विषमता के बोध की तुलना में वंचना का बोध पैदा करना ज्यादा आसान क्यों है?

विषमता के बोध की तुलना में वंचना का बोध पैदा करना ज्यादा आसान क्यों है?

 

शंभुनाथ

 

आखिर लोगों में विषमता (इनक्वालिटी) के बोध की तुलना में वंचना (डिप्राइवेशन) का बोध पैदा करना ज्यादा आसान क्यों है? दोनों दिखने में निकट लगते हैं पर बिलकुल अलग मामले हैं। विषमता का बोध किसी असमान व्यवस्था की गहरी समझ की देन है, जबकि वंचना का बोध भावनात्मक है और तत्काल अहसास कराता है- मुझसे कुछ छीना गया है! वंचना का बोध पैदा करने के लिए सामने एक स्थायी शत्रु निर्मित करके डर और अपमान के वृत्तांत रखते जाना काफी है।

एक अन्य बात है, विषमता का बोध सत्ता से सवाल करता है जबकि वंचना किसी एक खास समूह को दोषी ठहरा कर मौजूदा सत्ता में ही जगह मांगती है। वंचनाबोध की प्रबलता ने साहित्य को इकहरा विमर्श और करीब-करीब तात्कालिकतावादी बना दिया है। पॉप राजनीति ने भी ज्ञान परंपरा की विविधता और रचनात्मकता को अवरुद्ध कर रखा है।

वंचना की भावना सवाल रखती है, ‘मुझसे क्या छीना गया?’ वह इस प्रश्न को ओझल रखती है कि वंचना के पीछे पूंजी, राज्य और वर्ग की भूमिका है या नहीं। फिर वंचित के गुस्से और हिंसा का निशाना एक छोटा समूह या ‘अन्य’ समुदाय बनता है। संघर्ष किसी व्यवस्था की जगह बगल में खड़े आदमी से होने लगता है। यह मामला कई बार आपस में एक-दूसरे से बदला लेने जैसा होता है जो किसी भी स्वेच्छाचारी सत्ता के लिए बेहद सुविधाजनक है।

लक्षित किया जा सकता है कि दुनिया के लोकतंत्रों में बहुसंख्यक की निरंकुशता बढ़ती गई जब ध्यान विषमता से पूरी तरह हटकर वंचना की तरफ चला गया। सत्य अकेला होता गया- साझा सत्य नहीं बचा। इस वक्त विषमताबोध और साझा सत्य दोनों ही राजनीतिक-तकनीकी बल पर दृश्यता से बिलकुल बहिष्कृत हैं।

विषमता के बोध के लिए समाज और इतिहास का ज्ञान चाहिए, थोड़ा ठहरकर सोचने का समय चाहिए और आलोचनात्मक विवेक चाहिए जबकि वंचना के बोध के लिए आक्रोश और शोर काफी है। एक समय लोग विषमता को लेकर बेचैन थे, पर अब इसे स्वाभाविक मान लिया गया है।

कहना न होगा कि विषमता का बोध उत्पीड़ितों के बीच संवाद की मांग करता है, जबकि वंचना का बोध एकालाप, ध्रुवीकरण और भीड़ की दशा में ले जाता है! वंचना का बोध विशेष दशा में एक हद तक जरूरी है, पर सभी रंग के वंचितों के बीच संवाद और एकता भी जरूरी है।

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