रणबीर सिंह दहिया की कविता- मेरी सोच

कविता

मेरी सोच

रणबीर सिंह दहिया

स्कूल से आगे बढ़कर फिर

कॉलेज जाना होगा

इसके सपने

बहोत बार देखे थे मैने

कौनसे कॉलेज में दाखिला हो

कई बार सोचा था मैने यह भी

एक साल पहले सोचना शुरू किया

पहले दिन का पहरावा क्या होगा

हेयर स्टाइल पर भी नजर डाली थी

क्या साइकिल पर ही मुझे

कॉलेज जाना होगा हर रोज?

या फिर स्कूटर का जुगाड़ करेंगे

घर की हालत जुगाड़ की भी कहां

इसी उधेड़ बुन में गुज़र जाता है

पूरा का पूरा दिन मेरा जुगाड़ पर

आखिर एक दिन पांच सात लोग आये

आव भगत हुई मेरे से भी पूछा

कौनसी क्लास पास की है बेटी

दूसरा सवाल था कितने नंबर आये

नम्बर बताये मैने धीमे से ही सही

नजरें मुझे घूरती सी महसूस हुई

जैसे बकरे को घूरती हैं मारने से पहले

हर कसाई की नजरें और फिर हलाल कर दिया जाता है बकरा

मुझे क्या पता था कि मेरा भी

हलाल होने का वक्त आ गया है

और एक महीने के बाद मेरी शादी

कर दी गई एक और बेरोजगार के साथ

दो बेरोजगारों की दुनिया के सपने

मैं नहीं देख पाई क्योंकि अंधेरे के

सिवाय कुछ दिखाई नहीं दे रहा था

भूखे घर की आ गई हम क्या करें?

ये दिन देखने के लिये क्या छोरे

को जन्म दिया था?

प्यार मोहब्बत बेहतर जिंदगी

ये सब अतीत की बातें थी

घर भी तंग सा दो ही कमरे
साथ में भैंस व कटिया का भी

सहवास रहता था चौबीस घंटे

समझ सकता है कोई भी कि

दो कमरों में छह सात सदस्यों के

परिवार का कैसे गुजारा होता है?

फुर्सत ही नहीं होती एक दूसरे

के लिये!

चोरों की तरह मुलाकातें होती हैं

अपने ही घर में

बस जीवन घिसट रहा है हमारा

एक दिन सोचा इस नरक से कैसे

छुटकारा मिले?

मगर उसे ताश खेलने से फुर्सत कहां?

घर खेत हाड़ तोड़ मेहनत

और ताने!

यही तो है जिंदगी हमारी

हमारे जैसे करोड़ों युवक और युवतियां हैं भारत में

कभी कभी जीवन लीला को

खत्म कर लेने का दिल करता है

फिर ख्याल आता है

इससे क्या होगा?

दो चार दिन का रोना धोना

फिर खेल खत्म

और यह सिलसिला यूं ही

चलता रहेगा!

इस अंधेरे को कैसे खत्म किया जाये?

कैसे रोशनी की किरण हम तक भी

पहुंच सके यही तो यक्ष प्रश्न है

बहुत बार सोचा कई बार सोचा है

मगर रास्ता नहीं आता है हमें

बस इसी कश्मोकश में जीवन

किसी तरह गुजर रहा है हमारा

जीवन सरक रहा है हमारा!

आत्म हत्या से पक्का किया है

सोच समझ के किनारा

आप बताओ क्या रास्ता हो अब

हमारा ।

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