तो साउथ शांत है। वो अपनी सुकून वाली रफ्तार में रहता है। सैलानी यहां भी खूब आते हैं लेकिन गोवन मस्ती का चटख रंग उन्हें नॉर्थ में ही मिलता है।
नॉर्थ के समुद्र तट यानी बीच बहुत वाइब्रेंट हैं। साउथ के बीच पर सैलानियों की वो भीड़ और गहमागहमी नहीं दिखती, नाइट लाइफ भी उतनी नहीं है। रेस्टोरेंट भी अपेक्षाकृत जल्दी बंद होने लगते हैं। जहां नॉर्थ में सिंक्वेरिम, कैंडोलिम, कैलंगूट, बाघा… सभी एक के बाद एक सटे हुए हैं, वहीं साउथ में सारे नामी बीच दूर-दूर हैं। हां, मैं भी कहूंगा कि अगर आपको गोवा के पारंपरिक घर, गोवन जिंदगी, पुराने बड़े चर्च के साथ सुकून महसूस करना हो तो साउथ आपके लिए है।
वैसे नॉर्थ गोवा में अगर वहां के स्थानीय लोगों से बात करेंगे तो वो साउथ को खारिज कर देंगे और साउथ वाला नॉर्थ की गहमागहमी पर मुंह बिचका देगा। इतिहास की बात करें तो नॉर्थ और साउथ दोनों ही पुराने गोवा की कहानी का हिस्सा हैं। पुर्तगालियों ने 1510 में गोवा के तिस्वाड़ी इलाके पर कब्जा किया था। इसके बाद 1543 में बारदेज और सालसेट भी उनके नियंत्रण में आ गए। यानी नॉर्थ और साउथ के बीच पुराना होने की ऐसी सीधी लकीर खींचना आसान नहीं है।
तो अब कहानी शुरू करते हैं।
हमने साउथ गोवा के कोल्वा में कंट्री व्यू कॉटेज बुक कराया। देखने से ये पुर्तगाली स्टाइल का कोई हेरिटेज भवन जैसा लग रहा था, लेकिन ये कहना चाहिए कि हम वहां जाकर निराश हुए। पता नहीं कैसे उसे Booking.com पर अच्छी-खासी रेटिंग भी मिली हुई है। बेशक वो कोल्वा बीच से 400 मीटर के फासले पर है लेकिन ये गेस्ट हाउस कतई ऐसा नहीं था, जहां ठहरा जाए।
लेकिन बुकिंग करा चुके थे।
उसकी उबड़-खाबड़ टाइल्स में पैर फंसने से मेरी वाइफ के राइट हैंड के अंगूठे पर ऐसी जबरदस्त चोट आई कि हमें छोटा-मोटा ऑपरेशन जैसा इलाज ही कराना पड़ा। आगे के पूरे टूर पर इसका असर पड़ा लेकिन तब भी हमने कोशिश की कि यात्रा को आरामदायक तरीके से जारी रखा जाए।
नॉर्थ गोवा से साउथ जाने के लिए हमने जो कार ली, उसके ड्राइवर संदीप भाटलेकर थे। उम्र में 50 प्लस। मस्तमौला और दुनियादार शख्सियत। उनसे रास्ते में जो बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो चलता ही रहा।
संदीप जबरदस्त कांग्रेस समर्थक। जंतर-मंतर के जेन-जी आंदोलन के पक्ष में। बोले, मैंने तो कांग्रेस को वोट दिया। मेरे सारे कुनबे ने दिया। परिचितों ने दिया। पता नहीं कैसे बीजेपी जीत गई। महंगाई से लेकर शिक्षा व्यवस्था और सिस्टम को लेकर वो लगातार मौजूदा केंद्र और राज्य सरकार को कोसते रहे।
मुझको पहले तो लगा कि ड्राइवर हैं तो मामूली शख्स होंगे। लेकिन ऐसा था नहीं। एक हफ्ता पहले नई क्रेटा खरीदी थी, जिसको खुद चला रहे थे। एक-दो गाड़ियां और चलती हैं। स्कूटी भी किराए पर देते हैं।
बताने लगे कि करीब 15 साल पहले तक किसी कंपनी की कार चलाते थे। फिर वो नौकरी छोड़ी और अपनी कार खरीदकर टैक्सी के रूप में चलाने लगे। बहुत बरक्कत हुई। नया घर बनवाया। उसमें नौ किराएदार रहते हैं। ये सभी टू-बेडरूम के सेट हैं। आगे बताया कि सभी किराएदार रूसी हैं। एक सेट का किराया 25 हजार रुपया है। रूसी अपने बीवी-बच्चों के साथ यहां आते हैं। करीब नौ महीने यहीं रहते हैं और तीन महीने के लिए चले जाते हैं।
मैंने पूछा—वो तो ड्रग्स लेते होंगे, कोई परेशानी नहीं होती?
नहीं, कैसी परेशानी, कोई दिक्कत नहीं।
संदीप का बेटा इंजीनियरिंग पढ़ रहा है। बीवी ग्रेजुएट है और उसको बीएड कराकर सरकारी नौकरी लगा दी। उसका किस्सा भी मौज में बताते हैं कि हमारे यहां के विधायक कामत हैं। मैंने उनकी बहुत मदद की। फिर उनसे कहा—अब तो बीवी की सरकारी नौकरी लगा दो। वैकेंसी जब निकली तो बीवी का हो गया।
उनकी कुछ खेती की जमीनें भी हैं, लेकिन अब खेती कर नहीं पाते।
कुल मिलाकर वह पूरे पैसे में खेल रहे हैं। असली गोवन हैं। गोवा की एनसाइक्लोपीडिया हैं। कुछ पूछो, सब बता देंगे।
कैंडोलिम से कोल्वा 40 किलोमीटर से कुछ ज्यादा ही है। हमें कोल्वा तक पहुंचने में एक घंटे से ज्यादा लगा। कहने लगे कि अगर सीजन का समय होता तो मैं नॉर्थ से साउथ आता ही नहीं, लेकिन इस समय टूरिस्ट कम है तो पैसा भी कमाना है, सो आ गया।
संदीप मुझको याद रहेंगे। उनकी अपनी शख्सियत ही अलग लगी। रास्ते में गोवा के भी दर्शन होते रहे।
गेस्ट हाउस में पहुंचने के बाद वहां की व्यवस्थाएं देखकर मूड ऑफ हो गया। आप सभी लोगों को भी कहूंगा कि होटल बुक करने की साइट्स पर जो रेटिंग होती हैं, वो हमेशा पूरी तस्वीर नहीं बतातीं। ठोक-बजाकर या थोड़ा रिसर्च करके ही कहीं बुकिंग कराइए।
शाम को हम लोग रिलैक्स मूड में कुछ दूर पर स्थित कोल्वा बीच जाने के लिए तैयार हुए ही थे कि श्रीमती जी का अंगूठा बुरी तरह चोटिल हो गया। तुरंत उन्हें लेकर हॉस्पिटल भागना पड़ा।
अपरिचित शहर में अगर कोई हादसा हो जाए तो अस्पतालों के चक्कर बहुत मुश्किल में डालने वाले होते हैं। लेकिन कुछ अच्छे लोग भी मिल जाते हैं। जैसे उस दिन जिस टैक्सी से मैं वाइफ को लेकर भागा, उसके ड्राइवर लूकस ने पांच घंटे तक हॉस्पिटल पर हमारा इंतजार किया। उसकी एवज में बहुत वाजिब पैसा लिया। अगले दिन भी ड्रेसिंग के लिए अस्पताल ले जाने सुबह हाजिर हो गए।
अस्पताल से लौटते-लौटते रात के नौ बज गए। वाइफ के अंगूठे में छोटे से ऑपरेशन जैसे ट्रीटमेंट के बाद टांके और पट्टियां बंध चुकी थीं।
रात में हमने कोल्वा बीच पर बने शेक में ही खाना खाया। इससे बीच पर समुद्री लहरों और बीच पर हल्की चहलकदमी भी हो गई।
आप सोच रहे होंगे कि शेक का मतलब क्या होता है।
समुद्री बीच पर बनी झोपड़ीनुमा कैफे या खाने-पीने के रेस्टोरेंट्स को शेक कहा जाता है। गोवा में ये आमतौर पर लकड़ी, बांस, नारियल या ताड़ की पत्तियों जैसी हल्की सामग्री से बनी अस्थायी संरचनाएं होती हैं। यहां खाना भी मिलता है और बार जैसी व्यवस्था भी रहती है। गोवा की पर्यटन व्यवस्था में इन शैक्स के लिए बाकायदा लाइसेंस और नीतियां भी रही हैं।
उसकी मैनेजर 50 साल से ऊपर की महिला जोए फिलिप्स थीं। नेकर और टी-शर्ट पहने हुए। बताया, मेरे पेरेंट्स साउथ के हैं। मैं पैदा मुंबई में हुई। उसके बाद पेरेंट्स के साथ पंजाब में रही और अब गोवा में हूं।
हमें देखते ही तपाक से हमारे पास आईं। वाइफ का हालचाल पूछा। हमने वहां मिक्स वेज सब्जी और चावल का ऑर्डर दिया। साथ में जंगली जूस नाम से विख्यात गोवा के फेमस लोकल ड्रिंक का ऑर्डर दिया। वो मेरे और बेटे के लिए आ गया।

यह दरअसल गोवा का स्थानीय उराक था, जिसे कई जगह बोलचाल में ‘जंगल जूस’ भी कहा जाता है। यह काजू फेणी की पहली डिस्टिलेशन से मिलने वाला हल्का अल्कोहलिक पेय है और फेणी की तुलना में कम तीखा होता है।
हल्के रंग का, हल्का नशीला और सुरूर देने वाला। स्वाद बेमिसाल और जीभ पर एक खास खरखरा सा सुरूर देने वाला।
हमारे अगल-बगल कई जोड़े और परिवार बैठे हुए थे। सभी की टेबल्स पर बीयर या अल्कोहल के सिप। साथ में सामने हर पल आती लहरें और उनकी आवाज।
शेक का खाना ताजा होता है और आमतौर पर टेस्टी भी। जब हम खाना खाकर लौट रहे थे तो करीब 11 बज रहे थे। इससे पहले हमने बीच पर फिर हल्की चहलकदमी की।
कोल्वा समुद्र तट की बालू सफेद और ज्यादा महीन थी। समुद्र पर वह नॉर्थ गोवा की बालू की तुलना में ज्यादा कठोर लगी। गोवा पर्यटन विभाग भी कोल्वा को अपनी सफेद रेत और लंबी समुद्री पट्टी के लिए खास तौर पर वर्णित करता है।
रात में जब हम सोने की कोशिश कर रहे थे तो सामने से बड़े चरागाह में झिंगुर आर्केस्ट्रा पार्टी अपनी तान छेड़ रही थी।
(सिलसिला जारी रहेगा)
संजय श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से साभार
