कुछ लोग बहुत कम उम्र में इस दुनिया से चले जाते हैं। लेकिन उनका व्यक्तित्व और कृतित्व हमारे मन-मस्तिष्क पर एक ऐसी अमिट छाप छोड़ जाता है जो मिटाए नहीं मिटती और भुलाए नहीं भूलती। हरियाणा की विशिष्ट महिला खिलाड़ी मैडम जीवनी का व्यक्तित्व भी ऐसा ही था। हजारों खेल प्रेमी लोग और उनके प्रशंसक आज भी उनको उसी शिद्दत से याद करते हैं: संपादक।
कहानी
मैडम जीवनी की याद में
ओमसिंह अशफ़ाक
चार मई,1990 को श्रीमती जीवनी देवी इस दुनिया को छोड़कर अनंत में विलीन हो गई। जीवनी देवी दस वर्ष तक महिला राष्ट्रीय चैंपियन रहीं। शाटपुट (गोला फेंक), जेवलिन थ्रो (भाला फेंक) और डिस्कस थ्रो (तश्तरी फेंक) खेलों में उन्होंने कई नए रिकार्ड कायम किए थे। राष्ट्रीय चैंपियन बनने वाली वह हरियाणा की पहली महिला खिलाड़ी थी। डिस्कस थ्रो में उनका बनाया रिकार्ड अभी (1990) तक नहीं टूट सका है।
उनके परिचितों-प्रशंसकों के लिए आज तीन महीने बाद भी खुद को यक़ीन दिलाना कठिन हो रहा है कि वे अब इस दुनिया में नहीं रहीं। मृत्यु के समय उनकी आयु करीब इकतालीस वर्ष थी। उनका कद पांच फुट साढ़े नौ इंच था और वजन करीब 92 किलोग्राम था। लंबे-चौड़े कद-काठी की ऐसी स्वस्थ महिला को देख कर कौन कल्पना कर सकता था कि उनकी अल्पकालिक उम्र में मृत्यु हो जायेगी। उनका विरला व्यक्तित्व हर जगह अपनी उपस्थिति का आभास कराता रहता था। एक विशिष्ट महिला खिलाड़ी होने के नाते उनके परिचितों-प्रशंसकों का दायरा भी काफ़ी विस्तृत हो गया था। शायद यही कारण है कि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश करते हुए अवचेतन मन में एक अहसास बना रहता है कि सड़क के किसी न किसी मोड़ से स्कूटर दौड़ाती हुई ‘मैडम जीवनी’ अचानक निकल आयेंगी। फिर तर्क बुद्धि से मन को समझाना पड़ता है। भावुकता से उबर कर यथार्थ की ठोस जमीन पर आना पड़ता है कि इस दुनिया से जाने के बाद कोई वापस नहीं आता है। उसका रचनात्मक काम और उसकी उपलब्धियां ही हमारी धरोहर हैं। उस विरासत के सहारे ही हम लोग मन को तसल्ली दिया
करते हैं। ठीक ऐसी ही स्थिति मैडम जीवनी के उन सैंकडों-हजारों प्रशंसकों के लिए बन गई है, जो उन्हें निकट से जानते थे।
आठ सितंबर,1948 को हिसार जिले के घिराय गांव में जन्मी जीवनी देवी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के खेल-विभाग में 1975 से ‘एथलेटिक्स कोच’ के पद पर सेवारत थीं। यूं तो जन्म लेने के बाद सभी बच्चों का कोई न कोई नाम रखा जाता है, लेकिन जीवनी देवी के नामकरण के पीछे भी एक ‘विशिष्ट घटना’ जुड़ी हुई है। हुआ यह कि जीवनी देवी जब पैदा हुई तो उसे तेज बुखार था। कुछ समय बाद बच्ची की निष्क्रिय हालत देख कर परिवार ने उसे मृत समझ लिया। उसके पिताजी उसे दफ़नाने के लिए कस्सी (फावड़ा) लेने चले गए। दस बीस कदम जाकर, यह सोच कर वापस चले आए कि अब रात में कहां परेशान होंगे, सबेरे दफ़ना आएंगे। मृत घोषित बच्ची सारी रात जमीन पर यों ही पड़ी रही। जब सुबह दफ़नाने के लिए उठाया तो देखा बच्ची हरक़त कर रही थी और उसके शरीर में जीवन के लक्षण दिखे। बस, इसी घटना के कारण बच्ची का नाम “जीवनी देवी” रख दिया गया।
उस समय तक हरियाणा के गांवों में लड़कियों को पढ़ाने का कोई खास रुझान नहीं था। पर उस घटना से प्रभावित होकर इनके पिता ने इनको पढ़ाने का निश्चय किया। जीवनी ने 1962 में घिराय के हाईस्कूल से मैट्रिक पास किया। तब तक उन्होंने खेलों में भाग लेना शुरू नहीं किया था। उच्चतर शिक्षा के लिए उन्हें हिसार के एफ.सी. कालेज में दाख़िल करा दिया गया। कुछ अरसा बाद उन्होंने जाट कालेज हिसार में प्रवेश लिया। कालेज के दिनों में उन्होंने खेलों में अपनी धाक जमानी शुरू की तो शीघ्र ही कालेज, जिला, राज्य और विश्वविद्यालयों की सीमाओं को लांघती हुई राष्ट्रीय स्तर तक जा पहुंचीं। 1967 में ‘आल इंडिया ओपन चैंपियनशिप’ में ‘डिस्कस थ्रो’ में प्रथम स्थान लेकर ‘राष्ट्रीय चैंपियन’ बन गई। इससे पूर्व 1966 और 67 में ‘इंटर यूनिवर्सिटी टूर्नामेंट्स’ में शाटपुट में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। 1973 में डिस्कस थ्रो और शाटपुट में प्रथम स्थान जीत कर वे ‘स्टेट चैंपियन’ बनी थीं। इसके बाद 1974 में ‘आल इंडिया सिविल सर्विसेज एथलेटिक मीट,
मद्रास, में शाट-पुट, डिस्कस थ्रो और ‘जेवलिन’ में प्रथम स्थान लेकर उन्होंने गोल्ड मैडल जीते थे। इसके अलावा भी उनकी खेल-उपलब्धियों का लंबा-चौड़ा रिकार्ड है। उन्होंने 1971 में बी.ए. और 1972 तथा 73 में क्रमशः एन. आई. एस. और डी.पी.एड. द्वितीय और प्रथम श्रेणी में पास किए। 1976 में कुरुक्षेत्र के बी. एन. चक्रवर्ती विश्वविद्यालय से एम.ए. किया। (बाद में इसका नाम “कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय” किया गया)।
जीवनी देवी का विवाह गाँव काकड़ौद (जीन्द) के सतदेव सिंह से हुआ। सतदेव फिलहाल करनाल के राजकीय महाविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक हैं। आमतौर पर होता यह है कि हर पत्नी को उसके पति के नाम से जाना जाता है। लेकिन सतदेव के साथ इसका ठीक उल्टा है। वे ‘जीवनी के पति’ के रूप में ज्यादा मशहूर हैं। जीवनी देवी राष्ट्रीय स्तर की खेल नायिका ही नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व के दूसरे कई पक्ष भी अद्वितीय थे। वह अत्यंत साहसी, स्पष्टवादी, चरित्रवान, मिलनसार और हंसमुख महिला भी थीं। घरेलू कामकाज से उन्हें कभी कोफ्त़ नहीं हुई। यहां तक कि चारपाई बुनने की कला भी उन्हें आती थी। किसान परिवार में जन्मने के कारण उन्हें दूध-दुहना और मथना तो आता ही था। उनके अंदर बहुत आत्मविश्वास था। अक्सर अपने पति को पिछली सीट पर बैठा कर स्वयं स्कूटर चलाती थीं। अपने अध्ययन और अल्पकालिक जीवन के दौरान ही वह एक जीती-जागती गाथा बन गई थीं। जब उनका विवाह हुआ तो उनकी ससुराल के गांव काकड़ौद में महीनों बाद तक दस-बीस कोस दूर के गांवों की औरतें बैलगाड़ियों पर चढ़ कर उन्हें देखने आती थीं और साहस और ताकत के किसी विवाद में अक्सर अपनी प्रतिद्वंद्वी को कहतीं- “ऐसी कोणसी तू ‘घिराय आली़ जीवणी है?”
उनके साहस की कई घटनाएं मशहूर हैं। एक बार जीवनी देवी किसी खेल प्रतियोगिता में दक्षिण भारत के किसी शहर में गई हुई थी। उनके साथ चार-पांच अन्य खिलाड़ी लड़कियां भी उसी हाल में ठहरी हुई थीं। टेलीविजनी महाभारत के ‘भीम’ (प्रवीणकुमार) भी वहां ‘हैमरथ्रो’ की प्रतियोगिता के लिए गए हुए थे। प्रवीण कुमार को शरारत सूझी तो उसने हाल की लाइट बुझा दी। शेष लडकियाँ तो डर कर किलकारियां मारने लगीं,
लेकिन जीवनी देवी ने प्रवीण कुमार को धमकी दी कि “या तो तुरंत लाईट जला़ दे वरना उठा कर नीचे फेंक दूंगी।”…और लाइट जल गई।
जाट कालेज हिसार में पढ़ते समय लड़कों ने जीवनी देवी के साथ शरारत करनी चाही। कालेज के मेनगेट पर पानी भरा था और दीवार के साथ से गुजरने का संकरा-सा रास्ता सूखा/ठीक था। लड़के उसी रास्ते को घेर कर खड़े हो गए। जीवनी साइकिल पर आई तो स्थिति को भांप गई। उसने साइकिल पूरी तेज करके चेतावनी दी कि जिसने चोट से बचना हो, वह रास्ते से हट जाए। नतीजा-सारे लड़के कीचड़ में और जीवनी की साइकिल सूखे रास्ते से बेखटके गुज़र गई। 1974 की कबड्डी टूरनामेंट में जीवनी हिसार से अपनी टीम लेकर कुरुक्षेत्र आई थी। वह तब वहां डी.पी.ई. लगी हुई थीं। महिला कबड्डी के दौरान किसी मनचले दर्शक ने अंश्लील टिप्पणी कर दी। जीवनी ने समझाया। नहीं माना, तो उन्होंने एक भारी-सा थप्पड़ जड़ दिया और मनचला धमकी देता हुआ चला गया। पर जीवनी के चेहरे पर भय की लकीर तक नहीं उभरी।
कैथल से बस में सफ़र करते हुए एक बार किसी ‘मजनू’ ने जीवनी देवी की तरफ आँख चला दी। उन्होंने इसे अनायास हरकत समझ कर अनदेखा कर दिया। लेकिन फिर वही हरकत दिखी तो जीवनी उसके निकट आ गई। जब तीसरी बार उसने वही हरकत की तो जीवनी ने उसे भारी-भरकम थप्पड़ जड़ दिया। ड्राइवर ने बस रोक कर जीवनी को शाबासी दी और मजनूं तो भाग कर हड़बड़ाहट में किसी गलत बस में ही चढ़ गया था! एक बार मैडम जीवनी के पति कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से कुछ किलोमीटर दूर एक कालोनी में किसी जरूरी काम से गए थे। रात के एक बजे तक नहीं लौटे तो उन्हें चिंता हई कि कहीं सडक पर कोई हादसा न हो गया हो? वह लाठी लेकर अंधेरी रात में सूनसान सड़क पर निकल पड़ी। बीच रास्ते में सतदेव को सामने से आता लठधारी भारी भरकम व्यक्ति दिखाई दिया। वह डर गए। कलाई से घड़ी उतार कर जेब में रख ली। निकट आते ही लठधारी ने पूछा कौन ? तो आवाज़ पहचान कर डर दूर हुआ कि ये तो उनकी पत्नी मैडम जीवनी थीं। इस तरह की अनगिनत घटनाएं उनके व्यक्तित्व से जुड़ी हुई हैं। अपनी छात्राओं को तो वे हमेशा निडर होकर गुंडागर्दी का विरोध करने की प्रेरणा दिया करती थीं। गुंडों द्वारा एक साध्वी को तंग किए जाने के मामले को वे खुद एस.डी.एम. के पास लेकर गई थीं।
लगातार ढाई महीने पी.जी.आई. चंडीगढ़ में ‘ब्रेन ट्यूमर’ का इलाज और अंततः आपरेशन के बाद भी मैडम जीवनी को बचाया नहीं जा सका। इस दुखद घटना से न केवल खेल प्रेमियों को बल्कि आम जनता को भी गहरा सदमा लगा है। स्व० जीवनी देवी की तीन संतानें हैं: उनकी ग्यारह वर्षीय बड़ी बेटी वनीता सातवीं कक्षा की छात्रा है और छोटी नौ वर्षीय वंदना पांचवीं में पढ़ती हैं। सबसे छोटा बेटा है, जिसकी आयु साढ़े तीन वर्ष ही है। यह परिवार अभी तक(1990 में) कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय परिसर में ही रह रहा है।
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परन्तु आज भी जब मई का महीना आता है तो जीवनी की याद में उनके प्रशंसकों की आँखें नम हो जाती हैं।
(जनसत्ता, चंडीगढ़, 7 अगस्त, 1990)
