रमेश जोशी की कविता – दीवाली    

 कविता

दीवाली

(बतर्ज़ : ज्योति कलश छलके)

रमेश जोशी

 

दीवाली पर जेब कट गई |

शोर, धुएँ से फिज़ाँ अट गई |

और पटाखों के सड़कों पर

फैले हैं छिलके | ज्योति कलश छलके |

 

सबके खाली टेंट हो गए |

नोट गिफ्ट की भेंट हो गए |

संबंधों पर जो खर्चे हैं

वे प्राफिट कल के | ज्योति कलश छलके |

 

कैसी अंधी दौड़ चल रही |

सबमें होड़ा-होड़ चल रही |

आँख मूँदकर निबल जनों से

पीछे धन, बल के | ज्योति कलश छलके |

 

कोई काम न करना चाहे |

माल मुफ्त का चरना चाहे |

धर्म-कर्म सब हुआ उपेक्षित

सब आशिक फल के | ज्योतिकलश छलके |

 

निर्धन जन से आँख चुराई |

धनिकों को दे रहे बधाई |

ऊँची, भारी बातें करते

पर मन के हलके | ज्योतिकलश छलके |

 

घर आगे गोबरधन रचते |

गोपालन से बचते फिरते |

गोपाष्टमी खिलाया गुड़

फिर खा कागज, छिलके | ज्योति कलश छलके |

 

रूप चतुर्दशी देह निहारें |

मन की कालिख नहीं उतारें |

भगत नोट के नहा रहे हैं

उबटन मल-मल के | ज्योति कलश छलके |

 

खेलें जुआ, सत्य ना बोले |

करें मिलावट औ’ कम तोलें |

दर्पण में मुँह देख-देखकर

मुड़ -मुड़ कर मुळकें | ज्योति कलश छलके |

 

दो नंबर की लक्ष्मी आई |

पर इसमें आनंद न भाई |

सच्ची लक्ष्मी तब प्रकटे

जब श्रम सीकर झलकें | ज्योति कलश छलके |

 

मुख से बोलें राम-राम सा |

पर स्वारथ से सदा काम सा |

राम मिलेंगे धर्म-न्याय से

पग-पग वन चल के | ज्योति कलश छलके |

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