मुनेश त्यागी की कविता – इंकलाब से मिले तो हमें जीतना आ गया

कविता

इंकलाब से मिले तो हमें जीतना आ गया

मुनेश त्यागी

बचपन में चला करते थे घुटनों के बल
मां बाप के हाथ मिले तो चलना आ गया।
मुश्किलों के खिलाफ लड़े तो थे बहुत
हारते हारते हमें उभरना आ गया।

हकों के लिए मिलकर लड़े थे बहुत
लड़ते लड़ते ही हमें जूझना आ गया।
मेहनतकशों से जब मिलकर चलने लगे
मुट्ठी भींच कर आवाज उठाना आ गया।

अकेले-अकेले तो मजबूर थे चुप रहने को
एकजुट हुए तो हमें बोलना आ गया।
जमाने की लूट ने हमें रौंदा था तो बहुत
अपनों का मिला साथ तो भिडना आ गया।

उनकी सारी चालाकियां धरी की धरी रह गईं
यह सब देखकर हमें भी संभलना आ गया।
जुल्म ओ सितम ने हमें कहां उभरने दिया
मिला आपका साथ तो मुस्कुराना आ गया।

उनकी कोशिशें थीं कि हिंदू मुसलमां खूब लड़ें
मगर हमें तो और भी साथ निभाना आ गया।
इंकलाब के बारे में सुना तो था बहुत
इंकलाब से मिले तो हमें जीतना आ गया।

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