दिशा दें, मंज़िल नहीं

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

दिशा दें, मंज़िल नहीं

  • बच्चों को अनमोल विरासत दीजिए-अपने सपनों का बोझ नहीं

डॉ रीटा अरोड़ा

“माँ, मैंने तय किया है कि मुझे संगीत में ही आगे बढ़ना है।”
“लेकिन बेटा, डॉक्टर बनने का सपना तो हमने देखा था।”
“आपने देखा था माँ… मैंने नहीं।”
माँ कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “तो क्या हमारी सारी मेहनत बेकार गई?”
बेटी ने धीरे से कहा, “नहीं माँ, आपकी मेहनत ने मुझे अपने सपने देखने लायक बनाया है।”

यह छोटा-सा संवाद आज के असंख्य घरों की कहानी है। माता-पिता अपने बच्चों के लिए सपने देखते हैं, उनके भविष्य की चिंता करते हैं, उनके लिए बेहतर जीवन चाहते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं। आखिर माता-पिता का प्रेम ही तो वह शक्ति है, जो उन्हें अपनी जरूरतें पीछे रखकर बच्चों के भविष्य के लिए लगातार मेहनत करने की प्रेरणा देता है।

लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब बच्चों के भविष्य की चिंता धीरे-धीरे उनके भविष्य का निर्णय लेने की आदत बन जाती है।

हम अक्सर कहते हैं- “हमने जिंदगी देखी है, हमें पता है कि क्या सही है।” बात सही भी है। माता-पिता का अनुभव अमूल्य होता है। उन्होंने संघर्ष देखे हैं, असफलताएँ झेली हैं, गलत निर्णयों की कीमत चुकाई है। इसलिए वे चाहते हैं कि उनके बच्चे उन रास्तों पर न जाएँ, जहाँ उन्हें ठोकर लग सकती है।

लेकिन क्या हर ठोकर से बच्चे को बचा लेना ही अच्छी परवरिश है?

कभी पार्क में छोटे बच्चे को साइकिल चलाते देखिए। पिता पीछे-पीछे दौड़ते हैं। बच्चा गिरता है, पिता तुरंत उठाते हैं। फिर कुछ दूरी तक पकड़कर चलाते हैं। लेकिन एक समय ऐसा आता है, जब पिता को साइकिल छोड़नी पड़ती है। अगर वे हमेशा सीट पकड़े रहें, तो बच्चा कभी संतुलन सीख ही नहीं पाएगा।

बच्चों का जीवन भी कुछ ऐसा ही है।

माता-पिता का काम उन्हें गिरने से बचाना नहीं, बल्कि गिरने के बाद उठना सिखाना है।

हमारी पीढ़ी ने सीमित साधनों में जीवन जिया। कई बार इच्छाएँ परिस्थितियों के आगे हार गईं। किसी ने अपनी पढ़ाई छोड़कर परिवार संभाला, किसी ने मनपसंद नौकरी नहीं की, किसी ने आर्थिक जिम्मेदारियों के कारण अपना शौक दबा दिया। इसलिए जब अपने बच्चों को अवसर मिलता है, तो माता-पिता चाहते हैं कि वे हर वह चीज हासिल करें, जो उन्हें नहीं मिल सकी।

यहीं से अनजाने में एक दूसरी समस्या जन्म लेती है।

माता-पिता अपनी अधूरी इच्छाओं को बच्चों की उपलब्धियों में पूरा करने लगते हैं।

बेटा इंजीनियर बने, बेटी डॉक्टर बने, बच्चा सरकारी अधिकारी बने, कोई विदेश जाए, कोई बड़ा व्यवसाय करे- इन सपनों में बच्चे की इच्छा कितनी है और माता-पिता की इच्छा कितनी, यह सवाल पूछना जरूरी है।

क्योंकि बच्चे हमारे जीवन की अगली कड़ी हैं, हमारी प्रतिलिपि नहीं।

एक पिता अपने बेटे से कह सकता है- “मेरे अनुभव में यह रास्ता बेहतर है।”
लेकिन उसे यह कहने का अधिकार नहीं होना चाहिए-“तुम्हें यही रास्ता चुनना होगा।”

दोनों वाक्यों में अंतर बहुत छोटा है, लेकिन बच्चों के मन पर इसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है।

पहला वाक्य दिशा देता है। दूसरा निर्णय छीन लेता है।

आज की दुनिया हमारी दुनिया से बिल्कुल अलग है। जिन नौकरियों का हमने नाम तक नहीं सुना था, उनमें आज युवा अपना करियर बना रहे हैं। कोई डिजिटल कंटेंट बना रहा है, कोई डिजाइनिंग कर रहा है, कोई शोध में जा रहा है, कोई अपना छोटा-सा व्यवसाय खड़ा कर रहा है। सफलता की परिभाषा भी बदल रही है।

इसलिए केवल इसलिए कि बच्चा हमारे बताए रास्ते पर नहीं चल रहा, यह जरूरी नहीं कि वह गलत दिशा में जा रहा है।

हाँ, माता-पिता की जिम्मेदारी भी कम नहीं होती।

बच्चे को स्वतंत्रता देने का अर्थ यह नहीं कि उसे बिना समझाए हर निर्णय लेने दिया जाए। उसे आर्थिक अनुशासन सिखाना होगा, सही और गलत का फर्क समझाना होगा, मेहनत का महत्व बताना होगा। उसे यह भी बताना होगा कि हर पसंद के साथ जिम्मेदारी जुड़ी होती है।

लेकिन सलाह और नियंत्रण के बीच की महीन रेखा को पहचानना होगा।

कई बार माता-पिता कहते हैं- “हम तो तुम्हारे भले के लिए कह रहे हैं।”

सचमुच कह रहे होते हैं।

पर क्या हमने कभी बच्चे से पूछा- “तुम्हारे लिए भला क्या है?”

यह एक छोटा-सा सवाल बच्चे और माता-पिता के बीच वर्षों की दूरी कम कर सकता है।

बच्चों को अपने निर्णय लेने देना उन्हें अकेला छोड़ देना नहीं है। बल्कि उनके साथ खड़े रहना है, ताकि जब वे कोई निर्णय लें तो उन्हें यह भरोसा हो कि गलती होने पर भी घर का दरवाजा बंद नहीं होगा।

यही भरोसा बच्चे को जोखिम लेने का साहस देता है।

और शायद यही माता-पिता की सबसे बड़ी विरासत है- संपत्ति नहीं, आत्मविश्वास; आदेश नहीं, विवेक; मंज़िल नहीं, दिशा।

हम बच्चों के लिए घर बनाते हैं, बैंक बैलेंस बनाते हैं, शिक्षा का इंतजाम करते हैं। लेकिन क्या हम उनके भीतर वह मानसिक मजबूती भी बना रहे हैं, जिससे वे हमारे बिना भी जीवन के फैसले ले सकें?

क्योंकि एक दिन उन्हें हमारे हाथ से निकलकर अपनी राह पर चलना ही है।

उस दिन हमारे पास दो विकल्प होंगे।

या तो हम दूर खड़े होकर कहते रहें-“ऐसे मत चलो, वहाँ मत जाओ, यह मत करो।”

या फिर मुस्कुराकर कहें-

“रास्ता तुम्हारा है। हमने जो जाना, वह तुम्हें बता दिया। अब अपनी समझ से चलो। जब कभी थक जाओ, पीछे मुड़कर देखना… हम यहीं मिलेंगे।”

शायद बच्चों को इससे बड़ी सुरक्षा कोई नहीं मिल सकती।

माता-पिता सचमुच चाहते हैं कि उनके बच्चे उनसे बेहतर जीवन जिएँ। तो फिर उन्हें अपनी परछाईं बनाने की कोशिश क्यों करें?

उन्हें अपने से आगे बढ़ने दीजिए। अपनी पहचान बनाने दीजिए। अपने फैसलों की जिम्मेदारी उठाने दीजिए। उनकी सफलता पर गर्व कीजिए और उनकी असफलता में उनका हाथ थामिए।

क्योंकि सच्चे माता-पिता वह नहीं, जो बच्चे के लिए पूरी जिंदगी का नक्शा बना दें; सच्चे माता-पिता वह हैं, जो बच्चे को इतना सक्षम बना दें कि वह अपना नक्शा खुद बना सके।

आखिर अनमोल विरासत वह नहीं होती, जो हम बच्चों के लिए छोड़ जाते हैं।

अनमोल विरासत वह होती है, जो हम बच्चों के भीतर छोड़ जाते हैं- आत्मविश्वास, संस्कार, विवेक और अपने पंखों से उड़ने का साहस।

~डॉ रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

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