रणबीर सिंह दहिया का लेख – साम्प्रदायिकता – इसतै बचकै

साम्प्रदायिकता – इसतै बचकै

 

रणबीर सिंह दहिया

म्हारे देश मैं न्यारे न्यारे धर्मां नै मान्नण आले लोग रहवैं सैं। म्हारी पुरानी सांझी विरासत बहोत मजबूत रही सै। फेर अंग्रेजां नै मजबूती तैं अपना राज चलावण की खातर म्हारी इस सांझी विरासत गेल्यां खूबै छेड़छाड़ करी अर हम भी साम्प्रदायिकता की आन्धी मैं बहते चले गये। आज फेर हटकै इन अलग-अलग धर्मां के लोगां के बीच की एकता नै तोड़ण के लगातार षड्यन्त्र रचे जावैं सैं। मंदिर-मस्जिद के झगड़यां मैं लोगां नै उलझावण के खेल खेल्ले जावैं सैं।

इसे माहौल मैं सब धर्मां मैं एकता बनाए राखण का काम भी एक सार्थक सामाजिक काम सै। साम्प्रदायिक सद्भावना, सहनशीलता अर भाईचारे की भावना का प्रचार-प्रसार करना बहोत जरूरी होग्या। यकीनन इस सूची मैं घणे ए काम जोड़े जा सकैं सैं। आड़ै एक बात साफ करना और बी जरूरी सै अक जड़ै एक सार्थक काम नै निभावण आले लोग जै दूसरे उतने ए सार्थक कै उसतै भी सार्थक काम का विरोध करैं तो इसे लोगां तै दूर रहना बढ़िया सै।

आज के दिन म्हारे समाज मैं कई इसे लोग पाज्यांगे जो अश्लीलता का विरोध करण का काम कै स्वास्थ्य के नियमां नै लोगां तक फैलावण का काम वे अपनी छवि बणावण खातर अर प्रसिद्धि लेवण खातर करैं सैं। फेर जिस काम नै वे बहोत जोर लाकै करैं सैं वो सै भारतीय सभ्यता अर संस्कृति के दो भाइयां मैं – हिन्दुआं अर मुसलमानां मैं अविश्वास अर अशान्ति फैलावण का घृणित काम।

इसे संकीर्ण सोच आले लोग जो बाहरी तौर पै व्यायाम का काम, राहत का काम अर बदेशी कंपनियां के खिलाफ बोलण का काम करैं सैं उनमैं हमने घणी सार्थकता इस करकै नजर नहीं आती अक जो थोड़ा-बहोत दुःख-दरद वे इन कामां नै करकै दूर करैं सैं उसतै घणा फालतू दुःख-दर्द वे साम्प्रदायिक प्रचार द्वारा फैलावैं सैं। जै हम इसे लोगां की साथ रलकै काम करांगे तो हम समाज का दुख-दर्द दूर नहीं करांगे बल्कि इसनै और बढ़ा द्यांगे। इस करकै या तो गांठ बांध लेनी चाहिए अक इसे माणसां गेल्यां मिलकै सार्थक काम हम नहीं कर पावांगे, इनतै दूर रह कै ए हम किमै ढंग का सार्थक काम कर सकां सैं।

साम्प्रदायिकता फैलावण आले संगठन अर संकीर्ण जातिवाद फैलावण आले संगठन इनते बचना चाहिए। फेर जो संगठन किसे जाति मैं सुधार ल्यावण खातर बनाए जावैं सै कै उस जाति के लोगां ने किसे ऊंचे सार्थक सामाजिक काम की खातर संगठित करैं सै ज्यूकर छुआछूत की समस्या हटावण की खातर कै कमजोर वर्ग के तबक्यां की समस्यावां पै ध्यान खींचण खातर उनमैं काम करते हुए हमनै कोए परहेज नहीं होना चाहिए।

हमारे आदर्श का बेहतर निर्वाह किसा काम करे तै होगा इसतै बी महत्वपूर्ण सवाल सै अक कितने युवक-युवतियां सामाजिक बदलाव के काम की खातर आगै आवण नै तैयार सैं। नेपाल मैं टीवी पै देख्या होगा जवान लड़के लड़कियां बहोत घणे शामिल होरे थे। इस बात तै कति इन्कार नहीं करया जा सकदा अक म्हारे समाज पै अन्ध उपभोक्तावाद बुरी तरियां छारया सै। म्हारे जीवन स्तर नै लगातार फालतू तै फालतू खर्चीला बनाणे, ढाल ढाल की आधुनिक सुख-सुविधाएं जुटाने को ही जीवन का एकमात्र ध्येय मान्या जावै सै।
‘ऊपर की कमाई’ जरूरी होगी। ऊपर तै टेलीविजन अर दूसरे प्रसार माध्यमां अर विज्ञापनां के माध्यम तै इस उपभोक्तावाद का जाल बुन्या जावण लागरया सै। इसके साथ ही हिंसा अर नंगेपण के अधिक प्रदर्शन द्वारा भी युवा वर्ग का ध्यान आदर्शां की तरफ तै हटा कै विपरीत दिशा मैं लगाया जावै सै।

जिस ढाल की टीवी पै फिल्मां की भरमार होरी हो सै, उत्तेजक संगीत की दे मार कर राखी सै, उसतै तो योहे लागै सै अक युवा वर्ग ताहिं इस अन्ध उपभोक्तावाद अर उत्तेजक घटिया मनोरंजन के संकीर्ण दायरे मैं जकड़न की साजिश करी जारी सै। या बात साफ तौर पै समझण की सै अक जो युवक-युवतियां सामाजिक बदलाव मैं सार्थक योगदान देना चाहवैं सैं, उनने इस अन्ध उपभोक्तावाद अर उत्तेजक घटिया मनोरंजन के दुष्चक्र तै बाहर आवणा पड़ैगा। सादगी का जीवन अपनाना पड़ैगा।

सादगी का मतलब नीरसता कति नहीं सै। सादे अर सस्ते कपड़े भी बहोत सुरूचिपूर्ण हो सकैं सैं। स्वास्थ्य के नियमों मैं ढला शरीर हो और इसमैं सत्कार्य करने की मुस्कान हो तै इसे चेहरे की खूबसूरती का मुकाबला फिल्मी सितारे कै तारिकायें बी कोन्या कर सकदे। सादगी का दूसरे अर्थां मैं मतलब अक हमनै अंध उपभोक्तावाद का रास्ता त्याग कै इसकी जागां पै कम तै कम उपभोग की चीजां तै काम चलावण की सोच की राही पाक्कड़ ली सै। कम खर्च मैं ए जिन्दगी मैं खूबसूरती पैदा करैं असली मजा तो इसे बात मैं सै। एक खास बात और सै अक जिब सादगी का जीवन अपनावां तो जित ताहिं हो सकै अपने परिवार नै भी इसमैं शामिल जरूर करां।

माता-पिता की सेवा करना युवा वर्ग का फर्ज सै। फेर म्हारे आदर्शवादी युवक-युवतियां खातर यो जिबै तो संभव होवैगा जिब माता-पिता की सोच भी सादगी के जीवन के अनुरूप होवैगी। जै मां-बाप मैं अन्ध उपभोक्तावाद की सोच बनी रही अर वे अपने बेटा-बेटी तै इसकै अनुकूल अपेक्षा करते रहे तो मुश्किल हो ज्यागी। जिन्दगी मैं जरूरी बात पीस्सा कोन्या अर ये सुख-सुविधाएं कोन्या, म्हारे आपसी संबंध अर दुख-दरद बांटना ए जरूरी काम सै। इस बात की छाप युवक-युवतियां अपने परिवार मैं अपने आस-पड़ोस मैं अपने सेवा भाव तै छोड़ सकैं सैं।

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