नाटक बिकाऊ प्रोडक्ट नहीं है जिसे बिकाऊ भाषा की बैसाखी का सहारा लेना पड़े!
मंजुल भारद्वाज
नाटक भाषा का मोहताज नहीं है। नाटक का सार्वभौमिक आधार भाषा नहीं मानवीय संवेदना है जो भाषा से मुक्त है। भाषा के बिना मनुष्य जी सकता है संवेदनाओं के बिना नहीं । विचार की कोई भाषा नहीं होती ।
अलग अलग भाषा बोलने वाले भी अपनी मातृभाषा में नही रोते उनके रोने-हंसने का विधान मानवीय संवेदना है। आपको किसी हिंदी भाषी को हिंदी में रोते देखा है या मराठी भाषी को मराठी में रोते देखा है । भाषा मनुष्य को एक सीमा तक शिक्षित करते हुए भी भाषा से मुक्त नहीं कर पाती।
विचार शून्य लोकप्रिय भाषा तो मेलोडी देने वाला ही बोल रहा है विदेश में मेलोडी और देश में हाहाकार । चुनाव जीत कर अमृतकाल में प्रवेश कर चुके हैं,अमृत उत्सव मना रहे हैं और देश मृत्यु काल की शोकांतिका । सत्यमेव जयते के देश में विज्ञापन बिकाऊ भाषा से दिन रात झूठ बेच रहे हैं । भीड़ झूठ खरीद रही है ।
लोकप्रिय भाषा उनके लिए जरूरी है जो प्रोडक्ट बेचते हैं जैसे विज्ञापन वाले,फिल्म वाले, चैनल और अखबार वाले।
नाटक बिकाऊ प्रोडक्ट नहीं है। नाटक चैतन्य कर्म है!
लोकप्रियता नहीं लोक प्रभाव नाटक का लक्ष्य हो! नाटक का दर्शक ग्राहक नहीं होता विचार मंथन का सहभागी और प्रहरी होता है!
