प्रकृति को हमारी नहीं, हमें उसकी ज़रूरत है
डॉ रीटा अरोड़ा
आज के दौर में हम अक्सर यह कहते हैं कि “हमें प्रकृति को बचाना है।” लेकिन यदि इस विचार को गहराई से समझा जाए, तो सच्चाई कुछ अलग है-हमें प्रकृति को नहीं, बल्कि खुद को बचाने की आवश्यकता है। यह बात पहली नजर में अजीब लग सकती है, पर वास्तविकता यही है कि मानव जीवन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है।
हम यह भूल गए हैं कि हम प्रकृति के स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक छोटा-सा हिस्सा हैं। पंचतत्व-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश- ही जीवन की मूल नींव हैं, लेकिन आज मनुष्य इन्हीं तत्वों का सबसे अधिक शोषण कर रहा है। पृथ्वी को हम खनन, जंगलों की कटाई और कंक्रीट के शहरों से घायल कर रहे हैं। जल, जो जीवन है, उसे हम नदियों में कचरा, रसायन और प्लास्टिक बहाकर विषैला बना रहे हैं। वायु को उद्योगों और वाहनों के धुएँ से ज़हर बना दिया गया है। अग्नि, जो ऊर्जा का स्रोत है, उसे विनाश और युद्ध का साधन बना दिया गया। आकाश, जो विस्तार और शांति का प्रतीक है, आज धुएँ, उपग्रहों और कचरे से भरता जा रहा है।
यदि हम एक क्षण के लिए कल्पना करें कि पृथ्वी से मनुष्य समाप्त हो जाए तो प्रकृति धीरे-धीरे स्वयं को पुनः संतुलित कर लेगी। शहरों में पेड़ उग आएंगे, इमारतें खंडहर बनकर जंगलों में बदल जाएँगी, नदियाँ स्वतः स्वच्छ हो जाएँगी और वायु फिर से शुद्ध हो जाएगी। यह दर्शाता है कि प्रकृति को हमारे अस्तित्व की आवश्यकता नहीं है।
इसके विपरीत यदि प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है तो मानव जीवन असंभव हो जाएगा। बिना स्वच्छ हवा, जल और भोजन के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान इसका प्रत्यक्ष उदाहरण देखने को मिला, जैसे ही इंसानों की गतिविधियाँ कम हुईं, पर्यावरण में सुधार स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। नदियाँ साफ होने लगीं, आसमान नीला दिखने लगा और पक्षियों की आवाज़ फिर से सुनाई देने लगी। इससे यह साबित होता है कि प्रकृति में खुद को ठीक करने की ताकत होती है।
स्पष्ट है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक हिस्सा है। अब आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी जीवनशैली में बदलाव लाएँ और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलें।
प्रकृति को हमारी जरूरत नहीं है, लेकिन हमें प्रकृति की जरूरत है-इसलिए प्रकृति की रक्षा करना, अपने जीवन की रक्षा करना है।
