मंजुल भारद्वाज की कविता- इस दुनिया में मानवता,प्रेम और विविधता के शत्रु हैं धर्म और जात !

 

 

कविता

इस दुनिया में मानवता,प्रेम और विविधता के शत्रु हैं धर्म और जात !

मंजुल भारद्वाज

 

 

विविधता प्रकृति निर्मित है जैसे रंग,भूगोल,पानी,मिट्टी,

हवा,मौसम,समन्दर,पहाड़ ,नदी,रेगिस्तान,बर्फ़ीला भूभाग आदि आदि.

मनुष्य निर्मित जड़ होता है जैसे आदिकाल की सत्ता का तन्त्र जिसे धर्म के नाम से जानते हैं जो सत्ता और सत्ताधीशों के अलग अलग प्रवृति के रूप में नज़र आता है. जो अपनी जिम्मेदारियों से भागने के लिए ईश्वर का उपयोग करता है.

अपनी जिम्मेदारियों को ईश्वर के नाम लिख देना ही पाखंड है. उसी तरह मनुष्य की बनाई जात जो वर्णवादी सत्ता का कूड़ा है. जात विविध नहीं हैं अलग अलग हैं.

जात शोषण,असमानता,अन्याय,हिंसा,दमन और अमानवीयता का कलंक है. प्रकृति के प्राकृतिक न्याय,समता और विविधता का विध्वंश करते हैं धर्म और जात ! इस दुनिया में मानवता,प्रेम और विविधता के शत्रु हैं धर्म और जात !

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