जसवीर त्यागी की अन्नपूर्णा और अन्य कविताएं

जसवीर त्यागी की अन्नपूर्णा और अन्य कविताएं

अन्नपूर्णा

 

रसोई में खाना बनाते हुए
कभी-कभी काम की अधिकता से
कोई रोटी जल जाती है

जली रोटी वह सास-ससुर को नहीं देती
यह मानकर
कि वे घर के बड़े हैं
उनका अपमान होगा

जली रोटी
पति को भी वह नहीं परोसती
यह सोचकर
कि वे घर में एकलौते कमाने वाले हैं
कमाने वाले को तो।सम्मान से भोजन नसीब हो

जली रोटी
बच्चों को देने की बात
वह कभी स्वप्न में भी सोच नहीं सकती

जली रोटी
किसी अन्य को देने का ख्याल भी
उसके मन में नहीं घुमड़ता
यह विचारते हुए
कि किसी को पीड़ा पहुँचेगी

सारी घर-गृहस्थी का बोझा
अपनी पीठ पर उठाये
वह खुद जली रोटी खाती है

याद करते हुए
कि बचपन में माँ ने सिखाया था
जीवन में कभी
अन्नपूर्णा का अपमान मत करना।

साहचर्य

घर पहुँचने में
कभी-कभी देर हो जाती है

कार्यालय से निकलते-निकलते
छूटा हुआ कोई काम
उसकी अंगुली पकड़ लेता है

घर पर दिन भर की थकी पत्नी
पलकों से बुनती रहती है
जीवन-साथी की प्रतीक्षा का स्वेटर
उसके घर पहुँचने पर ही सजाती है थाली

देर हो जाने पर
पति अक्सर कहता है –
तुम्हारा भूखा रहना मुझे अच्छा नहीं लगता
खा लिया करो तुम

भोजन परोसते हुए
वह एक ही वाक्य दोहराती है-
मिलकर खाने का स्वाद है निराला

असल में
साहचर्य नमक है हमारी जिंदगी का
जिसे स्त्रियाँ बखूबी समझती हैं।

कामना

कामना है
किसी की स्मृति में
कोई कड़वाहट बनकर न रहूँ

कोई चुभन बनकर
किसी को पीड़ा न दूँ

चाहता हूँ
चाहे किसी की मंजिल न बन पाऊँ

किसी का रास्ता तो
बन ही सकता हूँ।

हँसना-रोना

एक आदमी
जोर-जोर से हँस रहा था
हँसते-हँसते
अचानक फूट-फूटकर रोने लगा

दृश्य एकदम बदल गया
ज्यों धूप में,सहसा होने लगी हो बारिश
हँसी के बाद रुलाई
समझ नहीं पाये लोग

असल में वह आदमी
रुलाई से ही भरा हुआ था

उसकी हँसी
बादलों की गर्जन थी
बरसने से पहले की।

कवि जसवीर त्यागी दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर हैं।

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