बलबीर सिंह राठी की तीन गजलें
1
अब पड़ा है खून के सौदागरों से वास्ता अपने जिस्मों से लहू सारा निचोड़ा जाएगा
अपनी नादानी से हम ही जाल में फँसते गए
घेरा-घेरा, रफ़्ता-रफ़्ता, तंग तर होता गया
बन्द होते जा रहे थे अपने सारे रास्ते
सारे बन्धन तोड़ने का फ़ैसला करना पड़ा
सख़्त काविश से हमारे जिस्म भी कुबड़ा गए
फिर भी क्यों महरूमियों का सिलसिला कायम रहा
जो हमारे हमसफ़र थे सिरफ़िरों के भेस में मसखरे थे दोस्तो ! उनसे गिला किस बात का
जाने हम किस मोजिज़े के मुंतज़िर थे उन दिनों
वरना अपनी बेबसी का खूब ही एहसास था
आओ अपने खून का माँगें ख़ुदाओं से हिसाब
जो निचोड़ा अपने जिस्मों से कहाँ बेचा गया
2
दरमियां नफ़रत का दरिया है अभी तक दोस्तो !
आदमी पहुँचेगा कैसे आदमी तक दोस्तो !
कैसे मिलते अपनी राहों में सवेरों के निशान रात से आए थे चल कर रात ही तक दोस्तो !
सब के सब सहमे खड़े हैं रास्तों के आर-पार
इस तरह पहुँचेगा कोई कब किसी तक दोस्तो!
हम जिधर निकले वहीं दीवार आई सामने अपनी आज़ादी रही दीवार ही तक दोस्तो !
इन अँधेरों के लिए कुछ हम भी ज़िम्मेदार हैं क्यों धधक कर जल नहीं पाए अभी तक दोस्तो !
देखना है कौन रह पाएगा अब साबित क़दम
ये सफ़र है तीरगी से रौशनी तक दोस्तो !
हर क़दम पड़ता है अपना ठीक मंज़िल की तरफ़
कौन कहता है सफ़र है गुमरही तक दोस्तो!
3
जो भी मुझसे जुड़ी हुई होगी
वो कहानी अजीब-सी होगी
उसका चर्चा गली-गली होगा
दास्तां जो नई-नई होगी
तुम जिधर से गुज़र गए होगे
चाँदनी-सी बिखर गई होगी
क्या ख़बर थी तुम्हारे जाने पर
ज़िन्दगी यूँ घुटी-घुटी होगी
कल जहाँ पर घना अँधेरा था
क्या वहाँ आज रौशनी होगी
राहरौ राह में खड़े होंगे
और मंज़िल तरस रही होगी
किसने दी है सदा सवेरों को
कौन कहता है रौशनी होगी
