ओमसिंह अशफ़ाक की कविता: दादा-पोता

कविता

दादा-पोता

ओमसिंह अशफ़ाक

 

आया है घर में बरसों बाद

एक जीवंत खिलौना

सांसों में अटका है हमारी

उसका हंसना,उसका रोना..

एक-एक अदा उसकी

इंतजार में घंटों तरसाती है

हो जाता है तनिक उदास

हमारी भूख-प्यास उड़ जाती है..

**

हंसता है जब वह,चमक नींद में

वीणा के तार झंकृत हो जाते हैं

आहट सुनकर रोने की सब-

सरपट दौड़े आते हैं

जाने कैसी कशिश है ये

ये कैसा हमसे नाता है

स्पर्श फूल-सा कोमल क्यों

सदियों से हमें लुभाता है?..

अब उसकी नींद हम सोते हैं

और उसकी प्यास हम पीते हैं

बिन उसके,अब दिल अपने

खुशियों से रीते-रीते हैं

हम उसके लाड़ लड़ाते हैं

या वो हमको दुलराता है

भावों की अजब ये लीला है

कुछ कहना मुश्किल हो जाता है।

**

जब नींद में सोया रहता है

सपनों में खोया रहता है

वहां दूध उसे बस भाता है

और पी-पीकर मुस्काता है..

सपने में स्वाद मिल सकता है

पर भूख कहां मिट पाती है

फिर हो उत्तेजित जागता है

और खुद को ठगा-सा पाता है

है खेल ये नन्ही दुनिया का-

पर गुस्सा बड़ों पर आता है?..

**

थोड़ा वक्त अब गुज़रेगा

फिर घुटनों के बल लुढ़केगा का

जब आएगा फेरीवाला

गुब्बारे खातिर उचकेगा..

कुछ और बड़ा हो जाएगा

तो उंगली पकड़ चलाऊंगा

चल-चलकर थक जाएगा

तो मैं घोड़ा बन जाऊंगा..

जब मैं बूढ़ा हो जाऊंगा

मुछे चिट्टी हो जाएंगीं

वो दाढ़ी मेरी सहलाएगा

मैं उसकी पीठ खुजाऊंगा।

**

यह वात्सल्य की माया है

यहां उम्र-भेद मिट जाता है

बच्चा, बूढ़े की परतीति है

और बूढा, बच्चा बन जाता है

यह दादा-पोते का रिश्ता है

सदियों से चलता आता है

एक तो उगता सूरज है-

एक दिशा रसातल जाता है?

दादा में रहता पोता है

फिर पोता, दादा हो जाता है..

**

हम यूं ही मौजूद रहे हैं

वर्ष हजारों से जग में

मानवता की जुड़ी श्रृंखला

संतति के इस पग में..!

 

(जुलाई 2002)

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