कविता
युवती कूड़ा बीन रही है!
ओमसिंह अशफ़ाक
युवती कूड़ा बीन रही है!
साठ साल में भी दीन रही है?
कच्ची बस्ती में रहती है
झुग्गी को वो घर कहती है
गलियों नलियों में गंद मचा है
क्या उसके हिस्से यही बचा है?
शिक्षा का भी मुंह नहीं देखा
शेष समाज में भयानक एका
पोषण भी ढंग से नहीं हुआ है
यूं ‘शिष्टाचार’ ने नहीं छुआ है!
है पेशा एक-पर गजब फर्क है
सेठ का है ‘डिस्पोजल बिजनेस’-
पर इसका जीवन बना नर्क है
यह आजादी की वर्षगांठ है?
या सत्ता-पूंजी की सांठ-गांठ है?
आखिर क्यूं ये हीन रही है!
युवती कूड़ा बीन रही है!
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भांति-भांति का है कचरा फैला
उजला थोड़ा है, ज्यादा मैला-
कागज कीलें पॉलिथीन के टीले
कूड़े का सब घाल-मेल है-
पीस ब्रेड के, कांच के टुकड़े
बड़ा भयानक तालमेल है!
वहीं पे सूअर वहीं पे कुत्ते
कभी जागते, कभी हैं सुत्ते!
बड़ी विषैली गंध आती है
मन में मितली-सी उठती है
सिर को भी भन्ना जाती है!
तन के चिथड़े फटे-हाल हैं
युवती यूं ना शर्माती है!
चील और कव्वे घूर रहे हैं-
हक मानो उनका छीन रही है!
युवती कूड़ा बीन रही है!
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ये नहीं निरापद, खतरनाक है!
जीवन युवती का बना राख है!
इस जीवन में कोई उमंग नहीं है
क्या देश का ये अंग,भंग नहीं है?
जिम्मा इसका भी तो लेना होगा-
उत्तर जनता को देना होगा?
जीवन कूड़े का जो ढेर बनेगा-
तो शासन कितनी देर तनेगा?
सब सड़कें एक दिन जाम मिलेंगीं!
फौज-पुलिस नाकाम मिलेंगीं!
ये रोष किसी दिन बह जाएगा!
गढ़ सत्ता का ये ढह जाएगा!
रुखसत होगी वो सत्ता-रानी-
जो अब तक आसीन रही है!
क्यूं युवती कूड़ा बीन रही है?
(जनवरी 2007)
