आरएसएस की शताब्दी संस्कृति और हम

आरएसएस की शताब्दी संस्कृति और हम

जगदीश्वर चतुर्वेदी

विगत एक दशक से आम जनता और राजनीतिक दलों से सम-सामयिक ज्वलंत आर्थिक-राजनीतिक समस्याएं छीनने और उनके स्थान पर कृत्रिम मुद्दे बहस के केन्द्र में लाने की मुहिम चल रही है। अकादमिक जगत में आरएसएस का वर्चस्व है। उल्लेखनीय है देश के अधिकांश प्रोफेसरों में संघ का लंबे समय से असर रहा है।खासकर हिंदी भाषी क्षेत्र के विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों में उनका वर्चस्व पहले भी था और आज भी है।शिक्षा में संघ ने अपना शिकंजा मजबूत किया है।आज देश का कोई विश्वविद्यालय नहीं है जहां संघ समर्थक प्रोफेसर न हों।

संघ ने किसी दक्षिणपंथी नेता की रणनीति का इस्तेमाल नहीं किया बल्कि सांगठनिक विस्तार और विकास के लिए ग्राम्शी और होर्खिमेयर के ‘घुसपैठ’ और ‘विस्तार’ के सिद्धांत का इस्तेमाल किया है। ‘घुसपैठ’ और ‘विस्तार’ की रणनीति के कारण वे प्रत्येक संगठन में प्रवेश करने और उसमें सहयोगी और मित्र बनाने में सफल रहे हैं। हर वर्ग,संस्था, क्षेत्र,जिला,गांव ,शहर में व्यापक शिरकत वाले विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय संगठनों का विशालकाय नैटवर्क खड़ा करने में सफलता बासिल की है।

संघ का प्रधान वैचारिक अस्त्र हैं प्रतीक। उन्होंने प्रतीकों के ज़रिए समाज और संस्कृति पर व्यापक स्तर पर हमला किया है।लोकतंत्र के प्रतीकों को अपदस्थ किया है,विकृत किया है।प्रतीकों के ज़रिए किए गए प्रचार अभियान को उन्होंने सुनियोजित ढंग से संयोजित और संगठित किया है। हर जिले और गाँव से लेकर राज्य और राष्ट्र स्तर पर प्रतीकों की वर्षा की है।हरेक माझ्यम का इसके लिए इस्तेमाल किया है।

संघ प्रतीकों के ज़रिए ही लोगों को जोड़ता है।प्रतीकों की आड़ में संघ के विचारों और सांगठनिक मित्रता और शिरकत का नैटवर्क बनाते हैं। प्रतीकों के ज़रिए उन्होंने प्रचलित अनेक प्रतीकों को आम लोगों की आंखों से ओझल कर दिया है।प्रतीक और हिन्दुत्व का गठबन्धन इस तरह काम कर रहा है कि आप उन प्रतीकों को चुनौती नहीं दे सकते।संघी लोग प्रतीकों की आड़ में छिपे रहते हैं।उनके द्वारा प्रचारित प्रतीकों की विचाधारा वह नहीं है जो बुनियादी तौर पर उस प्रतीक से जुड़ी है,बल्कि इन सभी प्रतीकों की विचारधारा है संघ मार्का हिदुत्व।सभी प्रतीकों को एक ही विचारधारा में बाँध गिया गया है।प्रतीकों के ज़रिए इकसार विचारधारात्मक कम्युनिकेशन करना बड़ी बात है। इसके लिए जन-संपर्क ,इवेंट कल्चर और मिलन सारिता का इस्तेमाल किया गया है।

संघ और उसके सहयोगी संगठनों के प्रत्येक इवेंट या आंदोलन में कोई न कोई प्रतीक ज़रूर मिलेगा। बिना प्रतीक के वे आंदोलन नहीं करते।यह प्रतीक जिंदा या मुर्दा कोई भी व्यक्ति हो सकता है,या राजा-रानी-भगवान-देवी देवता,स्थानीय देवता भी हो सकता है। आमतौर पर वे दैवीय और सामंती प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं।

वे प्रतीकों के अंदर राष्ट्रीय प्रतीकों को समायोजित करके पेश करते हैं।संघ के लोग जब किसी प्रतीक के साथ संबंध बनाते हैं तो इसलिए संबंध नहीं बनाते कि उस प्रतीक का विस्तार हो, उससे जुड़े विचारों का विस्तार हो या प्रचार हो।बल्कि इसलिए संबंध बनाते हैं कि उस प्रतीक के माध्यम से उससे जुड़ी जनता को अपनी विचारधारा के घेरे में लाकर वैचारिक ग़ुलाम बनाकर रखा जाय।साथ ही सम-सामयिक अंतर्विरोधों को आम लोगों की आंखों से छिपाया जाय।

मसलन् ,इन दिनों उनका राष्ट्रीय ध्वज को लेकर प्रेम चल रहा है। इस क्रम में वे राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े विचारों पर जोर कम और संघ के विचारों पर ज़ोर अधिक दे रहे हैं।संघ के हाथ में राष्ट्रीय ध्वज दो काम एक साथ कर रहा है वह संघ की विचारधारा पर पर्दा डाल रहा है साथ ही संघियों के हाथ में तिरंगा है तो उसका अर्थ है संघ देशभक्त है।यह एक तरह से देशभक्ति और उससे जुड़ी कुर्बानी की परंपरा और जीवन मूल्यों को एक ही झटके में हज़म करके वैचारिक तौर पर रूपान्तरण का तरीका है। इससे तिरंगे के साथ जुड़े अर्थ में तेजी से परिवर्तन आया है।

तिरंगा राष्ट्रीय बहुलतावाद और एकीकरण का प्रतीक है जबकि संघ हिन्दू एकीकरण में यकीन करता है।इन दोनों में बुनियादी अन्तर्विरोध है। संघ इस अंतर्विरोध को छिपाता है।संघ की असली मंशा लोग नहीं जानते। वह प्रचार के ज़रिए उनकी सोचने की क्षमता को अपहृत कर लेता है।असल में वे इसके ज़रिए नयी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को स्थापित करना चाहते हैं जिसका स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के साथ अन्तर्विरोध है।वे तिरंगे के साथ जुड़े नायकों को नए नायकों के ज़रिए अपदस्थ कर रहे हैं।उनका लक्ष्य है लोकतंत्र के लिए लड़ने वालों की साख को खत्म करना।

तिरंगे ने स्वतंत्रता का बिगुल बजाया,स्वतंत्रता का फासिज्म के ख़िलाफ़ संघर्ष में महत्वपूर्ण स्थान है।संघ की तिरंगा यात्रा फासिज्म के ख़िलाफ़ संघर्ष को कुंद करती है।तिरंगे के इतिहास के साथ स्वतंत्रता जुड़ी है। संघ को स्वतंत्रता नापसंद है।वे तिरंगा याज्ञा के ज़रिए स्वतंत्रता और लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष को कमजोर कर रहे हैं।वे भारत के इतिहास को भी विकृत कर रहे है।स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को विकृत कर रहे हैं।इसके बदले नए मूल्य और नई संस्कृति की वकालत कर रहे हैं।यह वह संस्कृति है कारपोरेट-फंडामेंटलिस्ट संस्कृति कहते है।

इस संस्कृति के अनुसार भारत एक ही धर्म के मानने वालों का देश है।यह धारणा सांस्कृतिक-धार्मिक विविधता और बहुलतावाद को अस्वीकार करती है।वे लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिकार सम्पन्न करने की बजाय नौकरशाही के ज़रिए प्रशासन चलाने में विश्वास करते हैं।सबको शिक्षा की बजाय पूंजीपति केन्द्रित प्राइवेट शिक्षा व्यवस्था इनका लक्ष्य है।

धर्म के बारे में प्रचार करते समय संघ का मुख्य बल अपने द्वारा बताए ईश्वरों की मूर्तियों और मंदिरों पर है।उन्होंने मध्यकालीन नायकों,मूल्यों की स्थापना और प्रचार पर अधिक बल दिया है। कार्ल मार्क्स ने जब धर्म की आलोचना की थी तो धर्म को पूंजीवाद के उपकरण के रुप में व्याख्यायित करते हुए धर्म को जनता के लिए अफ़ीम कहा था।यह बात लिखने का आशय था कि धर्म की आड़ में पूंजीपति वर्ग साधारण जनता के साथ विश्वासघात करता है।

भारत में धर्म का विभिन्न इवेंट संस्कृति के ज़रिए धर्म उद्योग में रुपान्तरण हो रहा है।इसके ज़रिए आम जनता को आकर्षित करने और वोट बैंक राजनीति के लिए दुरूपयोग हो रहा है।भारत में साधु-संत-महात्माओं को प्रचारक के रुप में इस्तेमाल किया जा रहा है।इनके माध्यम से संस्कृति की जड़ों पर सीधे हमले किए जा रहे हैं।दैनंदिन जीवन में राजनीतिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को विभिन्न उपायों के ज़रिए बाधित किया जा रहा है।

फासिज्म की विशेषता है संस्कृति की बुनियादी जडों पर प्रहार करना।वे संस्कृति के बुनियादी नियमों और तर्कों को ही बदलने में लगे हैं।समाज के बुनियादी ढाँचे को बदलने की बातें करते हैं।

संस्कृति के बुनियादी नियमों में भाषा केन्द्रीय तत्व है।फासिस्ट हमेशा भाषा के ज़रिए आम आदमी का व्यवहार बदलने की कोशिश करते हैं।भाषा के ज़रिए विचार बदलने की कोशिश करते हैं।इसके ज़रिए वे अपने वर्चस्व को बनाए रखते हैं।हर स्तर अंग्रेजी पर हमला तेज हो गया है।अंग्रेजी पर हमले के ज़रिए वे अपनी भाषा में विकास का भ्रम पैदा कर रहे हैं।साथ ही अपनी भाषा में शिक्षा के नाम पर उच्च शिक्षा में भयानक अलगाव पैदा कर रहे हैं।वे दावा करते हैं कि अपनी भाषा में ही सचेतनता पैदा की जा सकती है। वे जनता को एक ही भाषा में शिक्षित करने के लिए दवाब पैदा कर रहे हैं। जबकि एक भाषायी क्षेत्र में अनेक भाषाएं हैं, कई भाषा-भाषी रहते हैं वैसी अवस्था में एक ही भाषा में शिक्षा का विचार अव्यावहारिक है।ये लोग मैरिट,वस्तुगतता (आब्जेक्टिविटी) और विज्ञान पर भी हमले कर रहे हैं।व्यक्ति के विकास में कड़ी मेहनत,मैरिट, वस्तुगतता और आकांक्षाओं की बड़ी भूमिका है।आरएसएस इन सबको अस्वीकार करता है।उसके यहां सिफारिश और संघी होना ही पर्याप्त है।दूसरी ओर वे एकल परिवार की धारणा पर हमले कर रहे हैं और संयुक्त परिवार की धारणा का प्रचार कर रहे हैं।उनका मानना है एकल परिवार तो व्यक्ति के विकास को बाधित करता है। समाज को तोड़ता है।

फासिज्म को कला-साहित्य आदि नापसंद हैं इसलिए साहित्य -कला आदि पर सबसे अधिक हमले हो रहे हैं।वे यह मानकर चलते हैं कि ये सब जनता को जागरूक बनाने के माध्यम हैं अतः इनसे जनता को दूर रहना चाहिए।ये सब जनता को शिक्षित करने और नियंत्रण स्थापित करने का काम करते हैं।इसलिए संघ सुनियोजित ढंग से साहित्य और कला विरोधी हरकतें करता रहता है।

भारत में इसके लिए संघ ने स्तरहीन लेखन को महान बनाने और स्तरहीन साहित्यकारों को सम्मानित करने,स्थापित करने की राष्ट्रीय मुहिम चलायी हुई है। पूरे देश में हजारों ऐसे लोगों को लेखक के रुप में स्थापित किया है जो स्तरहीन लेखन कर रहे हैं।स्तरहीन लेखन का उत्थान और गुणवत्तापूर्ण लेखन का विरोध, उनको धर्मनिरपेक्ष गैंग का सदस्य कहकर अपमानित करने की राष्ट्रीय मुहिम चलायी हुई है।उसी लेखक को सम्मानित-पुरस्कृत किया जा रहा है जिसने कभी साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ न लिखा हो।जो लेखन में राजनीति न करे।इस तरह के लेखकों को स्थापित करके साहित्य-कला के परिवेश की अपूरणीय क्षति हुई है।

सवाल उठता है क्या स्तरहीन साहित्य और साहित्यकारों के ज़रिए राष्ट्रोत्थान संभव है ? क्या इस तरह के लोगों की मदद से सही नीतियां बनाने में मदद मिलती है ?क्या ये लोग देश की चेतना का विकास कर सकते हैं ?क्या ये जनता को शिक्षित और चेतना संपन्न बना सकते हैं ?

नया नियम है कि जो सरकार की नीतियों की आलोचना करे उसकी उपेक्षा करो। आलोचना को ग़ैर कानूनी मानो।बहाने बनाकर दंडित करो।देशद्रोही करार दो।हिटलर की नस्लवादी नीति थी,इसके आधार पर उसने यहूदियों को निशाना बनाया,इसके आधार पर संस्कृति में निरंतर हमले किए।जिन सामाजिक समूहों को पसंद नहीं करता था,उनकी उपेक्षा, उत्पीडन और अपमान करना उसकी आदत थी।उसने सिर्फ जर्मन पेंटर, साहित्यकार, संगीतकार, रेडियो प्रिफॅार्मर,अभिनेता आदि को ही सरकार समर्थित ‘राइख कल्चर चेम्बर’ का सदस्य बनाया। ठीक यही पैटर्न भारत में विभिन्न संस्थाओं की संचालन समितियों के गठन में लागू किया जा रहा है।संस्थाओं में नामांकन के लिए हिन्दू और संघी होना जरुरी है।

‘राइख कल्चर चेम्बर’ ने वेन गॅाग,पिकासो आदि की 1500से अधिक कृतियों को जर्मन संग्रहालयों से हटा दिया।इस परंपरा से जुड़े कलाकारों को यातना शिविरों में भेज दिया । लेखकों की हजारों किताबें जला दी गयीं।विभिन्न बहाने बनाकर जो कलाकार पसंद नहीं था,उसका नामो-निशान मिटा दिया गया।बड़ी संख्या में कलाकारों-लेखकों को देश छोड़कर भागना पड़ा।

भारत में इन दिनों नए तरीके से लेखकों-कलाकारों पर हमले हो रहे हैं, उनकी अवहेलना की जा रही है। अलग-अलग इलाकों में अलग अलग तरीके अपनाए जा रहे हैं.कला में सिर्फ कला-कौशल ही नहीं होता बल्कि यह भी देखना पड़ता है कला किस तरह का राजनीतिक संदेश संप्रेषित कर रही है।

संघ की राजनीति की विशेषता है वे क़ानून के शासन को नहीं मानते।क़ानून को लागू ही नहीं करते।क़ानून की निष्क्रियता एक बड़ी समस्या है।वे सतह पर क़ानून मानते हैं,संविधान को मानते हैं, लेकिन आचरण में नहीं मानते।कानून उनकी वाचिक स्वीकृति का हिस्सा है, आचरण में वे मनमाने ढंग से,संगठन के आदेश पर काम करते हैं।समस्त नौकरशाही को संगठन के आदेश पर काम करने के लिए मजबूर करते हैं।उनका मानना है संघ को राज्य नियंत्रित नहीं करता, बल्कि संघ राज्य को नियंत्रित करता है।इसी आधार पर भारत में सत्ता संचालन हो रहा है।

भारत में मोदी सरकार आने के बाद नागरिकों की सरकारी संस्थाओं द्वारा निगरानी और जासूसी की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं।नागरिकों की जासूसी करना,पुरानी फासिस्ट पद्धति है जिसके आधार पर नागरिकों को तरह-तरह की यातनाओं का शिकार बनाया जाता है।यहां तक कि नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी के माध्यम से जासूसी की परंपरा का जन्म हुआ। प्रमुख हस्तियों की जासूसी करना इस संस्था का काम है।पैगासस का इस्तेमाल इसीलिए किया जा रहा है।बड़ी संख्या में नागरिक की जासूसी की जा रही है।साधारण लोगों के पास इस सबसे लड़ने के संसाधन और क्षमता नहीं है।

संघ का मंत्र है धर्म के आधार पर वोट बैंक राजनीति करो।राजनीतिक जनाधार बनाओ।विरोधियों को धमकियां दो,आतंकित करो, हिंसा करो।नफ़रत,गुस्सा,भय पैदा करो।इसके ज़रिए विरोधियों का मुँह बंद करो।अपने समर्थकों को अविवेकवादी ढंग से सोचने के लिए मजबूर करो।धर्म के आधार पर संगठन बनाओ ,राजनीति करो।धर्म का दमन और आतंक के उपकरण के रुप में इस्तेमाल करो।धर्म के नाम पर विभाजित करो, हमले करो, आलोचना करो, अवहेलना करो और विभाजन का राजनीतिक लाभ उठाओ।विभाजनकारी नारों के ज़रिए असली समस्याओं से ध्यान हटाओ,गैर जरूरी मसलों में व्यस्त रखो।इस तरह का नैटवर्क बनाओ जिसमें व्यक्ति अहर्निश व्यस्त रहे।इस नीति के तहत बारह महिने आईपीएल क्रिकेट, ह्वाटस एप मैसेजिंग , यू ट्यूब आदि को व्यस्तता के केन्द्रीय उपकरण के रुप में इस्तेमाल किया जा रहा है।राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए इन माध्यमों का अतिवादी ढंग से उपयोग किया जा रहा है।इन माध्यमों के ज़रिए तथ्यों का विकृतिकरण किया जा रहा है। गलत सूचनाएं संप्रसारित की जा रही हैं। आम लोगों में ग़ैर जरूरी मसलों पर उत्तेजना और उन्माद पैदा की जा रही है। इसने सत्य और तथ्य को दुर्लभ बना दिया है। अनेक मामलों में इन माध्यमों पर निर्भर लोग सत्य और तथ्य से नफ़रत करने लगे हैं।समाज में विभाजनकारी विचारों की बाढ़ आ गयी है।वहीं दूसरी ओर पुलिस और दूसरी संस्थाओं के जनता पर हमले बढ़े हैं।बिना प्रमाणों के लोगों की गिरफ्तारियां हो रही हैं, उन पर झूठे केस चलाए जा रहे हैं।इससे हजारों परिवार तबाह पड़े हैं।इसे व्यवस्थागत फासिज्म कहना समीचीन होगा।

हिन्दू के नाम पर गोलबंद करने के लिए,नए सिरे से हिन्दू धर्म को परिभाषित किया जा रहा है।पुरानी परिभाषाओं को ख़ारिज किया जा रहा है।इसे ‘नव्य-हिन्दू’ या ‘नव्य हिन्दुत्व’ कहना समीचीन होगा।यह वह हिन्दू है जो पुराने हिन्दू धर्म की परंपरा,मान्यता और नियमों को एकदम नहीं मानता।उसको आरएसएस की विचारधारा और नियमों के बंधनों में बाँध दिया गया है।इस समुदाय में जुड़ने की एकमात्र शर्त है हिन्दू होना। उसके बाद के सभी नियम,कायदे और विचारधारा आरएसएस के हैं।इसी थ्योरी के आधार पर भारत को हिन्दू राष्ट्र के रुप में पेश किया जा रहा है। इसके आधार पर ही आम जनता को ‘भावुक हिन्दू’ बना दिया गया है।इसके अनुसार एक ‘ संघी पहचान’ प्रचारित की गई है।उस पहचान की अपनी संहिता है जिसका उसके सदस्य इस्तेमाल करते हैं।उनकी एक सांकेतिक भाषा है जिसमें वे संप्रेषित करते हैं।भाषा को नियंत्रित करते हैं। भाषा में विभिन्न पदबंधों के अर्थ तय कर दिए गए हैं।उनके द्वारा निर्धारित शब्दों का सत्ता भी इस्तेमाल कर रही है।उन शब्दों के साथ राजनीति जुड़ी है।शब्दों के पुराने अर्थ खत्म कर दिए गए हैं। लेखक के अपने विचार हैं।

जगदीश्वर चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से साभार

 

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