हरियाणाः जूझते जुझारू लोग-130
धर्मसिंह काम्बोज – प्रबुद्ध, समर्पित और भरोसेमंद कर्मचारी नेता
सत्यपाल सिवाच
सर्वकर्मचारी संघ हरियाणा के शुरुआती दिनों के जिन जागरूक नेताओं का नाम आता है उनमें करनाल के माखूमाजरा निवासी धर्मसिंह काम्बोज को याद किया जाना चाहिए। उनका जन्म 25.09.1946 को करनाल जिले दाहा गाँव में श्रीमती गेंदीदेवी व श्री रामधारी सिंह के घर एक किसान परिवार में हुआ। वह ऐसा दौर था जिसमें किसान-मजदूर परिवारों में जन्मे बच्चे अल्पायु में ही माता-पिता और परिवार के साथ जीवन निर्वाह के संघर्ष में सक्रिय योगदान देने लग जाते थे। उनके पिता का देहांत उस समय हो गया तब वे केवल बारह वर्ष के थे। ऐसी विकट स्थिति में माँ पर परिवार को चलाने की जिम्मेदारी आ गई। उन्होंने स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद दिन में निर्वाह के लिए काम किया और इवनिंग कॉलेज में पढ़ाई की। नौकरी में आने से पहले वे कोर्ट परिसर के बाहर वकीलों के लिए टाईप का काम करते रहे। वे दो भाई बहन थे। उनकी बहन केलापती भी स्वर्ग सिधार चुकी हैं। धर्म सिंह भी 11.12.2025 को हमारे बीच नहीं रहे। उनकी धर्मपत्नी शिक्षा देवी भी अपने जीवन साथी के बहुत समय नहीं रह पाई और 2 मई 2026 जीवन यात्रा पूरी कर गई।
उन्होंने दयाल सिंह कॉलेज करनाल से संभवतः 1969 में ग्रेजुएशन की थी। उस समय उच्च शिक्षा तक कम ही छात्र पहुंचते थे। उन्होंने अंग्रेजी और राजनीति शास्त्र को मुख्य विषयों के रूप चुना था। वे अप्रैल 1970 में जूनियर ऑडिटर के रूप में हरियाणा रोडवेज में नियुक्त हुए थे और 30.09.2004 सुपरिटेंडेंट पद से सेवानिवृत्त हुए। वे अपनी ड्यूटी से सम्बन्धित काम में माहिर थे और स्वाध्याय के चलते कर्मचारियों के लम्बित मामलों को निपटाने में सकारात्मक योगदान देते रहे थे। सरकारी सेवा में आने बाद उन्होंने सामाजिक और कर्मचारियों के आन्दोलन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई।
वे नौकरी में आने के शुरुआती दौर में ही यूनियन के संपर्क में आ गए थे। उसके साथ उन पर वामपंथी विचारों का विशेष प्रभाव रहा। दयाल सिंह कॉलेज के प्रोफेसर रामजीलाल और जयसिंहपुर निवासी कामरेड सूबासिंह उनके घनिष्ठ मित्रों में शामिल रहे। वे सच और तथ्यों को तर्क की कसौटी पर परखे बिना आगे नहीं बढ़ते थे। यद्यपि मैं उन्हें कुछ साल ही रामकिशन मान के जरिए जानने लगा था लेकिन उनके व्यक्तित्व से रूबरू होने का अवसर सर्वकर्मचारी संघ के गठन के बाद ही मिला। उन्होंने सन् 1973-74 से आन्दोलनों में भाग लेना शुरू कर दिया था। उस समय के रोडवेज के इंटक नेतृत्व की नीति उन्हें पसंद नहीं थी। इसलिए जब 1986-87 में सर्वकर्मचारी संघ का आन्दोलन चला तो वे करनाल इस प्रगतिशील लहर का हिस्सा बन गए। उन्हें करनाल जिले का पहला सचिव बनाया गया था।
वे आन्दोलनों के बीच ऐसे नेता थे जिन्हें शासन-प्रशासन की कार्यनीति का अहसास रहता था। शान्त स्वभाव, धैर्य और मजबूती के साथ अड़ जाना उनकी खासियत थी। रोडवेज विभाग में पुलिस प्रशासन के साथ टकराव की स्थिति तो आए दिन पैदा हो जाती। वे निर्भीक होकर अगली पंक्ति में रहते। संयम से अपनी योजना बनाना उनकी ताकत रही। साथ काम करने वालों के लिए वे प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक का काम करते। उनके साथ दफ्तर में काम करने वाले पवन सांभली ने अनेक अनुभवों को साझा किया। वे संघर्षों के बीच अनेक बार निलंबित हुए, जेल गए और हिरासत में लिए गए। सन् 1993 के ऐतिहासिक आन्दोलन में उनकी सेवाएं बर्खास्त की गई।
वे सन् 2004 में सेवानिवृत्ति तक लगातार सक्रिय रहे और सभी आन्दोलनों में भाग लिया। उनकी खूबी यह रही कि पद-प्रतिष्ठा के पीछे नहीं भागते थे, बल्कि अपनी उपस्थिति में ही नए लोगों को यूनियन व सर्वकर्मचारी संघ में आगे आने के लिए प्रोत्साहित किया। पवन सांभली ने बताया कि पेशेवर ज्ञान के कारण जनरल मैनेजर और अधिकारी उनकी धाक मानते थे। पवन ने बताया कि उसे धर्मसिंह जी ने कार्यालय और यूनियन के काम की शिक्षा दी।
वे सेवानियमों, प्रक्रियाओं और कानूनी कार्यवाहियों की बहुत गहरी समझ रखते थे। यहाँ तक कि सेवानिवृत्त होने के बाद भी नि:शुल्क-निस्वार्थ मार्गदर्शन करते रहे। जब उनका जीन्द में कुछ समय के लिए सुपरिटेंडेंट पद पर स्थानांतरण हुआ तो सांयकाल प्रायः मुलाकात हो जाती थी। वे कार्यालय के ईंचार्ज के रूप में सकारात्मक दृष्टि कर्मचारियों के लंबित मामलों का निपटारा करवाते रहे। अंग्रेजी भाषा में ड्राफ्टिंग में उन्हें खास महारत हासिल थी।
कर्मचारियों के मामलों के अलावा वे परिवार और समाज में भी मार्गदर्शक की भूमिका निभाते। उन्होंने रिटायरमेंट के बाद किसान सभा और दूसरे सामाजिक मंचों पर काम किया। वे स्वभाव से मृदुभाषी, व्यवहार कुशल, मिलनसार और सहयोगी स्वभाव के कारण सभी परिचितों के बीच प्रिय रहे। शिक्षा के प्रति उनका गहरा लगाव था। उन्होंने तीसरी पीढ़ी में पोते-पोतियों की शिक्षा के लिए भी बहुत योगदान दिया। उनकी पोती डॉक्टर अमीषा अपना अनुभव बताती हैं कि किस प्रकार दादा जी उन्हें प्रेरित करते; शोध कार्यों व शिक्षा की फीस अपनी पेंशन से देते।
वे संघर्षों और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हिस्सा लेते थे उस समय परिवार को कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता था, लेकिन उन्हें परिवार से सहयोग मिलता रहा। उनके बड़े बेटे डॉक्टर बलदेव राज काम्बोज हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार में कुलपति हैं। छोटे बेटे वीरेन्द्र कुमार काम्बोज फार्म हाउस संघोया (माखूमाजरा) में कृषि कार्य करते हैं।
बेटी वेदवती अध्यापक एवं कर्मचारी आन्दोलन के विख्यात् नेता महीपाल के संग विवाहित हैं और स्वयं भी सपरिवार किसान सभा में सक्रिय हैं। छोटी बेटी सविता विवाहित हैं और कृषि कार्य करती हैं। तीसरी पीढ़ी में पोता पुलकित काम्बोज बी.टेक. (इलैक्ट्रोनिक्स व कम्युनिकेशन) करके बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत है। दूसरा पोता अनुराग भी बी.टेक. (कम्प्यूटर) के उपरांत बहुराष्ट्रीय कंपनी में है। पोती डॉक्टर अमीषा रानी शोध एवं विज्ञान क्षेत्र में पीएचडी हैं। एक पोती कृतिका बी.ए.एम.एस. कर रही हैं और मीताक्षी दस+दो कक्षा में पढ़ रही हैं। पोता देवराज पहली कक्षा में पढ़ रहा है।
