स्त्री-मुक्ति को देह की सीमा से बाहर लाने का समय
रत्ना भदौरिया
स्त्री की स्वतंत्रता पर बहस हमारे समय के सबसे आवश्यक विमर्शों में से एक है। लेकिन इस विमर्श के भीतर एक विचित्र असंतुलन दिखाई देता है। स्त्री की आज़ादी की चर्चा अक्सर उसके वस्त्रों, उसकी देह और उसकी सार्वजनिक उपस्थिति के इर्द-गिर्द सिमट जाती है। मानो किसी महिला का छोटा या बड़ा पहनावा ही यह तय करने वाला अंतिम पैमाना हो कि वह कितनी स्वतंत्र, कितनी आधुनिक और कितनी प्रगतिशील है।
यहीं एक गंभीर प्रश्न उठता है—क्या हमने स्त्री की स्वतंत्रता को उसकी देह तक सीमित कर दिया है?
स्त्री को अपनी पसंद के कपड़े पहनने का अधिकार होना चाहिए। उसके शरीर पर सामाजिक, धार्मिक या पारिवारिक पहरेदारी को स्वतंत्रता का नाम नहीं दिया जा सकता। किसी महिला की पोशाक उसके चरित्र, उसकी बुद्धि या उसकी नैतिकता का प्रमाण नहीं है। लेकिन इसी सत्य के साथ एक दूसरा सत्य भी स्वीकार करना होगा—स्त्री-मुक्ति को केवल वस्त्रों की स्वतंत्रता में समेट देना भी मुक्ति की अवधारणा को छोटा कर देता है।
स्त्री का जीवन उसके कपड़ों से कहीं बड़ा है।
उसके सामने शिक्षा का प्रश्न है। रोजगार का प्रश्न है। आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रश्न है। सुरक्षित सार्वजनिक जीवन का प्रश्न है। संपत्ति और संसाधनों पर अधिकार का प्रश्न है। घरेलू श्रम की मान्यता का प्रश्न है। निर्णय लेने की स्वतंत्रता का प्रश्न है। विवाह और मातृत्व के संबंध में उसकी स्वायत्तता का प्रश्न है। और सबसे ऊपर, अपने जीवन के बारे में स्वयं निर्णय लेने का प्रश्न है।
इन प्रश्नों के सामने कपड़ों का प्रश्न छोटा नहीं है, लेकिन एकमात्र प्रश्न भी नहीं है।
हमारी सार्वजनिक बहस में समस्या तब पैदा होती है जब स्त्री की देह को उसकी स्वतंत्रता का सबसे चमकदार प्रतीक बना दिया जाता है और उसके जीवन की ठोस परिस्थितियाँ पृष्ठभूमि में चली जाती हैं।
एक लड़की के कपड़े पर समाज तत्काल प्रतिक्रिया करता है; उसकी अधूरी शिक्षा पर उतनी बेचैनी नहीं दिखाई देती।
एक महिला की पोशाक पर नैतिकता की बहस खड़ी हो जाती है; उसकी आर्थिक निर्भरता पर वही समाज अक्सर चुप रहता है।
स्त्री के बाहर निकलने पर निगाहें उठ जाती हैं; लेकिन घर के भीतर उसके वर्षों के अवैतनिक श्रम को देखने की दृष्टि विकसित नहीं होती।
यही विरोधाभास हमें अपनी प्रगतिशीलता को फिर से परिभाषित करने के लिए बाध्य करता है।
क्या स्वतंत्रता केवल दिखाई देने वाली चीज है?
यदि कोई महिला अपनी पसंद के कपड़े पहन सकती है, लेकिन अपने जीवनसाथी का चुनाव नहीं कर सकती, तो उसकी स्वतंत्रता अधूरी है।
यदि वह आधुनिक वस्त्र पहन सकती है, लेकिन अपनी शिक्षा के बारे में स्वयं निर्णय नहीं ले सकती, तो स्वतंत्रता अधूरी है।
यदि उसे नौकरी करने की अनुमति है, लेकिन उसकी आय पर उसका अधिकार नहीं, तो स्वतंत्रता अधूरी है।
यदि वह घर से बाहर निकल सकती है, लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर भय के साथ चलती है, तो स्वतंत्रता अधूरी है।
यदि वह अपनी बात कह सकती है, लेकिन असहमति व्यक्त करते ही उसके चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगा दिया जाता है, तो स्वतंत्रता अधूरी है।
इसलिए स्त्री-मुक्ति को देह की दृश्य स्वतंत्रता से जीवन की वास्तविक स्वायत्तता तक ले जाना होगा।
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि देह की स्वतंत्रता का विरोध करना इस विमर्श का उद्देश्य नहीं है। बल्कि समस्या उस दृष्टिकोण में है जो स्त्री के शरीर को ही उसकी स्वतंत्रता का मुख्य राजनीतिक प्रतीक बना देता है। स्त्री चाहे जो पहने, यह उसका निर्णय है। लेकिन वह केवल इसलिए प्रगतिशील नहीं हो जाती कि उसने पारंपरिक वस्त्र नहीं पहने। उसी तरह वह केवल इसलिए पिछड़ी हुई नहीं हो जाती कि उसने साड़ी, सलवार या कोई अन्य पारंपरिक परिधान चुना।
आधुनिकता वस्त्रों से नहीं, स्वतंत्र चेतना से पैदा होती है।
एक स्त्री की प्रगतिशीलता का वास्तविक परीक्षण यह है कि क्या वह प्रश्न कर सकती है। क्या वह अपने लिए निर्णय ले सकती है। क्या वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सकती है। क्या वह अपनी असहमति व्यक्त कर सकती है। क्या वह अपने श्रम और समय का मूल्य तय करने की स्थिति में है। क्या वह परिवार, समाज और सत्ता—तीनों के सामने अपनी नागरिकता के साथ खड़ी हो सकती है।
पितृसत्ता को समझने के लिए भी हमें केवल स्त्री के कपड़ों पर उसकी निगरानी से आगे जाना होगा।
पितृसत्ता केवल यह नहीं कहती कि स्त्री क्या पहने।
वह यह भी तय करती है कि स्त्री कहाँ पढ़ेगी, कितना पढ़ेगी, कब विवाह करेगी, नौकरी करेगी या नहीं करेगी, किस तरह का काम उसके लिए उचित है, घर की जिम्मेदारी किसकी है और अंततः उसके जीवन का निर्णय कौन करेगा।
इसलिए यदि स्त्री-मुक्ति की हमारी भाषा केवल कपड़ों की स्वतंत्रता तक सीमित रह जाती है, तो हम पितृसत्ता की सबसे गहरी संरचनाओं को छू ही नहीं पाते।
कपड़े पर नियंत्रण पितृसत्ता का दिखाई देने वाला चेहरा है; निर्भरता उसकी अदृश्य शक्ति।
और जब तक आर्थिक तथा बौद्धिक निर्भरता बनी रहती है, तब तक बाहरी स्वतंत्रता कई बार केवल सीमित स्वतंत्रता रह जाती है।
यही कारण है कि स्त्री-मुक्ति की लड़ाई को शिक्षा और रोजगार के प्रश्नों से मजबूती से जोड़ना होगा।
शिक्षा केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं है। शिक्षा स्त्री को दुनिया को समझने की दृष्टि देती है। वह उसे प्रश्न करना सिखाती है, अधिकार पहचानना सिखाती है और अपने जीवन को दूसरों द्वारा लिखी गई पटकथा मान लेने से रोकती है।
इसी प्रकार रोजगार केवल आय का साधन नहीं है। आर्थिक आत्मनिर्भरता निर्णय की स्वतंत्रता को मजबूत करती है। अपनी आय वाली स्त्री के पास कई ऐसे विकल्प होते हैं जो आर्थिक निर्भरता में संभव नहीं होते।
इसलिए यदि हम वास्तव में स्त्री की मुक्ति चाहते हैं तो हमें यह पूछना होगा कि कितनी महिलाएँ शिक्षा से बाहर हैं, कितनी आर्थिक रूप से निर्भर हैं, कितनी अपने श्रम का उचित मूल्य नहीं पा रही हैं और कितनी अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों में वास्तविक अधिकार से वंचित हैं।
इन प्रश्नों में कोई ग्लैमर नहीं है।
इनके उत्तर सोशल मीडिया पर आसानी से नारे नहीं बनते।लेकिन यही वे प्रश्न हैं जिनसे समाज की वास्तविक संरचना बदलती है।
स्त्री को केवल देखने की स्वतंत्रता नहीं, जीने की स्वतंत्रता चाहिए।
उसे केवल अपनी देह पर अधिकार नहीं, अपने समय पर अधिकार चाहिए।
उसे केवल पहनावे का चुनाव नहीं, अपने भविष्य का चुनाव चाहिए।
उसे केवल सार्वजनिक उपस्थिति नहीं, सार्वजनिक निर्णयों में भागीदारी चाहिए।
और उसे केवल सम्मान के शब्द नहीं, अधिकारों की वास्तविक जमीन चाहिए।
हमें यह भ्रम छोड़ना होगा कि स्त्री की आधुनिकता उसके कपड़ों की आधुनिकता से सिद्ध होती है। यदि ऐसा होता तो दुनिया के सभी फैशन बदलते ही समाज बराबरी का समाज बन जाता।
लेकिन समाज कपड़ों से नहीं बदलता।
समाज बदलता है जब सत्ता-संबंध बदलते हैं।
जब अवसर बराबर होते हैं।
जब शिक्षा बराबर होती है।
जब आर्थिक संसाधनों तक पहुँच बराबर होती है।
जब श्रम का मूल्य बराबर होता है।
जब निर्णय की मेज पर स्त्री की कुर्सी केवल प्रतीक नहीं, वास्तविक शक्ति होती है।
और जब उसके जीवन पर अंतिम अधिकार उसी का होता है।
इसलिए स्त्री-मुक्ति की बहस को देह से असहज होने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उसे देह पर रुकने की भी आवश्यकता नहीं है।
स्त्री को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपनी इच्छा के अनुसार कपड़े पहने।
लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी यह है कि उसे यह अधिकार हो कि वह अपनी इच्छा के अनुसार जीवन जिए।
वह पढ़े या न पढ़े—निर्णय उसका हो।
वह नौकरी करे या व्यवसाय—निर्णय उसका हो।
विवाह करे या न करे—निर्णय उसका हो।
माँ बने या न बने—निर्णय उसका हो।
किस विचार के साथ खड़ी हो—निर्णय उसका हो।
और सबसे बढ़कर, उसके जीवन की दिशा तय करने का अधिकार किसी व्यवस्था, परिवार, बाजार या सत्ता के पास नहीं, उसके अपने विवेक के पास हो।
यही वह बिंदु है जहाँ स्त्री-मुक्ति देहवाद से आगे बढ़कर मनुष्य की मुक्ति का प्रश्न बन जाती है।
हमें स्त्री को उसके शरीर के लिए स्वतंत्र नहीं करना है।
हमें उसे मनुष्य होने की पूरी स्वतंत्रता देनी है।
क्योंकि किसी स्त्री की असली प्रगतिशीलता यह नहीं कि उसका कपड़ा कितना छोटा है।
असली प्रश्न यह है कि—
उसकी दुनिया कितनी बड़ी है।
और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि—
उस दुनिया की सीमाएँ तय करने का अधिकार आखिर किसके पास है?
