Blogआलेख विचारसमय/समाजसामाजिक/ सांस्कृतिक रिपोर्ट

आधुनिक समाज का विरोधाभास: परंपरा और समानता की टकराती दिशाएं

कड़वा सच  :  समाज का आईना आधुनिक समाज का विरोधाभास: परंपरा और समानता की टकराती दिशाएं डॉ रीटा अरोड़ा  …

Blogआलेख विचारयुद्ध/संघर्षसाहित्य/पुस्तक समीक्षा

शब्द बचे रहेंगे: युद्ध और कविता 

युद्ध के विरुद्ध युद्ध-18   कविता हमेशा युद्ध के खिलाफ़ खड़ी रही है, भले ही तानाशाह युद्ध को राष्ट्रवादी गौरव…

Blogआलेख विचारधर्म-संस्कृतिपर्यीवरण/जलवायु

आस्था 2.0: परंपराओं को नहीं, सोच को बदलने का समय

आस्था 2.0: परंपराओं को नहीं, सोच को बदलने का समय डॉ रीटा अरोड़ा समय बदल रहा है, तकनीक बदल रही…

आलेख विचारसाहित्य/पुस्तक समीक्षा

सुशील उपाध्याय का शब्दयात्री (93) – टपोरी: सड़क से संसद तक

 शब्दयात्री (93) – टपोरी: सड़क से संसद तक डॉ. सुशील उपाध्याय   सामान्य परिस्थितियों में यही उम्मीद की जाती है…

Blogआलेख विचार

साम्राज्यवाद दुनिया की सबसे विनाशकारी व्यवस्था

साम्राज्यवाद दुनिया की सबसे विनाशकारी व्यवस्था     मुनेश त्यागी पूरे संसार में सामंतवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद देश दुनिया की…

Blogआलेख विचारसमय/समाज

डिजिटल युग में अनुभव की बदलती परिभाषा: बढ़ता हुआ पीढ़ीगत अंतर

  सामाजिक सरोकार डिजिटल युग में अनुभव की बदलती परिभाषा: बढ़ता हुआ पीढ़ीगत अंतर बदलती दुनिया के साथ खुद को…

Blogआलेख विचारसमय /समाजसाहित्य/पुस्तक समीक्षा

विषमता के बोध की तुलना में वंचना का बोध पैदा करना ज्यादा आसान क्यों है?

विषमता के बोध की तुलना में वंचना का बोध पैदा करना ज्यादा आसान क्यों है?   शंभुनाथ   आखिर लोगों…