कहीं हमारी यात्राएँ प्रकृति की सज़ा तो नहीं बन रहीं?

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

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कहीं हमारी यात्राएँ प्रकृति की सज़ा तो नहीं बन रहीं?

  • बढ़ता अति-पर्यटन – जब सुकून की  तलाश प्रकृति, संस्कृति और वहाँ रहने वालों के लिए बोझ बनने लगे

 

डॉ. रीटा अरोड़ा

 

“पापा, पहाड़ इतने सुंदर हैं, फिर यहाँ इतनी गंदगी क्यों है?” बेटी ने कार की खिड़की से बाहर देखते हुए पूछा।
सड़क किनारे पानी की बोतलें, खाने के खाली पैकेट और गिलास बिखरे थे। गाड़ियों की लंबी कतार धुआँ छोड़ रही थी।
पिता बोले, “बहुत लोग घूमने आते हैं न, इसलिए।”
बच्ची कुछ देर चुप रही, फिर बोली, “लेकिन हम भी तो घूमने आए हैं। अगर सबको पहाड़ इतने अच्छे लगते हैं, तो हम इन्हें वैसा ही सुंदर छोड़कर क्यों नहीं जाते?”
इस बार पिता के पास कोई उत्तर नहीं था।

शायद यह सवाल केवल उस पिता से नहीं, हम सभी यात्रियों से था।

घूमना किसे पसंद नहीं? गर्मियों में पहाड़ों की ठंडी हवा, समुद्र किनारे ढलता सूरज, गंगा के घाट, मंदिरों की घंटियाँ – यात्राएँ हमें रोज़मर्रा की भागदौड़ से निकालकर सुकून देती हैं। लेकिन जिस जगह से हम सुकून लेकर लौटते हैं, क्या कभी सोचते हैं कि बदले में वहाँ क्या छोड़ आए?
आज मनाली, शिमला, मसूरी, नैनीताल और लद्दाख ही नहीं, हरिद्वार, वृंदावन और अयोध्या जैसे धार्मिक नगर भी बढ़ती भीड़ का दबाव महसूस कर रहे हैं। छुट्टियों और लंबे सप्ताहांत में हजारों लोग एक साथ पहुँचते हैं। सड़कें भर जाती हैं, पानी की माँग बढ़ती है और कचरे का ढेर पीछे छूट जाता है।

इसी स्थिति को अति-पर्यटन कहा जाता है – जब किसी स्थान पर उसकी प्राकृतिक और बुनियादी क्षमता से अधिक लोग पहुँचने लगें और पर्यटन उस जगह के लिए वरदान से अधिक बोझ बनने लगे।

हम अक्सर सोचते हैं – हमारे अकेले से क्या होगा?
एक बोतल छोड़ दी तो क्या होगा?
एक पैकेट सड़क किनारे फेंक दिया तो क्या फर्क पड़ेगा?
होटल में थोड़ा अधिक पानी बहा लिया तो क्या हो जाएगा?

लेकिन पर्यावरण का बड़ा संकट शायद करोड़ों “मेरे अकेले से क्या होगा” का ही जोड़ है।
पहाड़ों की भी अपनी सीमाएँ हैं। वहाँ पानी सीमित है, सड़कें सीमित हैं और कचरा सँभालने की क्षमता भी सीमित है। हम शहरों की सारी सुविधाओं की अपेक्षाएँ लेकर पहाड़ों पर पहुँच जाते हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि हिमालय हमारी बढ़ती इच्छाओं के अनुसार अपने संसाधन नहीं बढ़ा सकता।

लद्दाख की सुंदरता उसकी नाजुकता में ही है। नीली झील के सामने खड़े होकर तस्वीर लेना आसान है, लेकिन हजारों यात्रियों के लिए पानी, शौचालय, भोजन और ठहरने की व्यवस्था जुटाने में उस धरती को कितनी कीमत चुकानी पड़ती है, यह हमारी तस्वीरों में दिखाई नहीं देता।

धार्मिक यात्राओं में तो हमारी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। हरिद्वार में गंगा के सामने हाथ जोड़ना, वृंदावन की गलियों में भक्ति अनुभव करना, अयोध्या में श्रद्धा से सिर झुकाना या केदारनाथ में दर्शन करना तभी पूर्ण है, जब उस स्थान की स्वच्छता और प्रकृति की चिंता भी हमारी आस्था का हिस्सा बने।

जिस नदी को माँ कहकर पूजते हैं, उसी के किनारे कचरा छोड़ आना कैसी श्रद्धा है?

आज हमारी यात्रा धीरे-धीरे अनुभव से Checklist पूरी करने की दौड़ बनती जा रही है।
यहाँ Selfie ली – done.
उस Café में गए – done.
वह Reel बनाई – done.

अब अगली जगह?

लेकिन जिस स्थान को हमने अपनी यात्रा-सूची से काट दिया, उसके लिए कहानी वहीं समाप्त नहीं होती।

कभी वहाँ रहने वाले लोगों से पूछिए।
पर्यटन बढ़ता है तो केवल भीड़ नहीं बढ़ती। जमीन और मकानों की कीमतें बदलती हैं, छोटी स्थानीय दुकानें पर्यटकों की पसंद के अनुसार ढलने लगती हैं, सड़कों पर दबाव बढ़ता है और पानी, सफाई जैसी रोज़मर्रा की सुविधाएँ कम पड़ने लगती हैं।

धीरे-धीरे स्थानीय व्यक्ति अपने ही शहर में मेहमान जैसा महसूस करने लगता है।
जिस जगह को हम दो दिन के लिए घूमने आए हैं, वही किसी का घर, रोज़गार, बचपन और पूरी जिंदगी है।

यही शायद अति-पर्यटन का सबसे दर्दनाक पक्ष है – हम यादें लेकर लौट आते हैं, लेकिन हमारी यात्रा का बोझ वहीं रहने वालों के हिस्से छोड़ जाते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि हम यात्रा करना छोड़ दें। पर्यटन रोजगार देता है और हमें अपने देश की विविधता से जोड़ता है। आवश्यकता केवल यात्रा का तरीका बदलने की है।

हर गर्मी मनाली ही क्यों? उत्तराखंड का अर्थ केवल मसूरी और नैनीताल क्यों? कम चर्चित स्थानों को चुनना, अत्यधिक भीड़ वाले दिनों से बचना और स्थानीय भोजन, दुकानों तथा ठहरने की व्यवस्था को प्राथमिकता देना पर्यटन का दबाव बाँट सकता है।

सरकारों को भी संवेदनशील क्षेत्रों की क्षमता के अनुसार यात्रियों और वाहनों की संख्या व्यवस्थित करनी होगी। पानी, सार्वजनिक परिवहन, स्वच्छता और कचरा प्रबंधन को पर्यटन विकास का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा।

लेकिन केवल नियम प्रकृति को नहीं बचा सकते। हमारी आदतें भी बदलनी होंगी।
पानी व्यर्थ न बहाएँ।

अनावश्यक प्लास्टिक से बचें।
अपना कचरा निर्धारित स्थान पर डालें।
जंगलों और पहाड़ों की शांति तेज संगीत से न तोड़ें।
किसी पवित्र स्थान को केवल Photo की पृष्ठभूमि न समझें।

याद रखें – जिस सड़क पर हमारी गाड़ी कुछ घंटों के लिए खड़ी है, उसी से किसी बच्चे को रोज़ विद्यालय जाना है। जिस पानी का हम बेफिक्र होकर उपयोग कर रहे हैं, वही किसी स्थानीय परिवार की दैनिक आवश्यकता है। जिस नदी के सामने हम Photo खिंचवा रहे हैं, वही किसी की आस्था और किसी की जीवनरेखा है।

हम वहाँ मेहमान हैं, मालिक नहीं।

इसलिए अगली यात्रा से लौटते समय बच्चों से केवल यह न पूछें – “सबसे सुंदर क्या देखा?”
यह भी पूछें – “जिस जगह ने हमें इतनी सुंदर यादें दीं, हम उसे कैसा छोड़कर आए?”

क्योंकि पहाड़ बोलते नहीं, नदियाँ शिकायत नहीं करतीं और जंगल हमें रोककर अपना दर्द नहीं बताते।

लेकिन उनकी खामोशी को उनकी सहनशक्ति समझ लेना हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। यात्राएँ हमारी यादों को समृद्ध करें, प्रकृति को गरीब नहीं।

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल।

2 thoughts on “कहीं हमारी यात्राएँ प्रकृति की सज़ा तो नहीं बन रहीं?

  1. आपने वास्तविक सत्य व अनुभव लिखा है. बहुत सोच, यही सोचा कि ये हिंदुस्तानियों की नेचर है फ़ितरत है और यह ठीक हो सकती है सिर्फ दंड से. यहाँ नैतिकता की अपील व्यर्थ ही है. दंड बिधान होना चाहिए.

  2. बहुत सार्थक लेख है, यदि हर पर्यटक अपनी जिम्मेदारी को समझे तो शायद कुछ सुधार की संभावना है। अपना कचरा (खाली बोतलें, रैपर इत्यादि) इधर उधर फेंकना स्वयं को ही अनुचित लगना चाहिए, इस पर जुर्माना होना आवश्यक है। हर कोई संस्कारों की बात तो अच्छे से करता है परन्तु निभाता कोई कोई है। इंप्लीमेंटिंग एजेंसीज को भी ट्रांसपेरेंसी व ईमानदारी से कार्य करना होगा। पिछले कुछ दशकों से प्रकृति का दोहन अनुचित स्तर पर हो रहा है, यह चिंता का विषय है। उम्मीद है आपके इस लेख से जागरूकता बढ़ेगी।

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