कविता
राजनीति
अनुपम शर्मा
आज-कल एक अभिनेता
संसद में खूब छा रहा है
आम जनता से जुड़े मुद्दे
बेतकल्लुफ़ी से उठा रहा है
एयरपोर्ट की चाय से लेकर
मोबाइल रिचार्ज का गणित गिना रहा है
गिरगिट की तरह रंग बदल कर
खुद को जैसे मसीहा दिखा रहा है
पार्टी ने उसको किया बेदखल
शतरंज की वो चालें चले जा रहा है
जनता भोली, रंगों को नहीं पढ़ पाती
और वह दल बदल की नीति अपना रहा है
जो दिखता है, वो बिकता है
तभी तो वो राजनीति किए जा रहा है।
