जमीन किसने दी? (भाग तीन )
केरल, पश्चिम बंगाल और इंदिरा गांधी के भूमि सुधार की तीन अलग कहानियां
ओमप्रकाश तिवारी
भारत में भूमि सुधार की चर्चा होती है तो अक्सर एक सामान्य-सी बात कही जाती है—जमींदारी खत्म हुई, जमीन का बंटवारा हुआ और भूमिहीनों को जमीन मिली। लेकिन असली कहानी इससे कहीं अधिक जटिल है।
केरल का भूमि सुधार एक अलग तरह का था। पश्चिम बंगाल का भूमि सुधार एक अलग तरह का था। और इंदिरा गांधी के दौर में देश के बड़े हिस्से में चलाया गया भूमि-सुधार कार्यक्रम इन दोनों से कई मायनों में अलग था। इन तीनों को एक ही तराजू से तौलना इतिहास को सरल बना देना होगा।
और शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिस व्यक्ति के जीवन में जमीन आने से उसका जीवन बदल गया, उसे आज यह भी याद है कि वह जमीन उसे किस नीति, किस कानून और किस सरकार के माध्यम से मिली थी?
बहुत संभव है कि नहीं।
यही इस कहानी की सबसे बड़ी विडंबना है।
केरल में सवाल था कि जो जमीन जोतता है, जमीन उसी की हो।
1957 में ई.एम.एस. नंबूदिरीपाद के नेतृत्व में केरल में भारत की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार बनी।
भूमि सुधार उसके प्रमुख कार्यक्रमों में था।
सरकार ने सत्ता संभालने के तुरंत बाद किरायेदारों को बेदखली से बचाने की दिशा में कदम उठाया। आगे चलकर केरल लैंड रिफॉर्म्स एक्ट, 1963 और उसके बाद के संशोधनों ने किरायेदारी अधिकारों को मजबूत किया, भूमि पर अधिकतम सीमा तय की और सीमा से अधिक जमीन के अधिग्रहण तथा वितरण की व्यवस्था बनाई। केरल सरकार के अपने भूमि राजस्व विभाग के अनुसार इस कानून के तीन प्रमुख उद्देश्य थे।
1-किरायेदारों को स्थायी अधिकार देना
2- कुदिकिडप्पुकारों के अधिकारों को स्थापित करना
3- सीलिंग से अधिक जमीन पर रोक लगाना। (Department of Land Revenue)
इस मॉडल का मूल विचार था कि जो व्यक्ति जमीन पर खेती कर रहा है, उसे उस जमीन पर स्थायी अधिकार मिलना चाहिए। यानी यहां भूमि सुधार का बड़ा हिस्सा किरायेदारी संबंध को बदलने का था।
किरायेदार से मालिक बनने की यात्रा।
यही वजह है कि केरल के भूमि सुधार को केवल “जमीन बांटने” की योजना समझना गलत होगा। यह ग्रामीण समाज में जमीन के अधिकार और सामाजिक संबंधों को बदलने का प्रयास था।
पश्चिम बंगाल में कहानी थी कि बर्गादार को उसका अधिकार मिले।
पश्चिम बंगाल की कहानी भी दिलचस्प है।
1977 में ज्योति बसु के नेतृत्व में लेफ्ट फ्रंट सरकार सत्ता में आई। इसके बाद भूमि सुधार और ग्रामीण विकेंद्रीकरण सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में रहे।
यहीं से ऑपरेशन बर्गा देश के सबसे चर्चित भूमि-सुधार कार्यक्रमों में आया। लेकिन यहां भी एक जरूरी तथ्य समझना होगा।
ऑपरेशन बर्गा का अर्थ यह नहीं था कि सरकार ने हर भूमिहीन व्यक्ति को जमीन का मालिक बना दिया। बर्गादार यानी बंटाईदार पहले से जमीन पर खेती करता था। समस्या यह थी कि उसके खेती करने के अधिकार की पर्याप्त सुरक्षा नहीं थी।
ऑपरेशन बर्गा ने ऐसे बंटाईदारों का पंजीकरण किया और उन्हें बेदखली से सुरक्षा तथा उपज में निर्धारित हिस्सेदारी जैसे अधिकार दिए।
अर्थात पश्चिम बंगाल का बड़ा प्रयोग था कि जो खेती करता है, उसके खेती करने के अधिकार को दर्ज करो और सुरक्षित करो। इसके साथ अधिशेष भूमि की पहचान और भूमिहीनों में वितरण भी हुआ।
इस पूरी प्रक्रिया में ज्योति बसु के साथ तत्कालीन भूमि एवं भूमि सुधार मंत्री बिनॉय कृष्ण चौधरी की भूमिका महत्वपूर्ण थी। यानी बंगाल में भी केवल जमीन का कागज बदलना उद्देश्य नहीं था। भूमि पर सामाजिक और आर्थिक शक्ति के संबंधों को बदलना उद्देश्य था।
फिर इंदिरा गांधी का मॉडल क्या था?
यहां कहानी बदलती है।
इंदिरा गांधी ने भूमि सुधार शुरू नहीं किया था। भारत में भूमि सुधार की प्रक्रिया उनसे पहले शुरू हो चुकी थी और राज्यों में अलग-अलग कानून बन चुके थे। लेकिन 1970 के दशक में इंदिरा गांधी ने भूमि-सीमा और अधिशेष भूमि के सवाल को राष्ट्रीय राजनीतिक प्राथमिकता के रूप में बहुत अधिक जोर दिया।
23 जुलाई 1972 को मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में भूमि-सीमा घटाने और अधिशेष भूमि को भूमिहीन कृषि मजदूरों, विशेषकर कमजोर वर्गों तक पहुंचाने पर जोर दिया गया। बाद में यही दिशा 20-सूत्रीय कार्यक्रम का भी हिस्सा बनी। 1982 के पुनर्गठित 20-सूत्रीय कार्यक्रम में कृषि भूमि की सीलिंग लागू करने, अधिशेष भूमि बांटने और प्रशासनिक तथा कानूनी बाधाओं को हटाने को स्पष्ट लक्ष्य बनाया गया। (Publications Division)
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।
केरल में प्रमुख सवाल था कि किरायेदार को मालिकाना अधिकार कैसे मिले। बंगाल में प्रमुख सवाल था कि बर्गादार के खेती के अधिकार को कैसे सुरक्षित किया जाए और अधिशेष भूमि कैसे बांटी जाए।
इंदिरा गांधी के दौर में राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा सवाल था कि जिन बड़े भू-स्वामियों के पास कानूनी सीमा से अधिक जमीन है, उस अधिशेष जमीन को निकालकर भूमिहीन ग्रामीण गरीबों तक कैसे पहुंचाया जाए।
इसलिए इंदिरा गांधी के भूमि-सुधार मॉडल को समझने के लिए “अधिशेष भूमि से भूमिहीन तक” की पूरी प्रशासनिक श्रृंखला को समझना जरूरी है।
और यहां आता है “पट्टा”
कई राज्यों में अधिशेष या सरकारी जमीन भूमिहीन गरीबों को आवंटित की गई और उनके पक्ष में पट्टा या अन्य वैधानिक अधिकार दिए गए। उत्तर प्रदेश में अधिशेष भूमि के आवंटन की प्रक्रिया में पट्टा जारी करने की बाकायदा प्रशासनिक व्यवस्था थी। (Indian Kanoon)
यानी बहुत से लोगों के लिए यह कहानी ऐसी थी कि कल तक खेत किसी और का था। आज सरकारी कार्रवाई के बाद उसी जमीन का एक हिस्सा मेरे नाम दर्ज है।
किसी के हाथ में कागज आया।
किसी को पट्टा मिला।
किसी को कब्जा मिला।
किसी को राजस्व रिकॉर्ड में अधिकार मिला।
और उस कागज ने उसके परिवार की सामाजिक स्थिति बदल दी।
लेकिन सबसे दिलचस्प बात यहीं से शुरू होती है
यह काम किसी एक नेता ने गांव-गांव जाकर लोगों को जमीन बांटकर नहीं किया। कानून बना। फिर सरकारी विभाग सक्रिय हुए। सीलिंग तय हुई। जमीन चिन्हित हुई। रिकॉर्ड तैयार हुए। अधिशेष जमीन सरकार के कब्जे में आई। लाभार्थियों की सूची बनी। पट्टे जारी हुए। राजस्व रिकॉर्ड बदले। कब्जा दिलाया गया। और धीरे-धीरे वह जमीन एक परिवार की आर्थिक जिंदगी का हिस्सा बन गई।
भारत सरकार के आंकड़े बताते हैं कि भूमि-सीमा संबंधी कार्यक्रमों के तहत 73.67 लाख एकड़ जमीन को अधिशेष घोषित किया गया, 64.97 लाख एकड़ पर कब्जा लिया गया और 54.03 लाख एकड़ जमीन 57.46 लाख ग्रामीण गरीबों में वितरित की गई। इन लाभार्थियों में 51 प्रतिशत SC/ST थे। (Press Information Bureau)
यह संख्या केवल सरकारी फाइल की संख्या नहीं है।
57.46 लाख ग्रामीण गरीबों के पीछे 57.46 लाख परिवारों की संभावित जीवन-कथाएं थीं। किसी घर में पहली बार जमीन आई होगी। किसी बच्चे ने पहली बार अपने पिता को खेत का मालिक कहते सुना होगा। किसी परिवार ने पहली बार मजदूरी के अलावा अपनी खेती से आय देखी होगी। और किसी ने शायद पहली बार महसूस किया होगा कि वह केवल किसी दूसरे के खेत में काम करने वाला आदमी नहीं है। उसके पास भी जमीन है।
लेकिन क्या उन लोगों को पता था कि यह जमीन आई कहां से?
यहीं इस पूरे इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक विडंबना है। जिस सरकारी कर्मचारी ने पट्टा दिया, वह शायद लाभार्थी को अपना अधिकारी दिखाई दिया। जिस तहसील में कागज बना, वहां बैठे कर्मचारी का चेहरा याद रह गया। जिस स्थानीय व्यक्ति ने सूची में नाम लगवाया, उसका नाम याद रह गया। लेकिन जिस राष्ट्रीय नीति, कानून और राजनीतिक निर्णय ने भूमि-सीमा और अधिशेष भूमि वितरण को इतनी बड़ी प्राथमिकता दी, उसका नाम कितने परिवारों ने याद रखा?
यह एक अलग सवाल है।
क्योंकि सरकारी योजनाओं का एक स्वभाव होता है।
सरकार काम करती है, लेकिन लाभार्थी अक्सर सरकार की पूरी राजनीतिक कहानी नहीं जानता।
उसे यह पता होता है कि मेरे पास जमीन है। लेकिन जरूरी नहीं कि उसे यह पता हो कि यह जमीन किस नीति के कारण मेरे परिवार तक पहुंची।
शायद यही कारण है कि अगली पीढ़ी तक कहानी नहीं पहुंची।
एक परिवार को अगर जमीन मिलती है तो वह उस जमीन को संभालता है। उसमें फसल बोता है। घर बनाता है। बच्चों को पढ़ाता है। उसकी अगली पीढ़ी शहर चली जाती है। फिर जमीन परिवार की संपत्ति बन जाती है।
कुछ वर्षों बाद उस परिवार का बच्चा यह तो जानता है कि यह हमारी जमीन है। लेकिन शायद यह नहीं जानता कि हमारे परिवार के पास यह जमीन आई कैसे? यहां इतिहास और राजनीति के बीच एक बड़ा अंतर पैदा हो जाता है।
संपत्ति परिवार में चली जाती है। लेकिन संपत्ति तक पहुंचाने वाली नीति की स्मृति परिवार में नहीं जाती।
और यही वह बिंदु है जहां इंदिरा गांधी के भूमि-सुधार की राजनीतिक कहानी कमजोर पड़ती दिखाई देती है।
केरल और बंगाल में ऐसा क्यों अलग दिखता है?क्योंकि वहां भूमि सुधार केवल प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं रहा। वह राजनीतिक आंदोलन और सामाजिक संघर्ष की भाषा भी बना।
केरल में भूमि सुधार कम्युनिस्ट राजनीति के व्यापक सामाजिक संघर्ष का हिस्सा था। स्वयं केरल सरकार के ऐतिहासिक विवरण में भूमि सुधार को उस दौर के बड़े सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा गया है। (Kerala Government Portal)
पश्चिम बंगाल में भी भूमि सुधार, बर्गादारों के अधिकार, ग्राम पंचायतों और ग्रामीण राजनीतिक संगठन के बीच मजबूत संबंध बना।
इसलिए वहां लाभार्थी केवल यह नहीं कहता था कि मुझे जमीन मिली। वह यह भी कह सकता था कि हमारे आंदोलन ने हमें अधिकार दिलाया।
यही अंतर राजनीतिक स्मृति में बहुत बड़ा अंतर पैदा करता है।
इंदिरा गांधी के मॉडल में एक विरोधाभास था।
इंदिरा गांधी के दौर में भूमि-सीमा और अधिशेष भूमि वितरण को राष्ट्रीय कार्यक्रम का रूप मिला। लेकिन इसे लागू करने वाला तंत्र मुख्यतः राज्य सरकारों और उनके राजस्व प्रशासन का था। भूमि राज्य विषय होने के कारण वास्तविक कार्यान्वयन राज्यों के कानूनों और प्रशासन पर निर्भर था।
इसलिए दिल्ली में नीति बनी, राजनीतिक दिशा मिली, केंद्र ने प्राथमिकता तय की लेकिन गांव में कागज तहसील बनाया, रिकॉर्ड पटवारी ने संभाला, अधिकारी ने प्रक्रिया पूरी की और जमीन का कब्जा स्थानीय प्रशासन ने दिलाया।
परिणाम?
नीति राष्ट्रीय थी, अनुभव स्थानीय था। और स्मृति भी स्थानीय हो गई। यही कारण है कि बहुत से लोग जमीन को याद रखते हैं, लेकिन उस व्यापक राजनीतिक प्रक्रिया को नहीं।
राजनीति ने भी इस उपलब्धि को उतनी ताकत से याद नहीं कराया।
यहां एक और महत्वपूर्ण बात है।
आज की राजनीति में किसी योजना के साथ नेता का नाम, फोटो, प्रचार और राजनीतिक ब्रांडिंग जुड़ना सामान्य बात है। उस समय भी राजनीतिक प्रचार था, लेकिन कल्याणकारी और विकास कार्यक्रमों को आज की तरह लगातार व्यक्तिगत ब्रांड के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति उतनी सर्वव्यापी नहीं थी।
भूमि सुधार जैसी प्रक्रिया तो और भी जटिल थी। इसमें कोई एक दिन नहीं था जब नेता मंच पर खड़ा होकर लाखों परिवारों को जमीन की चाबी दे रहा हो। यह वर्षों चलने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया थी। इसलिए इसका राजनीतिक प्रभाव भी वैसा दृश्य नहीं बना जैसा किसी बड़े पुल, सड़क या भवन के उद्घाटन का बनता है।
भूमि सुधार का सबसे बड़ा परिणाम शायद सबसे कम दिखाई देने वाला परिणाम था—किसी गरीब परिवार की आर्थिक स्थिति का धीरे-धीरे बदल जाना।
और राजनीति में जो चीज दिखाई नहीं देती, वह अक्सर याद भी नहीं रहती एक सड़क दिखाई देती है।
एक अस्पताल दिखाई देता है। एक बांध दिखाई देता है। एक विश्वविद्यालय दिखाई देता है। लेकिन किसी परिवार के नाम दर्ज जमीन का सामाजिक प्रभाव बाहर से दिखाई नहीं देता।
वह घर के भीतर दिखाई देता है। बच्चे की पढ़ाई में दिखाई देता है। मजदूरी पर निर्भरता कम होने में दिखाई देता है। मुश्किल समय में जमीन बेचने या गिरवी रखने की क्षमता में दिखाई देता है।
और सबसे ज्यादा—आत्मसम्मान में दिखाई देता है।
यही वजह है कि भूमि सुधार को केवल “कितने एकड़ बांटे गए” से नहीं मापना चाहिए।
सवाल यह भी होना चाहिए कि कितने परिवार पहली बार संपत्ति के मालिक बने? कितने परिवारों की सौदेबाजी की ताकत बदली? कितने परिवारों की अगली पीढ़ी की संभावनाएं बदलीं?
केरल, बंगाल और इंदिरा—तीनों को एक साथ देखने पर तस्वीर साफ होती है
केरल ने दिखाया कि किरायेदार को अधिकार देकर ग्रामीण समाज बदला जा सकता है।
पश्चिम बंगाल ने दिखाया कि बंटाईदार को दर्ज और सुरक्षित करके खेती करने वाले की स्थिति बदली जा सकती है।
इंदिरा गांधी के दौर की राष्ट्रीय भूमि-सुधार दिशा ने जोर दिया कि भूमि-सीमा तय करके अधिशेष जमीन को भूमिहीन ग्रामीण गरीबों तक पहुंचाया जाए।
तीनों के तरीके अलग थे। राजनीतिक परिस्थितियां अलग थीं। कानून अलग थे। प्रशासनिक व्यवस्थाएं अलग थीं। लेकिन एक साझा बात थी कि जमीन को केवल उत्पादन का साधन नहीं, सामाजिक शक्ति और आर्थिक सुरक्षा का आधार समझना।
लेकिन एक बड़ा सवाल आज भी बचा हुआ है
अगर किसी गरीब परिवार को जमीन मिली और उस जमीन ने उसका जीवन बदल दिया, तो क्या उसे यह पता होना चाहिए कि वह अधिकार उसे किस ऐतिहासिक प्रक्रिया से मिला?
जवाब हां होना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र केवल वोट याद रखने का नाम नहीं है। लोकतंत्र में नागरिक को यह भी पता होना चाहिए कि उसके जीवन में कौन-से अधिकार किन कानूनों और नीतियों से आए।
अगर किसी परिवार के पास आज वह जमीन है, जिस पर उसके दादा या पिता कभी मजदूर की तरह काम करते थे, तो यह केवल परिवार की कहानी नहीं है।
यह स्वतंत्र भारत के सामाजिक परिवर्तन की कहानी है।
और शायद यही सबसे बड़ी कमी रही।
हमने भूमि सुधार को आंकड़ों में तो रखा। कानून की किताबों में रखा। राजस्व रिकॉर्ड में रखा। सरकारी रिपोर्टों में रखा। लेकिन सार्वजनिक राजनीतिक स्मृति में उतना नहीं रखा।
इसलिए नई पीढ़ी को जमीन याद रही लेकिन जमीन किस प्रक्रिया से मिली, यह याद नहीं रहा।
पट्टा याद रहा लेकिन पट्टा देने वाली नीति याद नहीं रही।
खेत याद रहा लेकिन उस खेत तक पहुंचाने वाला ऐतिहासिक निर्णय याद नहीं रहा।
और यही वह जगह है जहां इतिहास को फिर से पढ़ने की जरूरत है।
जमीन का मालिकाना सिर्फ आर्थिक परिवर्तन नहीं था
भूमि सुधार की असली कहानी यह नहीं है कि सरकार ने कितने एकड़ जमीन बांटी। असली कहानी यह है कि एक व्यक्ति जो कल तक दूसरे के खेत में मजदूर था, वह आज अपने खेत में खड़ा था।
वह खेत छोटा हो सकता था। उत्पादन कम हो सकता था। कागज जटिल हो सकता था। लेकिन उसके पास कुछ ऐसा था जो पहले नहीं था। और वह था मालिकाना अधिकार।
और मालिकाना अधिकार केवल आय नहीं देता। वह आवाज देता है। वह आत्मविश्वास देता है। वह अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षा देता है। और कभी-कभी वह व्यक्ति को यह एहसास भी देता है कि मैं केवल किसी व्यवस्था का लाभार्थी नहीं हूं। इस समाज में मेरा भी हिस्सा है।
केरल ने अपने तरीके से यह किया।
बंगाल ने अपने तरीके से किया।
इंदिरा गांधी के दौर की भूमि-सीमा और अधिशेष भूमि वितरण की राष्ट्रीय दिशा ने अपने तरीके से किया।
इन तीनों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
और उतना ही जरूरी है यह समझना कि जिस अधिकार ने गरीब के जीवन को बदल दिया, उसकी राजनीतिक और ऐतिहासिक स्मृति भी उसके अधिकार जितनी ही महत्वपूर्ण है। क्योंकि जमीन की विरासत अगली पीढ़ी को मिल गई। अब इतिहास की विरासत भी अगली पीढ़ी को मिलनी चाहिए।
