भूमि सुधार, ऊसर सुधार और आत्मनिर्भर भारत की अनकही कहानी

जब जमीन सिर्फ जमीन नहीं थी (भाग- दो )

भूमि सुधार, ऊसर सुधार और आत्मनिर्भर भारत की अनकही कहानी

ओमप्रकाश तिवारी

भारत जैसे कृषि प्रधान समाज में जमीन केवल संपत्ति नहीं होती। जमीन सम्मान है, सुरक्षा है, आत्मनिर्भरता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए भविष्य की गारंटी है।

जिस व्यक्ति के पास अपनी जमीन नहीं होती, वही इस बात को सबसे अच्छी तरह समझ सकता है। खेत का छोटा-सा टुकड़ा उसके लिए केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं होता। वह उसे पहली बार यह अहसास देता है कि उसके पास भी कुछ अपना है—जिस पर उसका अधिकार है, जिसके सहारे वह अपने बच्चों का भविष्य बना सकता है और जिसके कारण समाज में उसका सिर कुछ ऊंचा हो सकता है।

आज की पीढ़ी के लिए शायद यह बात उतनी सहज नहीं है। जिसने भूमिहीनता का दर्द नहीं देखा, जिसने दूसरों के खेत में मजदूरी करके जीवन नहीं बिताया, वह शायद यह समझ भी न पाए कि कभी एक-दो बीघा जमीन मिल जाना किसी गरीब परिवार के जीवन की दिशा बदल देने वाली घटना हुआ करती थी।

यहीं से भारत के भूमि सुधारों का वास्तविक महत्व समझ में आता है।

भूमि सुधार सिर्फ जमीन बांटने का कार्यक्रम नहीं था

आजादी के समय भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में जमीन का वितरण बेहद असमान था। एक ओर बड़े भू-स्वामी और जमींदार थे, दूसरी ओर बड़ी संख्या में ऐसे किसान, काश्तकार और खेतिहर मजदूर थे जिनके पास या तो बहुत कम जमीन थी या अपनी जमीन थी ही नहीं।

आजादी के बाद भूमि सुधारों में जमींदारी और बिचौलिया व्यवस्थाओं का उन्मूलन, काश्तकारी सुधार, भूमि-सीमा कानून, अतिरिक्त भूमि का वितरण, चकबंदी, सरकारी वेस्टलैंड का वितरण और भूमि अभिलेखों को बेहतर बनाने जैसे कई कदम शामिल थे।

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भूमि सुधारों की शुरुआत इंदिरा गांधी से नहीं हुई थी। विभिन्न राज्यों ने आजादी के शुरुआती वर्षों में ही कानून बनाना शुरू कर दिया था।

लेकिन इंदिरा गांधी के दौर में भूमि और ग्रामीण गरीबी के प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीतिक प्राथमिकता का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया। 1975 के 20 सूत्री कार्यक्रम में कृषि भूमि की सीमा को लागू करना और अतिरिक्त जमीन को ग्रामीण गरीबों में बांटना स्पष्ट रूप से शामिल था। 1982 में पुनर्गठित कार्यक्रम में भी कृषि भूमि की सीलिंग और अतिरिक्त भूमि के वितरण को प्रमुख बिंदु बनाया गया।

इसलिए इंदिरा गांधी की भूमिका को समझने का सही तरीका यह नहीं है कि उनसे पहले भूमि सुधार के प्रयास हुए ही नहीं थे। सही बात यह है कि उनके दौर में भूमि सुधार को व्यापक राजनीतिक और प्रशासनिक प्राथमिकता मिली।

अब उन आंकड़ों को देखिए

भारत सरकार के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भूमि-सीमा कानूनों के तहत लगभग 73.67 लाख एकड़ जमीन अतिरिक्त घोषित की गई।

इनमें से 64.97 लाख एकड़ पर सरकार ने कब्जा प्राप्त किया।

और अंततः 54.03 लाख एकड़ जमीन 57.46 लाख ग्रामीण गरीबों में वितरित की गई।

इन लाभार्थियों में लगभग 51 प्रतिशत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से थे।

इन आंकड़ों को केवल एक साथ पढ़कर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं है।

इनका अर्थ समझना जरूरी है।

73.67 लाख एकड़ बताता है कि कानूनों के तहत कितनी जमीन को अतिरिक्त घोषित किया गया।

64.97 लाख एकड़ बताता है कि उसमें से कितनी जमीन वास्तव में सरकारी नियंत्रण में आ सकी।

और 54.03 लाख एकड़ बताता है कि अंततः कितनी जमीन गरीब ग्रामीणों तक पहुंची।

सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा है—57.46 लाख ग्रामीण गरीब।

यह संख्या बताती है कि भूमि सुधार कोई कुछ हजार लोगों तक सीमित प्रशासनिक प्रयोग नहीं था। लाखों ग्रामीण परिवारों को जमीन तक पहुंच देने की कोशिश हुई।

यहां एक सावधानी भी जरूरी है। इन 57.46 लाख को “57.46 लाख परिवारों की पूरी आर्थिक मुक्ति” कहना उचित नहीं होगा। जमीन मिलने के बाद भी सिंचाई, ऋण, बीज, खाद, बाजार और उत्पादकता जैसी समस्याएं बनी रहती थीं।

लेकिन एक बात निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण है—

जिसके पास जमीन नहीं थी, उसके पास अब कम-से-कम उत्पादन का एक आधार आया।

भूमिहीन से भूमिधर बनने का यह परिवर्तन अपने आप में बहुत बड़ा था।

जमीन के साथ क्या आया? सिर्फ फसल नहीं

जिस व्यक्ति के पास जमीन नहीं होती, उसके पास अपनी मेहनत के अलावा बेचने के लिए बहुत कम होता है।

वह दूसरों के खेत में काम करता है। उसकी मेहनत से फसल पैदा होती है, लेकिन उत्पादन के साधन पर उसका स्वामित्व नहीं होता।

अपनी जमीन मिलने के बाद स्थिति बदलती है।

अब उसकी मेहनत और उसकी संपत्ति एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।

वह केवल मजदूर नहीं रहता; वह उत्पादक भी बनता है।

यही कारण है कि भूमि सुधार का महत्व केवल आय बढ़ने में नहीं था।

इससे आर्थिक आत्मविश्वास पैदा हुआ।

वह कह सकता था—

“यह खेत मेरा है।”

यह छोटा-सा वाक्य किसी गरीब परिवार के लिए बहुत बड़ा सामाजिक परिवर्तन था।

किसी सरकारी रिपोर्ट में “आत्मसम्मान” का कॉलम नहीं होता। इसलिए भूमि सुधार से पैदा हुई इस चेतना का कोई सटीक आंकड़ा हमारे पास नहीं है।

लेकिन जमीन का स्वामित्व व्यक्ति के आर्थिक निर्णय, सामाजिक स्थिति और भविष्य की सुरक्षा को प्रभावित करता है—इस बात को ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर हुए अध्ययनों में लगातार रेखांकित किया गया है।

सरकारी वेस्टलैंड भी गरीबों के लिए संपत्ति बनी

भूमि सुधार की कहानी केवल बड़े भू-स्वामियों से अतिरिक्त जमीन लेने तक सीमित नहीं थी।

सरकारी वेस्टलैंड और भूदान की जमीन को भी ग्रामीण गरीबों तक पहुंचाने के प्रयास हुए।

भारत सरकार के अनुसार भूदान में लगभग 39.16 लाख एकड़ जमीन दान में मिली, जिसमें से 21.75 लाख एकड़ वितरित की जा चुकी थी।

सरकारी वेस्टलैंड के वितरण ने भी इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

इससे भूमि सुधार की एक महत्वपूर्ण धारणा सामने आती है—

गरीबी दूर करने के लिए केवल आय देना पर्याप्त नहीं; गरीब को उत्पादन की संपत्ति तक पहुंच देना अधिक स्थायी रास्ता हो सकता है।

आज की भाषा में इसे “asset creation” कह सकते हैं।

उस समय इसका सरल अर्थ था—

गरीब के पास अपनी जमीन हो।

लेकिन जमीन मिल गई तो क्या वह उपजाऊ भी थी?

यहीं से कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण अध्याय शुरू होता है।

भूमि का कागज मिल जाना और उस जमीन से फसल पैदा होना दो अलग बातें हैं।

उत्तर भारत में बड़ी मात्रा में ऐसी जमीन थी जिसे गांवों में ऊसर कहा जाता था। वैज्ञानिक रूप से इसका एक बड़ा हिस्सा सोडिक या लवण प्रभावित भूमि है।

ऐसी मिट्टी में सोडियम और अन्य लवणों की समस्या के कारण मिट्टी की भौतिक और रासायनिक दशाएं फसल के लिए प्रतिकूल हो जाती हैं।

उत्तर प्रदेश में समस्या का पैमाना बहुत बड़ा था। एक ICAR-संबद्ध अध्ययन के अनुसार मध्य गंगा के मैदानी क्षेत्र में लगभग 13.7 लाख हेक्टेयर भूमि सोडिक/लवण प्रभावित थी।

यानी समस्या कुछ गांवों या कुछ किसानों तक सीमित नहीं थी।

लाखों हेक्टेयर जमीन की उत्पादकता प्रभावित थी।

अगर ऐसी जमीन किसी भूमिहीन व्यक्ति को दे भी दी जाए और उसे खेती योग्य न बनाया जाए, तो भूमि स्वामित्व का आर्थिक लाभ अधूरा ही रहता।

इसलिए ऊसर सुधार भूमि सुधार की सामाजिक कहानी का स्वाभाविक अगला चरण था।

ऊसर से गेहूं तक की यात्रा

ऊसर जमीन को खेती योग्य बनाना आसान काम नहीं था।

इसके पीछे वर्षों का कृषि अनुसंधान था—जिप्सम का इस्तेमाल, जल निकास, सिंचाई प्रबंधन, लवण-सहिष्णु किस्में और स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल।

उत्तर प्रदेश में केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान की तकनीकी सहायता से भूमि सुधार कार्यक्रम चलाए गए।

ICAR के शोध के अनुसार 1993 से 2018 के बीच उत्तर प्रदेश में भूमि सुधार निगम ने 3.61 लाख हेक्टेयर भूमि का पुनर्वास किया।

और इस पुनर्वास के दौरान cropping intensity—अर्थात एक ही भूमि से साल में फसल लेने की तीव्रता—46 प्रतिशत के शुरुआती स्तर से बढ़कर 185 प्रतिशत तक पहुंची। शोध में इसे सीमांत और छोटे किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार से जोड़ा गया है।

यह आंकड़ा बेहद महत्वपूर्ण है।

क्योंकि यह केवल यह नहीं कहता कि “ऊसर जमीन सुधारी गई।”

यह बताता है कि सुधरी जमीन का इस्तेमाल कितनी अधिक तीव्रता से होने लगा।

अर्थात खेत सिर्फ बचाया नहीं गया।

वह फिर से अर्थव्यवस्था का सक्रिय हिस्सा बना।

ऊसर सुधार और खाद्यान्न आत्मनिर्भरता

यहीं इस पूरी कहानी का संबंध भारत की खाद्य आत्मनिर्भरता से जुड़ता है।

आजादी के शुरुआती वर्षों में भारत खाद्यान्न के मामले में बेहद कमजोर स्थिति में था। 1950-51 में भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन लगभग 50.8 मिलियन टन, यानी करीब 5.08 करोड़ टन था, जबकि आबादी लगभग 36.1 करोड़ थी।

इसके बाद भारत ने कृषि उत्पादन में जबरदस्त वृद्धि की।

लेकिन यहां इतिहास के साथ ईमानदार रहना जरूरी है।

भारत की खाद्यान्न आत्मनिर्भरता का श्रेय अकेले भूमि सुधार को नहीं दिया जा सकता।

हरित क्रांति, उन्नत बीज, सिंचाई, रासायनिक उर्वरक, कृषि अनुसंधान, किसानों की मेहनत, न्यूनतम समर्थन मूल्य, सरकारी खरीद और सार्वजनिक वितरण व्यवस्था—इन सभी ने मिलकर भारत की खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया।

फिर भूमि सुधार और ऊसर सुधार की भूमिका क्या थी?

भूमि सुधार ने उत्पादन के सामाजिक आधार को व्यापक किया।

ऊसर सुधार ने ऐसी जमीन को उत्पादन में वापस लाने में मदद की जो पहले कम उत्पादक या अनुपयोगी थी।

और इन दोनों प्रक्रियाओं ने ग्रामीण गरीबों को कृषि अर्थव्यवस्था में अधिक प्रत्यक्ष हिस्सेदारी दी।

इसलिए इन्हें हरित क्रांति का विकल्प नहीं, बल्कि ग्रामीण कृषि परिवर्तन की व्यापक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा समझना अधिक उचित है।

गरीबी उन्मूलन का एक अलग रास्ता

गरीबी केवल कम आय का नाम नहीं है।

गरीबी का एक बड़ा कारण यह भी है कि गरीब के पास ऐसी संपत्ति नहीं होती जिसे वह उत्पादन के लिए इस्तेमाल कर सके।

अगर किसी व्यक्ति के पास जमीन नहीं है, तो उसे अपनी मेहनत बेचनी पड़ती है।

अगर उसके पास थोड़ी जमीन है, तो वह अपनी मेहनत को अपनी संपत्ति के साथ जोड़ सकता है।

यही अंतर भूमि सुधारों को गरीबी उन्मूलन से जोड़ता है।

FAO के विश्लेषण में भारत के भूमि सुधारों और ग्रामीण गरीबी में कमी के बीच महत्वपूर्ण संबंध की चर्चा की गई है। इसमें भूमि सुधारों के साथ कृषि मजदूरी बढ़ने के प्रभाव का भी उल्लेख है।

इसका अर्थ यह नहीं कि जमीन पाने वाला हर व्यक्ति गरीबी से बाहर निकल गया।

लेकिन इसका अर्थ यह जरूर है कि ग्रामीण गरीब के आर्थिक विकल्प बढ़े।

और आर्थिक विकल्प बढ़ना गरीबी से निकलने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इसका असर केवल जमीन पाने वाले किसान पर नहीं पड़ा

भूमि सुधारों का एक और प्रभाव था जिसे अक्सर भुला दिया जाता है।

इसने ग्रामीण श्रम बाजार को भी प्रभावित किया।

जिस भूमिहीन मजदूर के पास कोई विकल्प नहीं था, वह अपनी मजदूरी को लेकर अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में था।

लेकिन जब उसके पास अपनी जमीन आई, तो वह अपने श्रम का कुछ हिस्सा अपने खेत में लगा सकता था।

इससे बड़े भू-स्वामी के लिए उपलब्ध सस्ते श्रम की स्थिति बदल सकती थी।

इसीलिए भूमि सुधार सिर्फ भूमि संबंधों में बदलाव नहीं था।

वह श्रम संबंधों में भी बदलाव था।

पुराने ग्रामीण समाज में जमीन और श्रम दोनों सत्ता के साधन थे।

जमीन का वितरण व्यापक हुआ तो उस सत्ता-संतुलन में भी परिवर्तन की संभावना पैदा हुई।

इसलिए भूमि सुधार का राजनीतिक विरोध भी स्वाभाविक था

यहां इतिहास को भावनात्मक नहीं, सामाजिक संरचना के नजरिए से समझना चाहिए।

अगर किसी बड़े भू-स्वामी की अतिरिक्त जमीन भूमि-सीमा कानून के तहत चली जाती है और वही जमीन किसी भूमिहीन परिवार को मिलती है, तो दोनों पक्षों का आर्थिक हित एक जैसा नहीं हो सकता।

एक के लिए वह संपत्ति का नुकसान है।

दूसरे के लिए जीवन का अवसर।

इसी तरह यदि भूमिहीन मजदूर के पास अपनी जमीन आ जाती है तो वह पहले जैसी मजदूरी शर्तों को स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं रह सकता।

इसलिए भूमि सुधारों ने ग्रामीण समाज के पुराने शक्ति-संबंधों को चुनौती दी।

इसे किसी जाति या पूरे सामाजिक समूह के खिलाफ आरोप के रूप में नहीं देखना चाहिए। हर भू-स्वामी या जमीन गंवाने वाले व्यक्ति का राजनीतिक व्यवहार एक जैसा नहीं था।

लेकिन संरचनात्मक रूप से यह कहना उचित है कि जिन प्रभावशाली समूहों के आर्थिक हित प्रभावित हुए, उनमें भूमि सुधारों के प्रति प्रतिरोध की संभावना स्वाभाविक थी।

यही कारण है कि भूमि सुधार सिर्फ कृषि नीति नहीं थे।

वे सामाजिक सत्ता के पुनर्वितरण की प्रक्रिया भी थे।

फिर कांग्रेस को इसका पूरा राजनीतिक लाभ क्यों नहीं मिला?

यह सवाल दिलचस्प है।

कांग्रेस ने जमींदारी उन्मूलन, भूमि सुधार, ग्रामीण विकास और गरीबी उन्मूलन की दिशा में महत्वपूर्ण कार्यक्रम चलाए। इंदिरा गांधी के 20 सूत्री कार्यक्रम में भी भूमि-सीमा कानून लागू करने और अतिरिक्त जमीन बांटने को स्पष्ट प्राथमिकता दी गई।

लेकिन जिस सामाजिक परिवर्तन को इन नीतियों ने जन्म दिया, उसका राजनीतिक लाभ हमेशा उसी अनुपात में कांग्रेस को नहीं मिला।

इसके कई कारण थे।

पहला—भूमि पाने वाले लोग कोई एक समान राजनीतिक समूह नहीं थे। उनकी जाति, क्षेत्र, सामाजिक स्थिति और स्थानीय राजनीतिक निष्ठाएं अलग-अलग थीं।

दूसरा—जिन प्रभावशाली ग्रामीण समूहों के हित प्रभावित हुए, वे कई क्षेत्रों में राजनीतिक रूप से अधिक संगठित थे।

तीसरा—भूमि सुधारों का प्रभाव धीरे-धीरे दिखाई देता था। जमीन मिलने के बाद उसका सामाजिक और आर्थिक प्रभाव वर्षों और पीढ़ियों में सामने आता है।

चौथा—उस दौर की राजनीति में आज की तरह हर सरकारी उपलब्धि को किसी एक नेता की व्यक्तिगत ब्रांडिंग से जोड़ने की संस्कृति नहीं थी।

यह कहना सही नहीं होगा कि तब नेता श्रेय नहीं लेते थे। राजनीति तब भी थी और उपलब्धियों का प्रचार भी होता था।

लेकिन आज के मुकाबले योजना, संस्था और राज्य की भूमिका की भाषा अधिक महत्वपूर्ण थी।

जमीन पाने वाला व्यक्ति हमेशा यह नहीं कहता था कि “फलां नेता ने मुझे जमीन दी।”

वह यह भी कह सकता था—

“सरकार के कानून से मुझे मेरा हक मिला।”

और शायद यही किसी लोकतांत्रिक कल्याणकारी व्यवस्था की अधिक स्वस्थ परिणति है।

काम ऐसा हो कि लाभार्थी को हमेशा लाभार्थी न रहना पड़े

आज “लाभार्थी” शब्द भारतीय राजनीति में बहुत सामान्य हो गया है।

लेकिन भूमि सुधारों की मूल भावना को देखें तो उसका लक्ष्य गरीब को हमेशा किसी योजना का लाभ लेने वाला व्यक्ति बनाए रखना नहीं था।

लक्ष्य था उसे अधिकार और संपत्ति देना।

इस फर्क को समझना बहुत जरूरी है।

एक योजना आपको कुछ समय के लिए मदद दे सकती है।

लेकिन जमीन आपको उत्पादन का साधन दे सकती है।

एक अनुदान आपकी तत्काल जरूरत पूरी कर सकता है।

लेकिन संपत्ति आपके परिवार की अगली पीढ़ी की स्थिति बदल सकती है।

इसीलिए भूमि सुधार को केवल कल्याणकारी कार्यक्रम नहीं, संपत्ति के सामाजिक पुनर्वितरण के रूप में भी देखना चाहिए।

और ऊसर सुधार ने उस अधिकार को उत्पादन में बदला

भूमि सुधार का पहला सवाल था—

“जिसके पास जमीन नहीं है, उसे जमीन कैसे मिले?”

ऊसर सुधार का सवाल था—

“जिस जमीन पर कुछ उगता नहीं, उस पर फसल कैसे उगे?”

पहले ने स्वामित्व और अधिकार का प्रश्न उठाया।

दूसरे ने उत्पादकता का।

एक ने गरीब को जमीन से जोड़ा।

दूसरे ने जमीन को उत्पादन से।

और जब दोनों प्रक्रियाएं साथ आती हैं, तभी जमीन वास्तव में आजीविका का साधन बनती है।

यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में 3.61 लाख हेक्टेयर सोडिक भूमि का पुनर्वास और cropping intensity का 46 से 185 प्रतिशत तक बढ़ना केवल कृषि विभाग का आंकड़ा नहीं है। यह बताता है कि जिस जमीन को कभी कम उत्पादक समझा जाता था, उसे फिर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सक्रिय रूप से लगाया गया।

आंकड़े बताते हैं कि यह परिवर्तन कितना बड़ा था

इस पूरी कहानी को चार आंकड़ों में समझने की कोशिश कीजिए—

73.67 लाख एकड़ — भूमि-सीमा कानूनों के तहत अतिरिक्त घोषित जमीन।

54.03 लाख एकड़ — ग्रामीण गरीबों में वास्तव में वितरित जमीन।

57.46 लाख — वे ग्रामीण गरीब जिन तक यह वितरित भूमि पहुंची।

3.61 लाख हेक्टेयर — 1993 से 2018 के बीच उत्तर प्रदेश में पुनर्वासित सोडिक भूमि।

ये केवल सरकारी आंकड़े नहीं हैं।

इनके पीछे खेत हैं।

इन खेतों के पीछे परिवार हैं।

और उन परिवारों के पीछे एक पीढ़ी का संघर्ष है।

73.67 लाख एकड़ हमें बताता है कि परिवर्तन के लिए कितनी जमीन चिन्हित हुई।

54.03 लाख एकड़ बताता है कि उसका कितना हिस्सा गरीबों तक पहुंचा।

57.46 लाख लाभार्थी बताते हैं कि इसका सामाजिक दायरा कितना बड़ा था।

और 3.61 लाख हेक्टेयर ऊसर भूमि का पुनर्वास बताता है कि केवल जमीन देना ही पर्याप्त नहीं समझा गया—उसे उत्पादक बनाने की कोशिश भी हुई।

नई पीढ़ी को क्या याद रखना चाहिए?

आज जमीन की कीमत लाखों-करोड़ों रुपये में सुनाई देती है।

लेकिन जमीन का महत्व उसकी बाजार कीमत से कहीं अधिक है।

किसी बुजुर्ग किसान से पूछिए जिसने जीवन भर दूसरों के खेत में काम किया और फिर उसे अपनी जमीन मिली।

वह शायद आपको जमीन की कीमत रुपये में नहीं बताएगा।

वह कहेगा—

“अब किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं थी।”

यही भूमि सुधार का असली अर्थ है।

और जब उसी जमीन पर, जो कभी ऊसर थी, गेहूं की बालियां लहलहाने लगीं तो वह केवल कृषि उत्पादन में वृद्धि नहीं थी।

वह उस परिवार के आत्मविश्वास की वापसी थी।

इतिहास को पार्टी की नजर से नहीं, समाज की नजर से देखिए

इंदिरा गांधी की राजनीति का मूल्यांकन अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से करेंगे। उनके शासन के विवादित अध्याय भी इतिहास का हिस्सा हैं और उन्हें भुलाया नहीं जाना चाहिए।

लेकिन किसी राजनीतिक नेता के पूरे मूल्यांकन को केवल एक अध्याय तक सीमित कर देना भी इतिहास के साथ न्याय नहीं है।

इसी तरह किसी सरकार की उपलब्धि को केवल इसलिए नकार देना कि आज उससे राजनीतिक असहमति है, इतिहास को छोटा करना होगा।

भूमि सुधारों के बारे में भी यही बात लागू होती है।

इनकी सीमाएं थीं।

हर जगह कानून प्रभावी ढंग से लागू नहीं हुए।

कई जगह अतिरिक्त भूमि का वितरण अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचा।

भूमि सुधारों के परिणाम राज्यों में बहुत अलग-अलग रहे।

लेकिन जहां परिवर्तन हुआ, उसे भी इतिहास में दर्ज किया जाना चाहिए।

क्योंकि लाखों एकड़ जमीन का स्वामित्व बदलना और लाखों ग्रामीण गरीबों को जमीन तक पहुंच देना कोई मामूली प्रशासनिक घटना नहीं थी।

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कांग्रेस की एक अनकही राजनीतिक विडंबना

शायद इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी राजनीतिक विडंबना यही है कि जिस सामाजिक परिवर्तन को कांग्रेस की सरकारों ने आगे बढ़ाया, उसका लाभ कांग्रेस हमेशा राजनीतिक रूप से नहीं उठा सकी।

जिन भूमिहीनों को जमीन मिली, वे जरूरी नहीं कि हमेशा कांग्रेस के मतदाता बने रहें।

और जिन प्रभावशाली समूहों के आर्थिक हित प्रभावित हुए, वे कई जगह कांग्रेस से दूर भी हुए।

अर्थात भूमि सुधार ने समाज को बदला, लेकिन राजनीति का समीकरण उसी अनुपात में कांग्रेस के पक्ष में स्थायी नहीं हुआ।

यही लोकतंत्र की जटिलता है।

सरकार कोई नीति बनाती है।

समाज बदलता है।

नए वर्ग पैदा होते हैं।

पुराने वर्गों की शक्ति बदलती है।

और फिर वही बदला हुआ समाज नई राजनीतिक शक्तियां पैदा करता है।

इस अर्थ में भूमि सुधारों ने केवल खेतों की मेड़ नहीं बदली।

उन्होंने ग्रामीण भारत की सामाजिक और राजनीतिक संरचना को भी धीरे-धीरे बदलने में भूमिका निभाई।

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सबसे बड़ी विरासत वोट नहीं, आत्मनिर्भरता है

आज अगर इन योजनाओं का मूल्यांकन केवल इस आधार पर किया जाए कि इससे कांग्रेस को कितने वोट मिले, तो हम इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से को खो देंगे।

बड़ा सवाल यह है—

क्या भूमिहीनों को जमीन मिली?

क्या जमीन खेती में आई?

क्या ऊसर जमीन का बड़ा हिस्सा उत्पादक बना?

क्या ग्रामीण गरीब की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई?

क्या कृषि मजदूरी और bargaining power में बदलाव आया?

क्या देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत हुई?

और क्या लाखों लोगों के भीतर यह चेतना पैदा हुई कि वे केवल किसी के खेत में काम करने वाले मजदूर नहीं, बल्कि अपने खेत के मालिक भी हो सकते हैं?

इन सवालों का उत्तर आंकड़ों और शोध से तलाशना चाहिए।

भारत की खाद्यान्न आत्मनिर्भरता अनेक कारकों का परिणाम थी—किसान, वैज्ञानिक, हरित क्रांति, सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरक, सरकारी खरीद और कृषि नीति। लेकिन भूमि सुधार और ऊसर सुधार ने ग्रामीण समाज के उस हिस्से को भी उत्पादन की प्रक्रिया में जोड़ा, जो पहले संपत्ति और उत्पादक संसाधनों से बहुत दूर था।

यही इनकी ऐतिहासिक भूमिका है।

जमीन की कहानी आखिरकार इंसान की कहानी है

किसी भी समाज का इतिहास केवल संसदों, चुनावों और बड़े नेताओं की कहानी नहीं होता।

कभी-कभी इतिहास गांव की सबसे छोटी मेड़ पर लिखा होता है।

वह उस किसान के चेहरे पर लिखा होता है जिसने पहली बार अपनी जमीन पर हल चलाया।

उस परिवार की आंखों में लिखा होता है जिसने पहली बार अपने खेत की फसल घर में रखी।

और उस बच्चे के भविष्य में लिखा होता है जिसके पिता को अब केवल दूसरों के खेत की मजदूरी पर निर्भर नहीं रहना पड़ा।

इसलिए भूमि सुधार और ऊसर सुधार को याद रखना किसी नेता की पूजा करना नहीं है।

यह उन लाखों परिवारों की यात्रा को याद रखना है जो भूमिहीनता से स्वामित्व, अनुपजाऊ जमीन से उत्पादन और निर्भरता से आत्मविश्वास की ओर बढ़े।

एक एकड़ के पीछे एक परिवार था।
एक खेत के पीछे एक आत्मसम्मान था।
एक ऊसर जमीन के पीछे एक अधूरा सपना था।
और उस जमीन में गेहूं की पहली बालियां उगना केवल फसल का उगना नहीं था—वह एक जीवन के फिर से खड़े होने की कहानी थी।

शायद भूमि सुधार की सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी कि उसने गरीब को केवल यह नहीं कहा कि “तुम्हें मदद मिलेगी।”

उसने, जहां वह सफल हुआ, उससे कहीं बड़ा संदेश दिया—

“यह जमीन तुम्हारी है। अब इसे अपने श्रम से उपजाओ और अपने बच्चों का भविष्य बनाओ।”

और यही वह विरासत है जिसे राजनीतिक नारों से ज्यादा, इतिहास के तथ्यों और आंकड़ों के साथ याद किए जाने की जरूरत है।
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