जब पिता चुप हो जाते हैं…
क्रोध, अनुशासन और प्रेम के बीच छिपे रिश्तों की पड़ताल
डॉ रीटा अरोड़ा
“पापा, आप हर बात पर गुस्सा क्यों करते हैं?”
बारह वर्षीय आर्यन ने यह प्रश्न पहली बार पूछा था। पिता कुछ क्षण उसे देखते रहे। होंठ हिले, पर शब्द नहीं निकले। उन्होंने केवल उसके सिर पर हाथ रखा और चुपचाप बाहर चले गए। उस दिन दोनों की आँखें नम थीं, लेकिन दोनों ने अपने-अपने आँसू छिपा लिए।
भारतीय परिवारों में पिता का व्यक्तित्व अक्सर एक पहाड़ की तरह दिखाई देता है- दृढ़, अडिग और मौन। बच्चे उसकी ऊँचाई तो देखते हैं, लेकिन उसके भीतर चल रही दरारों को नहीं देख पाते। शायद इसलिए पिता को समझना, जीवन की सबसे देर से सीखी जाने वाली सीखों में से एक है।
हमारे समाज ने पिता को हमेशा जिम्मेदारियों का दूसरा नाम बना दिया। परिवार की आर्थिक सुरक्षा, बच्चों की शिक्षा, माता-पिता की सेवा, सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य की अनिश्चितताओं के बीच वह निरंतर संतुलन साधता रहता है। उसके पास चिंताएँ बहुत होती हैं, लेकिन उन्हें व्यक्त करने की भाषा बहुत कम होती है।
यही कारण है कि अनेक बार उसका प्रेम मुस्कान में नहीं, अनुशासन में दिखाई देता है; उसकी चिंता सलाह बनकर नहीं, डाँट बनकर सामने आती है।
लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है-क्या हर डाँट प्रेम होती है?
शायद नहीं।
और क्या हर गुस्सा गलत होता है?
यह भी पूरी तरह सही नहीं।
जीवन की तरह इसका उत्तर भी संतुलन में छिपा है।
मनोविज्ञान बताता है कि क्रोध स्वयं में न तो अच्छा है और न बुरा। वह केवल एक भावना है। उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस रूप में व्यक्त किया गया। यदि क्रोध किसी गलती को समझाने तक सीमित रहे, तो वह अनुशासन का माध्यम बन सकता है। लेकिन यदि वही क्रोध अपमान, भय या हिंसा में बदल जाए, तो वह व्यक्तित्व पर गहरे घाव छोड़ देता है।
अक्सर पिता के गुस्से के पीछे बच्चों की गलती से कहीं अधिक उनकी चिंता होती है।
उन्हें डर होता है कि कहीं बेटा गलत संगति में न पड़ जाए, कहीं बेटी किसी कठिन परिस्थिति का सामना अकेले न करे, कहीं वर्षों की मेहनत एक गलत निर्णय से बिखर न जाए। यह डर कई बार शब्दों में नहीं, आवाज़ की कठोरता में बदल जाता है।
परंतु बच्चे आवाज़ सुनते हैं, चिंता नहीं।
यहीं से दूरी की शुरुआत होती है।
आज की पीढ़ी संवाद चाहती है। वह कारण जानना चाहती है, आदेश नहीं। दूसरी ओर कई पिता यह मानकर चलते हैं कि उनकी हर बात बिना प्रश्न स्वीकार कर ली जानी चाहिए। जब संवाद की जगह केवल निर्देश रह जाते हैं, तो रिश्ते धीरे-धीरे औपचारिक होने लगते हैं।
एक बात अक्सर कही जाती है- *”पिता का गुस्सा प्रेम का दूसरा रूप है।”*
यह बात तभी तक सही है, जब तक उस गुस्से में सम्मान बचा रहे।
प्रेम यदि सामने वाले के आत्मविश्वास को तोड़ दे, उसे भयभीत कर दे या अपनी बात कहने का साहस छीन ले, तो वह प्रेम नहीं, अनजाने में किया गया भावनात्मक दबाव बन जाता है।
बच्चे केवल शब्द नहीं सीखते, वे वातावरण भी सीखते हैं।
यदि घर में मतभेद के बाद भी संवाद होता है, तो वे सम्मान सीखते हैं।
यदि घर में हर समस्या का उत्तर ऊँची आवाज़ है, तो वे या तो आक्रामक बनते हैं या भीतर ही भीतर चुप हो जाते हैं।
दोनों ही स्थितियाँ भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।
शायद समय आ गया है कि हम पिता की भूमिका को नए दृष्टिकोण से देखें।
अनुशासन आवश्यक है, लेकिन उसके साथ विश्वास भी होना चाहिए।
मार्गदर्शन आवश्यक है, लेकिन उसके साथ संवाद भी होना चाहिए।
सीमाएँ आवश्यक हैं, लेकिन उनके साथ संवेदनशीलता भी होनी चाहिए।
और बच्चों के लिए भी एक सीख उतनी ही आवश्यक है।
हर पिता अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता। कई बार उसका मौन, उसकी थकान और उसका गुस्सा उस संघर्ष की भाषा होते हैं, जिसे उसने कभी किसी से साझा नहीं किया।
रिश्तों की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि पिता का प्रेम बच्चों को अक्सर तब समझ आता है, जब वे स्वयं किसी के पिता बन चुके होते हैं।
शायद इसलिए परिवारों को गुस्से से अधिक संवाद की ज़रूरत है।
क्योंकि अनुशासन से घर चल सकता है, लेकिन अपनापन केवल संवाद से बचा रहता है।
आख़िरकार, बच्चे पिता की ऊँची आवाज़ नहीं, उनके व्यवहार की गूँज अपने व्यक्तित्व में लेकर बड़े होते हैं।
