भेदभाव के उकसावे को अंततः पराजय का मुंह देखना पड़ता है

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजे पर विशेष टिप्पणी

भेदभाव के उकसावे को अंततः पराजय का मुंह देखना पड़ता है

शंभुनाथ

पश्चिम बंगाल का चुनाव नतीजा विस्मित करने वाला नहीं है। पिछली कई राजनीतिक घटनाओं, गुणा–भाग और तैयारियों का यह एक स्वाभाविक चुनाव फल है।

इस नतीजे में छिपा सबसे सकारात्मक संदेश यह है कि भेदभाव के उकसावे को अंततः पराजय का मुंह देखना पड़ता है। इस चुनाव में ’जय बांग्ला’ और ’बाहरी’ का पैदा किया गया उन्माद सफल नहीं हुआ। राजनीति के एक बड़े भेदभाव ने इस छोटे भेदभाव को निगल लिया। संदेश यह है कि भेदभाव का मुकाबला भेदभाव और आंतरिक विभाजन से नहीं किया जा सकता। हमारे देश में हर भेदभाव को एक दिन पराजित होना है, वह जितने शक्तिशाली प्रचार बल पर टिका हो। इसके लिए एक बड़े और उदार विजन की जरूरत है।

दूसरी बात यह है कि भूलकर भी इस पराजय को 19वीं सदी के नवजागरण में उपस्थित पुनरुत्थानवादी या राष्ट्रवादी तत्वों से नहीं जोड़ना चाहिए। उसमें ऐसे कुछ तत्वों के बावजूद एक महानता थी। 19वीं सदी को बीच में लाना विफलता के लिए वर्तमान/विगत शासन की जिम्मेदारियों को या अपनी कमजोरियों को ढकना कहा जाएगा।

बंगाल में यह शासन भ्रष्टाचार, लूट–मार, अत्याचारों और भीषण अहंकार पर टिका था। इसका अंत जरूरी था। यही दशा तमिलनाडु की थी, मुख्य मंत्री स्टालिन अनाप–शनाप और भीषण तमिल उन्माद के साथ चीख रहे थे। ऐसी हर उन्मत्त चीख चाहे वह केंद्र से हो या राज्य से, उसका देर–सबेर अंत होना ही है।

दूसरा महत्वपूर्ण मामला सप्तम वेतन आयोग लागू करने से लेकर महिलाओं को तीन हजार मासिक देने आदि तमाम किस्म की रेवड़ियों से संबंधित है। बंगाली भद्र बाबू , एलीट क्लास ज्यादा समय तक सुख– सुविधाओं से वंचित होकर नहीं रह सकता। अब चुनाव लोभ पैदा किए बिना नहीं जीता जा सकता। यह हमारे देश में लोकतांत्रिक बोध के अत्यंत निम्न स्तर पर पहुंच जाने का चिह्न है।

यह चुनाव बंगाल के हिंदी भाषियों के लिए एक खास खुशी का अवसर है। इस विजय ने उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को परम तृप्ति दी है। लेकिन यह भी मान लेना चाहिए कि यह परम तृप्ति ही उनकी अंतिम उपलब्धि है।

बंगाल का नया नेतृत्व भले डबल इंजन से चले, हिंदी भाषियों की दशा में कोई बड़ा परिवर्तन लाएगा, ऐसा नहीं लगता। सत्ता बदलने का अर्थ यह नहीं है कि व्यवस्था बदल जाएगी। विस्मय नहीं होगा, यदि वे बंगाल में पहले की तरह अजनबी रहें। सरकार में ज्यादातर वे पुराने लोग ही होंगे, सत्ता का स्वाद चख चुके पुरानी आदतों वाले!

देखना है कि आगामी काल सारा मामला बदला लेने में फंसा रहेगा और इसी से लोग तुष्ट हो जाएंगे या बंगाल की स्थिति में कोई बड़ा सुधार आयेगा, नए कारखाने खुलेंगे और नए हब बनेंगे!

आखिरी बात है, अब बंगाल में और देश में विपक्ष की राजनीति की जड़ता टूट सकती है और देश भर के विपक्षी दल सबक लेकर कुछ भिन्न रुख अपना सकते हैं। फिलहाल आपस में सिर फुटव्वल है, पर अब वे नरम हो सकते हैं। अभी एक ट्रैजिक दशा है जो इनके विगत कर्मों का ही फल है! निश्चय ही सोच और आचरण पूरी तरह बदलना होगा।

मेरे जैसे लोग पहले की तरह ही अभी किसी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं कर सकते, भले अधिक अकेले होते जाएं या निशाने पर आएं।
राजनीति का पुनर्मानवीयकरण पहली जरूरत है!!

लेखक के अपने विचार हैं ।

 

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