जयपाल की दो कविताएं- युद्ध के बाद

युद्ध के विरुद्ध युद्ध-12

कविता हमेशा युद्ध के खिलाफ़ खड़ी रही है, भले ही तानाशाह युद्ध को राष्ट्रवादी गौरव बताकर उसका महिमामंडन करते रहे हों। लेकिन उसकी कीमत आम आदमी ने ही चुकाई है (महमूद दरवेश)। बहरहाल जो युद्ध चल रहे हैं उनके नकारात्मक प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहे हैं । किसी भी युद्ध में जहां बच्चे और महिलाओं समेत नरसंहार होते हैं, वहीं इस विध्वंस से अंतरराष्ट्रीय सामाजिक जीवन भी तहस-नहस होता है।

प्रतिबिंब मीडिया साहित्यकारों की इस चिंता से भली-भांति वाकिफ़ है। ‘युद्ध के विरुद्ध युद्ध’ शीर्षक के तहत हम आपका युद्ध विरोधी साहित्य प्रकाशित करेंगे। आप अपनी कविताएं, कहानियों समेत रचनाएं हमें भेजिए, उन्हें प्रतिबिंब मीडिया पर ससम्मान प्रकाशित किया जाएगा। इस कड़ी में हमने ओमसिंह अशफ़ाक, जयपाल, रबीन्द्रनाथ टैगोर, पाश समेत कई कवियों की कविताएं प्रकाशित की हैं। आज प्रस्तुत है जयपाल की दो कविताएं युद्ध के बाद। संपादक

जयपाल की दो कविताएं- युद्ध के बाद

युद्ध के बाद – 1

 

युद्ध के बाद…..

मनुष्य खोजता है मानवीय रिश्तों की बिखरी हुई पत्तियाँ

पशु-पक्षी देखता है कोई बचा-खुचा हरा पेड़

हवा चाहती है एक मुट्ठी भर आसमान

बादल की इच्छा बस अंजुरी भर पानी

आकाश की चाहत तारों की एक लड़ी

नदियाँ ढूँढती हैं गीलापन

पहाड़ एक टोकरा भर मिट्टी

इसी तरह

खेत चाहता है अनाज के कुछ दानें

बाग-बगीचे, कोयल सी कूक

और जंगल चाहता है गिलहरी का एक बच्चा

सबकी चाहत फिर से एक सृजन

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युद्ध के बाद-2

 

युद्ध के बाद

शहर का मलबा

केवल मलबा नहीं होता

उसमें दफ़न होता है

मानवीय संवेदनाओं का दरिया

जिसे फिर से भरा जाएगा

इतिहास की किताबों के सुनहरे पन्ने

जो फिर से लिखे जाएँगे

संस्कृतियों की अमर प्रेम-कथाएँ

जो फिर से गाई जाएँगी

सभ्यता के विकास की रोमाँ चक यात्राएँ

जिन पर यायावर फिर निकलेंगे

विज्ञान की मानवीय ऊंचाइयाँ

जिन्हें फिर छूआ जाएगा

प्राणी मात्र के लिए शुभकामनाएँ

जो फिर से हरी होंगी

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