कविता
दादा-पोता
ओमसिंह अशफ़ाक
आया है घर में बरसों बाद
एक जीवंत खिलौना
सांसों में अटका है हमारी
उसका हंसना,उसका रोना..
एक-एक अदा उसकी
इंतजार में घंटों तरसाती है
हो जाता है तनिक उदास
हमारी भूख-प्यास उड़ जाती है..
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हंसता है जब वह,चमक नींद में
वीणा के तार झंकृत हो जाते हैं
आहट सुनकर रोने की सब-
सरपट दौड़े आते हैं
जाने कैसी कशिश है ये
ये कैसा हमसे नाता है
स्पर्श फूल-सा कोमल क्यों
सदियों से हमें लुभाता है?..
अब उसकी नींद हम सोते हैं
और उसकी प्यास हम पीते हैं
बिन उसके,अब दिल अपने
खुशियों से रीते-रीते हैं
हम उसके लाड़ लड़ाते हैं
या वो हमको दुलराता है
भावों की अजब ये लीला है
कुछ कहना मुश्किल हो जाता है।
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जब नींद में सोया रहता है
सपनों में खोया रहता है
वहां दूध उसे बस भाता है
और पी-पीकर मुस्काता है..
सपने में स्वाद मिल सकता है
पर भूख कहां मिट पाती है
फिर हो उत्तेजित जागता है
और खुद को ठगा-सा पाता है
है खेल ये नन्ही दुनिया का-
पर गुस्सा बड़ों पर आता है?..
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थोड़ा वक्त अब गुज़रेगा
फिर घुटनों के बल लुढ़केगा का
जब आएगा फेरीवाला
गुब्बारे खातिर उचकेगा..
कुछ और बड़ा हो जाएगा
तो उंगली पकड़ चलाऊंगा
चल-चलकर थक जाएगा
तो मैं घोड़ा बन जाऊंगा..
जब मैं बूढ़ा हो जाऊंगा
मुछे चिट्टी हो जाएंगीं
वो दाढ़ी मेरी सहलाएगा
मैं उसकी पीठ खुजाऊंगा।
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यह वात्सल्य की माया है
यहां उम्र-भेद मिट जाता है
बच्चा, बूढ़े की परतीति है
और बूढा, बच्चा बन जाता है
यह दादा-पोते का रिश्ता है
सदियों से चलता आता है
एक तो उगता सूरज है-
एक दिशा रसातल जाता है?
दादा में रहता पोता है
फिर पोता, दादा हो जाता है..
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हम यूं ही मौजूद रहे हैं
वर्ष हजारों से जग में
मानवता की जुड़ी श्रृंखला
संतति के इस पग में..!
(जुलाई 2002)
