ओमसिंह अशफ़ाक की कविता – खान मजूर

कविता

खान मजूर

ओमसिंह अशफ़ाक

 

हम सब तुम्हें सलाम भेजते हैं

सलीम अंसारी!

हमारी दुआएं क़बूल करो

सलीम अंसारी!

शर्मसार हैं बहुत हम

अपने गुनाहों के लिए

हमारे गुनाह माफ़ करो

सलीम अंसारी!

यूं तुम्हें जरूरत नहीं है हमारी दुआओं की

कशिश भी नहीं है उनमें कोई

हमारी दुआ या किसी की दवा से

नहीं बची है तुम्हारी जान

ये सारी दुनिया को पता है

सलीम अंसारी!

जयरामपुर कोलियरी के पास

बागडीही खान में

दफ़न रहे तुम सात दिन तलक

अंधियारी खदान में

लाखों टन ख़ाक के नीचे

लिए रहे जल-समाधि

उस अंधकार के सागर में

नन्ही सी जान को मिटाने के लिए

काफी थी खान की घुटन ही

सलीम भाई!

झेलने पड़े तुम्हें दोहरे ज़लज़ले।

**

अफसरों ने तो कोयला खान के

छोड़ी नहीं थी कोई कसर बाकी

फिर भी तुम बच गए

किसी करिश्मे की तरह

सलीम अंसारी!

सात की जगह दो पंपों को काम पर लगाया

(वह भी 24 घंटे बाद?)

गोताखोरों को क़ातिलाना-देरी से बुलाया

(वह भी 48 घंटे बाद?)

बचाव-कार्यों में चले कछुआ चाल

फिर भी तुम बच गए सलीम अंसारी!

तुम्हारे नाम तो वसीयत भी नहीं थी

किसी राजमाता की

पाने की आस में जिसको

मौत को परास्त कर आए तुम

सलीम अंसारी!

**

सच-सच बतलाओ

कैसा लगा सात दिन लगातार

मौत का वो खौफनाक खेल

किस हुनर से रहे जीवित

अंधियारी खान में-

पीकर गंदला पानी

आया था जो लेकर पैगाम

तुम्हारी मौत का-

गरल पीकर अटके रहे तुम

किसी ‘एअर-पॉकेट’ में

सूली पर चढ़े लटके रहे

ईसा मसीह की तरह!

पीटते रहे टूटा कनस्तर फौलादी हाथों से

इस आस में कि कभी-न-कभी तो

पहुंच ही सकती है ध्वनि की कोई तरंग

किसी मददगार के कान में!

बावजूद इसके कि

एहसास था तुम्हें अधिकारियों के अपराधिक बहरेपन का?

**

नहीं, सलीम भाई!

मुझे पता है तुम कुछ भी नहीं बोलोगे

उस हैरत-अंग्रेज मौत के मंजर का

भेद नहीं खोलोगे

कि लफ़्ज़ों में बयान नहीं हो सकती

तुम्हारी त्रासदी

आग का दरिया था वो

गुजर कर आए हो जिसके बीच से तुम

बेहोशी की हालत में

उस ताप-संताप को तो बस

 महसूसा जा सकता है

होशो-हवास रहने तलक।

शब्द और ध्वनि की सीमा से परे है

विवरण उसका

लौटे हो जहां से तुम।

**

जानता हूं

बहुत रंजीदा हो अभी भी तुम

अपने साथियों की मौत पर-

उतरोगे जब-जब भी खान में

याद आएंगे बहुत बिछड़े साथी

और उदास हो जाओगे तुम

चंद्रदेव, बिरजमोहन और छोटू मियां के गम में..

पर इसमें तुम्हारा दोष कहां है सलीम भाई!

तुम्हारे जागरुक साथियों ने तो रोका था बहुत

बी.सी.सी.एल. के अफसरों को

भांपकर खतरा संभावित तबाही का

ध्यान भी दिलाया था बहुत

रिश्ते पानी की तरफ

जयरामपुर खदान से..

कर दिया था इंकार

विस्फोट करने से बागडीही खान में

देकर वास्ता घटती चौड़ाई का

अवरोध दीवार की

रह गई थी जो मात्र पचास फुट

दो सौ के स्थान पर।

पर उनकी एक न सुनी

बेरहम प्रबंधकों ने

झोंक दिया दूसरा मजदूर-दस्ता

मौत के खुले मुंह में..

सत्तर लाख गैलन हड़हड़ाता पानी

सैलाब की वेगवती-धार

और इधर चालीस निहत्थे मजदूर

न कोई नाव, न पतवार

अनवरत चलता आया है

यही सिलसिला वर्षों पहले से

कितनी बार कितने हजार जिंदगियां

निगल चुकी हैं यही गुफाएं

तुम्हारे आत्मीयजनों की?

**

गर होते तुम

किसी सैनिक मोर्चे पर

कदम चूमता तुम्हारे परमवीर चक्र

मिल चुका होता जनरल का ओहदा

इनाम-इकराम में

यदि होते तुम राजनेता

तो सुरक्षित था भारत रत्न तुम्हारे लिए

अगर होते पत्रकार-लेखक

तो दौड़ रहे होते पीछे तुम्हारे

देसी-विदेशी कई प्रकाशक

कमा चुके होते तुम हजारों डॉलर रॉयल्टी में

लिखकर संस्मरण-सात दिन,सात-रात

मौत के साथ-साथ..

मगर अफसोस!

तुम उनमे से कोई नहीं हो!

तुम तो हो बस खान-मजूर

इतने बलशाली की फोड़ सकते हो

धरती का चट्टानी सीना-

फिर भी कमजोर हो?

हुनरबाज इतने कि

मिट्टी को बनाते हो सोना-

फिर भी गरीब हो?

साहसी इतने की उतर जाते हो-

मीलों गहरे मौत के कुएं में

फिर भी राजा के प्यादे से घबराते हो?

दरअसल ये घबराहट तुम्हारी नहीं तुम्हारी मजबूरी की है

सलीम भाई!

अजीब विडंबना है ये

जाने कब आएगी वह घड़ी

लिख सकोगे जब तुम

अपनी किस्मत के लेख

खुद अपनी छैणी से

जो मिटाए ने मिटें

हटाए न हटें?

**

अच्छा एक बात बताओ सलीम भाई

क्या सोचा था तुमने

सात युगों लंबे उन सात दिनों में?

घिरे थे जब तुम अभिमन्यु की तरह

मौत की गिरफ्त में..

कैसी लगी थी तब यह खूंखार दुनिया

क्या था तुम्हारा संकल्प

जीवन के विषय में-

बीवी बच्चे कुटुंब कबीला संगी-साथी

सभी तो आए होंगे याद

गुजरे हसीन लम्हे

उस नाजुक घड़ी में..

फिर डूब गए होगे तुम

उसी अनवरत चिंता में-

भारी कर्ज का बोझ

और घर में जवान बिटिया

पराजित हुई होगी फिर एक बार

तुम्हारी वही पुरानी योजना–

छुटकू का अंग्रेजी स्कूल में दाखिला

और बिटिया का शहर में निकाह!..

**

लड़े हैं तुमने जीवन भर कितने-कितने युद्ध

पर नहीं टूट पाए चिताओं के दुर्ग

फिर भी तुम हिम्मत नहीं हारे!

जो झेला है तुमने

वो किसने देखा है?

जो भुगता है तुमने

वो किसने भोगा है?

बेढब इंसान हो भाई

तुम पूरी सृष्टि में!

 

(10.02.2001)

 

(संदर्भ: 2 फरवरी 2001 को बागडीही खान में हुई भयावह दुर्घटना जिसमें 29 मजदूरों के शव और बेहोश खान मजदूर सलीम अंसारी को 7 दिन बाद निकाला गया था)

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