मोहनदास नैमिशराय की दो कविताएँ

मोहनदास नैमिशराय की दो कविताएँ

1

नए शहर में

 

सोचा था नए शहर में

नए लोग होंगे

जीवन के प्रति

उनकी नई दृष्टि होगी

वे ब्रह्मा-दर्शन की सृष्टी से

मुक्त होंगे

उनके पास

नए विचार होंगे

और होंगे वे

दुष्परंपराओं से मुक्त

मेरी तरह

 

भुक्तभोगी भी नहीं होंगे

न होंगे शहर की जेल में

कैदी की तरह

मुक्त होंगे

जाति के जंजालों से

और पाखंडों से

उनके पास

नए मित्र होंगे

नए सपने होंगे

लेकिन मैं क्यों भ्रम में था..?

रेलवे स्टेशन से जो सड़क

बाजारों/बस्तियों /और गलियों तक जाती थी

उन सब में जातियों की परछाईयाँ थी

 

2

तानाशाह

 

कहते हैं तानाशाह कभी हंसता नहीं है

पर हमारा तानाशाह

खूब हस्ता हैं

वह लोरी भी सुनाता है

और मन की बात पर खुद

वो ताली भी बजाता है

कभी हिटलर/मुसोलनी और…

वे तानाशाह तो हत्या

कराते थे

हमारा तानाशाह नहीं कराता किसी की हत्या

लोग खुद आत्महत्या कर लेते हैं

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