खाड़ी युद्ध: सुपरपावर बनाम प्रतिरोध
धर्मेंद्र आजाद
एक तरफ दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकतें हैं, और दूसरी तरफ प्रतिबंधों से जूझता एक देश—और फिर भी वह करारा जवाब दे रहा है… कैसे?
इज़राइल का सालाना रक्षा बजट करीब 25–30 बिलियन डॉलर है, और इसके ऊपर हर साल संयुक्त राज्य अमेरिका से लगभग 3–4 बिलियन डॉलर की सीधी सैन्य मदद मिलती है। अकेले सऊदी अरब रक्षा पर 70–90 बिलियन डॉलर सालाना खर्च करता है। पूरे खाड़ी क्षेत्र का कुल सैन्य खर्च 150–200 बिलियन डॉलर के आसपास बैठता है, और अमेरिका—करीब 850–900 बिलियन डॉलर सालाना।
यानी इस पूरे गठजोड़ के पास दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत, अत्याधुनिक हथियार, बमवर्षक विमान, मिसाइलें और मिसाइल-रोधी तंत्र—सब कुछ मौजूद है।
दूसरी तरफ ईरान है—करीब 10–15 बिलियन डॉलर का सालाना रक्षा बजट, और दशकों से अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण दबाव में चल रही अर्थव्यवस्था।
ऊपरी तौर पर देखें, अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपे गए इस युद्ध का नतीजा पहले से तय होना चाहिए था। इतना पैसा, इतनी सैन्य ताकत—तो ईरान दो दिन भी नहीं टिकना चाहिए था। लेकिन ज़मीन पर कहानी कुछ और ही कहती है।
एक महीने से अधिक समय से जारी इस भीषण युद्ध में, ईरान पर किए जा रहे भारी हमलों, उसके शीर्ष नेतृत्व को चुन-चुनकर निशाना बनाने, और ऊर्जा ढांचे तथा बुनियादी सुविधाओं—जैसे पुल, स्कूल और अस्पताल—पर लगातार हमलों के बावजूद, ईरान झुका नहीं है। बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुँचाने और युद्ध के नियमों के लगातार उल्लंघन के बावजूद, ईरान समर्पण नहीं कर रहा है।
बल्कि यह कहें कि ईरान इन देशों को नाकों चने चबवा रहा है, उनकी नाक में दम किए हुए है—जैसे ही उसके पीछे हटने की बातें की जाती हैं, वह और बड़े हमले कर देता है। यही बात डोनाल्ड ट्रम्प और नेतन्याहू जैसे हमलावरों की समझ से बाहर लगती है।
कम बजट वाला देश खड़ा है, और बड़े-बड़े बजट वाले देश उसे हराने में लगे हैं—या अब तो कहें कि अपनी चमड़ी बचाने में लगे हुए हैं। यही अपने आप में पूरी कहानी बता देता है।
असल में, भले ही ईरान इन ताकतों को सीधे युद्ध में “हरा” नहीं पा रहा है, लेकिन वह उन्हें लगातार उलझाए रख रहा है—अपनी बेमिसाल रणनीति, अद्भुत हौसले, क्षेत्रीय नेटवर्क, बहु-स्तरीय नेतृत्व संरचना, असममित युद्धकौशल और मिसाइल क्षमताओं के जरिए। यही कारण है कि इतने बड़े बजट के बावजूद यह युद्ध हमलावर देशों के लिए गले की फाँस बनता जा रहा है।
कम संसाधनों के बावजूद, ईरान ने यह दिखाया है कि इच्छाशक्ति और अपने फैसलों पर टिके रहना भी शक्ति का हिस्सा हैं। उसने समर्पण नहीं, बल्कि खुद्दारी का रास्ता चुना है—और यही बात बड़े-बड़े बजट वालों को असहज करती है।
फर्क यहीं है—ईरान और फ़लिस्तीन अपने अस्तित्व और संप्रभुता के लिए लड़ रहे हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका–इज़राइल क्षेत्रीय प्रभुत्व और नियंत्रण बनाए रखने के लिए। और जब मकसद अलग होता है, तो नतीजे भी सिर्फ बजट से तय नहीं होते—वरना अब तक ईरान का अस्तित्व खत्म हो चुका होता।
अब ज़रा भारत की तरफ देखें।
यहाँ ताकत को अक्सर बजट, हथियार और बड़े-बड़े दावों से मापा जाता है, लेकिन असली सवाल कहीं और है—फैसले कितने स्वतंत्र हैं? जब बड़े नेता और उनके करीबी उद्योगपति देश-विदेश की गड़बड़झालाओं और एप्सटीन जैसी कुख्यात फाइलों में फँसे हों, तो नीतियाँ कितनी स्वतंत्र रह जाती हैं?
फिर होता क्या है? उन्हें झुकाना और ब्लैकमेल करना आसान हो जाता है। और जब देश को चलाने वाले झुकते हैं, तो नीचे पूरा देश झुकता हुआ दिखाई देता है। मतलब साफ है—कुछ लोगों के काले कारनामों की कीमत पूरा देश चुकाता है।
नतीजा यह होता है कि जहाँ देशहित में मजबूती से खड़े होने की ज़रूरत होती है, वहाँ घुटने टेकना ही नहीं, बल्कि साष्टांग लेटना तक “व्यवहारिक राजनीति” बन जाता है।
सीख बहुत सीधी है—हथियार खरीदना आसान है,
लेकिन अपने फैसले खुद लेना और उन पर टिके रहना मुश्किल है।
देश मजबूत तब बनता है जब—
* सरकारें और उनके नेता पाक-साफ़ हों
* समाज एकजुट हो, जाति-धर्म-नस्ल-क्षेत्र के नाम पर बँटा हुआ न हो
* सरकार अपने लोगों पर भरोसा करे
* और बाहरी दबाव के सामने झुके नहीं
क्योंकि अंत में—कम बजट वाला देश भी मजबूती से खड़ा रह सकता है, अगर उसका इरादा साफ और मजबूत हो। और बड़ा बजट वाला देश भी कमजोर पड़ सकता है, अगर वह अंदर से बँटा हुआ हो और नेताओं-उद्योगपतियों के काले कारनामों की वजह से बाहर से दबा हुआ हो।
यह लेखक के अपने विचार हैं, इससे सहमति जरूरी नहीं है।
