हरियाणा : जूझते जुझारू लोग – 121
सरल, संघर्षशील और समर्पित कार्यकर्ता – कृपा शंकर त्रिपाठी
सत्यपाल सिवाच
मैं कृपा शंकर त्रिपाठी को सर्वकर्मचारी संघ के बनने के शुरुआती दौर से जानता हूँ। यदि कुछ बदला है तो उनकी सहज और गहरी दृष्टि का और अधिक निखरना। कुछ लोगों को ‘सहज और गहरी’ शब्द दृष्टि एक साथ बेमेल लग सकते हैं, लेकिन त्रिपाठी जी के बारे में ये हकीकत को दर्शाते हैं। वे हर घटनाक्रम को बच्चों जैसे सरल स्वभाव से देखते हैं, उससे जुड़े पहलुओं पर मानवीय नजर से सोचते हैं तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ठोस निष्कर्ष निकालते हैं। यह उनके साधारण से दिखने वाले स्वभाव को एक गंभीर शख्सियत के रूप में विकसित कर देता है।
दिनांक 3 अक्तूबर 1959 को उत्तरप्रदेश के अम्बेडकर नगर जिले के गाँव बोदग में सरस्वती देवी और श्री रामकरण के घर कृपा शंकर का जन्म हुआ। वे चार भाई-बहन हैं। परिवार से प्राप्त शिक्षा और संस्कार के चलते वे बहुत अनुशासित एवं सादगी के परिवेश में पले-बढ़े। उन्होंने इंटरमीडिएट तक शिक्षा प्राप्त की।
कृपा शंकर ने 01.12.1981 को सिंचाई विभाग में इलैक्ट्रीशियन के पद पर नौकरी शुरू की और 31.10.2017 को इसी पद से सेवानिवृत्त हो गए। जब वे नौकरी में आए तभी से दफ्तरों में चल रहे भ्रष्टाचार, आम कर्मचारी के शोषण और अन्याय को लेकर अफ्सरशाही के खिलाफ विचार पैदा होने लगे थे। यही वह दौर था जब राज्य में मैकेनिकल वर्करज यूनियन आकार लेने लगी थी। इसी दौर में कर्मचारी आन्दोलन में आई निराशा के बीच से जिला व स्थानीय स्तर पर केन्द्र व राज्यों के कर्मचारी संगठित होने लगे थे। सिरसा कर्मचारी संगठन भी इस विचार से जन्मा था। यहाँ काम करने वाले सैंकड़ों कार्यकर्ता इसके साथ जुड़कर बाद के दौर में आन्दोलनों के योद्धा बने थे। त्रिपाठी जी भी इसी विचार के साथ आगे बढ़ते हुए विकसित हुए
उन्होंने मैकेनिकल वर्करज यूनियन में ब्रांच स्तर के पदाधिकारी से शुरू करके राज्य उपप्रधान तक का सफर पूरा किया। सर्वकर्मचारी संघ के गठन के बाद वे ब्लॉक और जिला सिरसा में मुख्य भूमिका में रहे। वे शेखी नहीं बघारते तथा चुपचाप अपने काम में जुटे रहते हैं। स्थानीय व राज्य स्तर के आन्दोलनों में भाग लेने पर कई बार उनका वेतन रूका। सन् 1986-87 के ऐतिहासिक आन्दोलन में वे 18 दिन चण्डीगढ़ की बुड़ेल जेल में रहे। सन् 1993 में भी उन पर उत्पीड़न हुआ। हर बार सरकार से समझौता होने पर उत्पीड़न निरस्त हो गया और जेल में बिताए समय को ऑन ड्यूटी मानकर वेतन मिला।
उन्हें इस बात पर गर्व है कि सर्वकर्मचारी संघ के आन्दोलन के कारण ही उन जैसे हजारों कर्मचारियों की सेवाएं नियमित हो पाईं। पदोन्नति की एवज एसीपी को भी वे आन्दोलन की बड़ी उपलब्धि मानते हैं। सन् 1986, 1990 और 2017 के कुछ संघर्षों के ऐसे विवरण भी उनके मस्तिष्क छाए हैं जब उन्होंने अपने क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। संघर्षों के दौरान आमतौर पर परिवार के दूसरे सदस्यों को परेशानी हो जाती है। वे घरेलू काम पर अधिक ध्यान देने की मांग करने लगते हैं। इस मामले में कृपा शंकर को कभी असुविधा नहीं हुई। इसके विपरीत परिवार ने उनका साथ ही दिया। त्रिपाठी जी ने राजनेताओं या अधिकारियों से करीबी बनाने की कभी कोशिश नहीं की। हाँ, वामपंथी नेताओं कामरेड अवतार सिंह व राजकुमार शेखूपुरिया आदि से उनकी नजदीकी रही है।
कृपा शंकर मौजूदा दौर और अपने समय की तुलना करते हुए कहते हैं कि कर्मचारी सामूहिक हितों के लिए तन-मन-धन न्योछावर करते हुए नफा-नुकसान नहीं देखते थे। उनकी राय की मौजूदा समय पर निस्वार्थ सेवा भाव से संगठन ताकतवर हो सकते हैं। वे चाहते हैं कि महत्वाकांक्षा को छोड़कर करने से आत्मविश्वास बढ़ता है और सम्मान भी मिलता है।
उनका विवाह सन् 1977 में सुश्री सुशीला देवी से हुआ। उनकी तीन सन्तानें हैं। बेटा केन्द्रीय सचिवालय में नौकरी करता है। एक ने बी. फॉर्मा, दूसरे ने एम.ए. अंग्रेजी और तीसरे ने एम.एससी. फिजिक्स तक शिक्षा प्राप्त की है।

लेखक – सत्यपाल सिवाच
