जसवीर त्यागी की ट्यूब लाइट और अन्य कविताएं
ट्यूब लाइट
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घर में एक पुरानी ट्यूब लाइट है
लप-लप,झप-झप करती हुई
वह अक्सर देर से जलती है
घर वाले कई बार झुंझलाते हुए कहते हैं-
बदल क्यों नहीं देते इसे?
आजकल एक-से-एक बढ़िया चमकदार
दूधिया रोशनी वाली
ट्यूब लाइटें आ रही हैं बाज़ार में
उनका कहना सही भी है
चाहूँ तो हटा सकता हूँ
उस पुरानी लाइट को
झटके से ला सकता हूँ नयी
फिर सोचता हूँ थोड़े-से प्रयास से
पुरानी ट्यूब लाइट दे देती है प्रकाश
तो यह क्या कम है?
जीवन में भी तो बहुत कुछ
एक पुरानी ट्यूब लाइट जैसा ही मिलता है
और तमाम प्रयत्न के बाद भी
जहाँ दूर-दूर तक
कोई रोशनी नहीं दिखती।
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मिट्टी का गिलास
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एक शिष्य अपने जनपद से
मिट्टी का एक गिलास
मेरे लिए उपहार में लाया
गिलास देते हुए बोला-
हमारा जनपद
मिट्टी के बर्तनों के लिए प्रसिद्ध है
मन किया आपके लिए भी ले चलूँ
घर में स्टील,काँच के गिलास हैं
रसोई के बर्तनों में दूर से ही
नभ में दिनकर-सा चमकता है
मिट्टी का गिलास
जब भी मिट्टी के गिलास से
पानी पीता हूँ
लगता है होंठ गिलास को नहीं
शिष्य के भाल को चूम रहे हैं।
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चाय के प्याले
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घर में
एक जैसे चाय के दो प्याले हैं
शादी के समय
माँ ने बेटी-दामाद को दिए थे
पति-पत्नी उन्हीं प्यालों में चाय पीते हैं
जो प्याला सुबह पत्नी के पास होता है
शाम की चाय के समय
पति के हाथों में पहुँच जाता है
दोनों प्याले एक जैसे
भेद करना जटिल है
चाय के समय एक प्याला
हर रोज किसी एक के पास हो
यह जरूरी तो नहीं
पति-पत्नी जब चाय पीते हैं
एक-दूसरे को कहते हैं
आज तुम्हारा प्याला मेरे पास आ गया
और कहकर दोनों मुस्कुराते हैं साथ-साथ।
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रॉयल्टी
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मैंने कहा-
इस तरह तो एक संग्रह तैयार हो जायेगा-
उसने कहा-
पूरा संग्रह बनवा देंगे आपका
मैंने भलमनसाहत में कहा-
फिर तो आधी रॉयल्टी आपको मिलनी चाहिए-
हँसते हुए-वह बोली
मैं तो आधी रॉयल्टी ले के रहूँगी
संसार में कम हो रहे हैं
ऐसे इंसान और रिश्ते
जो साफ़गोई और सरलता से
साधिकार कह देते हैं
जिनके पास ऐसे इंसान हैं
वे कभी विपन्न नहीं होते
ऐसे रिश्ते कभी मुरझाते नहीं
हरसिंगार की तरह महकते हैं
स्मृतियों के स्नेहकोश में
ऐसे सम्बंध सदा अमर होते हैं।
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कुछ इंसान
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कुछ इंसानों के होने से
दुनिया कितनी सुंदर हो जाती है
कुछ इंसान
सिर्फ़ कुछ इंसान नहीं होते
पूरी दुनिया होते हैं।
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संवेदना
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मेरी कविताएँ पढ़कर
उसने कहा-
बहुत मार्मिक और संवेदना से लबरेज़
उसकी टिपण्णी की छाया में बैठकर
मैं कुछ देर तक सुस्ताता रहा
और सोचता रहा
मार्मिकता और संवेदना की पहचान
वही कर सकता है
जिसमें ये गुण होते हैं
वैसे ही
जैसे दृश्य को
वही सराह सकता है
जिसके पास दृष्टि होती है।
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