कुछ निजी प्रसंग-5
आज का समय और कविता की ताकत-5
ओमसिंह अशफ़ाक
यह पांचवीं घटना उस महकमे की है, जहां 34 साल नौकरी करके मैंने सन् 2004 में स्वेच्छा से रिटायरमेंट ले ली थी।
सन् 2007 में ‘अन्याय गाथा’ छपकर आई तो मैं अपने कुछ पूर्व सहयोगियों-मित्रों को पुस्तक देने गया। क्योंकि उनमें कुछ ‘जतन’ पत्रिका के वार्षिक ग्राहक भी थे।
पुस्तक को उलटते-पलटते हुए मेरे मित्र रामनिवास रंगा की नजर पुस्तक में छपे खाप पंचायतों संबंधी पद्यांशों पर पड़ी।
रंगा साहब उसी इलाके से आते हैं, जहां खापों का अत्यधिक दबदबा है।और सामाजिक जीवन में उनका अनचाहा दखल प्रायः होता रहता है। वे बोले’ आपको इन खाप पंचायतों से डर नहीं लगता..?’
मैं उनका इशारा समझ कर हंसते हुए बोला-‘हां रंगा साहब,डर तो कभी-कभी लगता है, पर फ़ौरी बचाव के अभी दो रास्ते बचे हुए हैं। एक तो खाप-पंचायती प्रायः कविता पढ़ते ही नहीं हैं। और यदि कोई पढ़ भी ले तो मेरे जैसे अकेले कवि की आवाज उन्हें नकारखाने में तूती बजाने जैसी लगेगी।
अगर ऐसा नहीं होता तो अब तक या तो पुस्तक प्रतिबंधित हो गई होती?या फिर मुझे देश बदर कर दिया होता।’ ऐसा कहकर हम सब हंस पड़े थे।
तभी मुझे एक ख्यात चिंतक और गंभीर कवि ‘मुक्तिबोध’ की कुछ पंक्तियां शिद्दत के साथ याद हो आयीं। इनमें उन्होंने स्पष्ट कहा था कि “अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने ही होंगे..
“और मुक्ति के रास्ते अकेले में नहीं मिला करते..!”
उस कविता के कुछ अंश यहां उद्धृत हैं :
1
कभी पहरावर’ में रोला हो !
कभी फरमाणा’, हरसोला’ हो।
फिर के होली के होला हो?
शासक भी ना इतना भोला हो।
भई, पता ना रत्ती तोला हो?
यूं मंद मंद मुस्काता हो !
मुस्कान में तथ्य छुपाता हो !
सत्ता का नशा दिखलाता हो !
भई!दिन बरजण के आन पड़े !
2
कहीं महमदपुर’, जाटू-लुहारी हो।
कहीं घुड़चढ़ी, रैदास सवारी हो।
कहीं जलसे की तैयारी हो।
फिर बालन्द की इंतजारी हो।
अज तेरी, कल मेरी बारी हो।
हर थां तै वही दुश्वारी हो।
न्यू सोचे बैठ बनवारी हो।
या जिंदगी लगे उधारी हो।
भई! दिन बरजण के आन पड़े।
3
नरमेध गोहाना’, दुलीणा’ हो!
नर जाति से उच्चा होणा हो।
हाए। ऐसी सोच “कमीणा” हो।
घुट घुट के पड़े जीना हो ।
नित खून के आंसू पीना हो।
फिर क्या मरना क्या जीना हो।
भई! दिन बरजण के आन पड़े !
4
जब खापों की पंचायत जुड़ें !
तब लोकतंत्र की धज्जी उड़ें !
ना नेता,अफसर दखल करें !
जो दखल करें, बेमौत मरें !
जब पंचायती पग्गड़धारी हों !
हाथों में तेग दुधारी हों !
कई तरियों की लाचारी हों !
फिर कैसे कोई उजर करे !
बिन उजर करे भी दंड भरे ?
भई!दिन बजरण के आन पड़े !
5
ना विधि-न्याय के वे ज्ञाता हों !
खुद घर में बणे विधाता हों !
फिर जान पे ऐसा रास्सा हो !
सरेआम ये रोज़ तमाशा हो !
शादी-तोड़न के फ़रमान करें !
नौजवानों के अरमान मरें !
फ़रियादी कोर्ट में केस करें !
तब शासक मुलजिम पेश करें !
भई!दिन बजरण के आन पड़े !
6
दलितों की बस्ती जलती हो !
लठगर्दी सियासत चलती हो !
जुल्म गरीब पे होता हो !
वो पीड़ा की गाथा रोता हो !
सरकार और शासन सोता हो !
इंसाफ कहीं न होता हो !
भई! दिन बरजण के आन पड़े !
7
जब कन्या गर्भ में उतरती हो !
जन्म से पहले ही मरती हो !
यूं पाप-से-काली धरती हो !
दादा भी ना चाहे पोती हो !
दादी पोते ने रोती हो?
पुरुषों का ही सारा गलबा हो !
फिर समाज बणे यूं मलबा हो !
भई! दिन बरजण के आन पड़े!
8
जब कन्याएं सब रोज मरें !
फिर बिन ब्याहों की फौज फिरें !
अब बुढ़िया को भी ताप चढ़ै !
जुल्म के साथ कुकर्म बढ़ै !
बिक्री का औरत माल बणे !
तब ना पगड़ी की ढाल तणे?
सब ताना-बाना टूट पड़े !
फिर देखें सब हैरान खड़े !
किस नरक में आ भगवान पड़े !
भई! दिन बरजण के आन पड़े !
मिलती-जुलती रंगत के कुछ और बंद भी पढ़ लीजिए:
9
कमला और तनुजा’ की जब,
कठ्ठी अस्मत लुटती हों !
प्रतिरोध में लड़ते-लड़ते,
कमला की बाजू कटती हों !
जिला रायसेन में दिन-दहाड़े,
जब ये कुकरम होता हो !
मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री फिर,
नींद मजे की सोता हो !
वो ‘संघ’ का खूब चहेता हो,
यूं इंसाफ दुहाई देता हो !
फिर कटे हुए दो हाथ लिए-
दिल्ली दरबार में आना पड़े !
लोकतंत्र में क्या बच गया?-
सारे देश को जब शरमाना पड़े !
भई! दिन बरजण के आन पड़े !
10
एक मुहतरमा इमराना है !
ना’ सबका सुना-पहचाना है !
ये किस्सा ना बहुत पुराना है !
बना ससुर हवस का दाना है !
क्या माफ़ी का कोई खाना है?
या अस्मत का हर्जाना है?
रे कोई इंसाफी मौलाना है?
ता-उमर उसे पछताना है !
भई!दिन बरजण के आन पड़े !
11
मरद सभी एक सुर में बोलें !
क्या हिन्दू, क्या मुस्लिम डोलें !
बातों में बस मिसरी घोलें !
भेद जिगर का क्यूंकर खोलें?
नज़र में जिनकी औरत हीणी !
दिखे,उन मरदों की सोच कमीणी” !
(2006 उत्तरार्ध)
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“बरजण” यानी रोकना मना करना,वरज़ना,वर्जित करना।
1-8 हरियाणा के गांवों के नाम जहां दलित उत्पादन की घटनाएं हुई।
1. कमला और तनुजा-दो आदिवासी बहनों के नाम। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में घटी “उत्पीड़न और बलात्कार” की दर्दनाक घटना जिसमें कमला के दोनों हाथ काट दिये गये थे।
