पहाड़ी क्षेत्रों में देव-परंपरा के नाम पर अंधविश्वास, सामाजिक रूढ़ियों और महिलाओं के अमानवीय उत्पीड़न पर प्रहार करती एक भावुक एवं संवेदनशील गज़ल। लेखक
नरसिंह कुमार ‘मयूर’ की एक गज़ल
देवों की पावन भूमि पर, कैसा यह अंधियारा है,
जहाँ आस्था के नाम पर, बेबस स्त्री को ही मारा है।
मासिक धर्म तो सृष्टि का, आधार-प्रकृति का नियम है,
फिर क्यों अपवित्र कहकर दूर उसे धिक्कारा है!
पाँच किलोमीटर दूर, नदी पर सूने में स्नान,
क्या इष्ट देव ने सच में, ऐसा रूप निहारा है?
जंगलों के ख़तरे, हादसों का खौफ़ हर एक पल,
कुरीतियों की भेंट चढ़ा, जो जीवन अति प्यारा है।
जागो ओ जागरूक ‘मयूर’, अब तो ये प्रथाएँ तोड़ो,
क्या बेकसूर की जान से, बड़ा धर्म तुम्हारा है!
