समय समाज
मनुवाद की सीढ़ियों पर स्त्री
रत्ना भदौरिया
मनुवादी व्यवस्था की चर्चा होती है तो अक्सर बहस जाति की सीढ़ियों पर अटक जाती है—कौन ऊपर था, कौन नीचे; किसे अधिकार मिला, किससे अधिकार छीना गया। लेकिन इस सीढ़ी की एक दूसरी कहानी भी है, जिसे पढ़े बिना इतिहास अधूरा रह जाता है। वह कहानी उस स्त्री की है जो सीढ़ी के किसी भी पायदान पर खड़ी रही हो, उसके हिस्से में स्वतंत्र आकाश अक्सर पूरा नहीं आया।
सिर्फ दलित स्त्रियाँ ही नहीं, सवर्ण घरों की स्त्रियाँ भी उस सामाजिक संरचना के भीतर पिसती रही हैं जिसने उनके लिए जीवन की सीमाएँ जन्म से तय कर दी थीं। जाति ने किसी को ऊँचा स्थान दिया हो सकता है, लेकिन ऊँची जाति के घर में जन्म लेना स्त्री को अपने आप स्वतंत्र नहीं बनाता था। जिस घर को समाज प्रतिष्ठा का घर कहता था, उसी घर की स्त्री के लिए वह कई बार अनुशासन की चारदीवारी भी था।
बेटी पैदा हुई तो उसके लिए संस्कार तैयार थे।
उसे सिखाया गया—घर कैसे चलता है, बड़ों के सामने कैसे बैठना है, कैसे बोलना है, कितना बोलना है, किससे बोलना है। उसके हाथों में काम दिया गया और उसकी इच्छाओं पर मर्यादा रख दी गई। उसकी शिक्षा यदि हुई भी तो कई बार शिक्षा का अंतिम लक्ष्य स्वतंत्र मनुष्य बनना नहीं, ‘अच्छी पत्नी’ बनना था।
फिर विवाह आया।
जिस बेटी को पिता के घर में मर्यादा का पाठ पढ़ाया गया था, वही दूसरे घर में जाकर सेवा की परीक्षा देने लगी। वहाँ उसका श्रम प्रेम कहलाया, उसका त्याग संस्कार और उसकी चुप्पी समझदारी। घर चलाने वाली स्त्री को घर की स्वामिनी कह दिया गया—मानो किसी पद का नाम बदल देने से अधिकार भी बदल जाता हो।
उससे घर सँभालने की अपेक्षा की गई, पर घर के निर्णयों में उसकी बराबर की आवाज़ हमेशा सुनिश्चित नहीं हुई।
उसकी देह विवाह का हिस्सा बनी, उसकी मातृत्व क्षमता परिवार की निरंतरता का साधन बनी और उसका जीवन धीरे-धीरे दूसरों की आवश्यकताओं के इर्द-गिर्द व्यवस्थित होता गया।
विडंबना यह है कि जिस व्यवस्था ने स्त्री को ‘घर की इज्जत’ कहा, उसने उसे उसी घर में मनुष्य की पूरी स्वतंत्रता देने से परहेज किया।
स्त्री को सम्मान दिया गया, बराबरी नहीं।
यही फर्क सबसे अधिक निर्णायक है।
क्योंकि सम्मान का दावा कई बार अधिकार की कमी को ढँक देता है। स्त्री को देवी कह देना आसान है; उसे बराबर का मनुष्य स्वीकार करना कठिन। देवी से त्याग माँगा जा सकता है, मनुष्य से नहीं। देवी को pedestal पर रखा जा सकता है, मनुष्य को साथ बैठाना पड़ता है।
और शायद इसी कारण स्त्री के लिए सबसे सुविधाजनक जेल वह रही है जिसकी दीवारों पर ‘संस्कार’ लिखा हो।
लेकिन इस कहानी का दूसरा सिरा भी है।
सवर्ण स्त्री केवल पीड़िता नहीं थी। वह कभी-कभी उसी व्यवस्था की संरक्षक भी बनी। उसने बहू से वही अपेक्षा की जो कभी उससे की गई थी। उसने बेटी के लिए वे ही मर्यादाएँ चुनीं जिनसे स्वयं बंधी रही। उसने अगली पीढ़ी को वही नियम सौंपे जिनके भीतर उसकी अपनी इच्छाएँ दम तोड़ती रही थीं।
यह विरोधाभास स्त्री के चरित्र का दोष नहीं, व्यवस्था की गहराई का प्रमाण है।
शोषण जब पीढ़ियों तक संस्कार बनकर पहुँचता है, तो पीड़ित भी कभी-कभी उसका प्रहरी बन जाता है।
यही कारण है कि मनुवादी मानसिकता का विरोध केवल पुरुषों से सवाल पूछकर पूरा नहीं होगा। उस मानसिकता को घर के भीतर पहचानना होगा—उस माँ के वाक्य में भी, जो बेटी को चुप रहना सिखाती है; उस सास की अपेक्षा में भी, जो बहू के श्रम को उसका धर्म मानती है; उस परिवार की प्रतिष्ठा में भी, जो स्त्री की इच्छा से बड़ी हो जाती है।
लेकिन यहाँ सावधानी भी जरूरी है।
इस इतिहास को केवल सवर्ण स्त्री की पीड़ा कह देना भी अधूरा होगा। दलित स्त्री के हिस्से में जाति, श्रम और पितृसत्ता के कई गुना कठोर अनुभव रहे हैं। इसलिए स्त्री के प्रश्न को जाति से काटकर देखना गलत है और जाति को स्त्री के प्रश्न पर पूरी तरह आरोपित कर देना भी।
स्त्री की पीड़ा एकरंगी नहीं है।
किसी के हिस्से में पर्दा आया, किसी के हिस्से में खेत का श्रम; किसी के हिस्से में घर की चारदीवारी आई, किसी के हिस्से में घरों में काम करने की विवशता। किसी की देह पर परिवार की इज्जत का पहरा था, किसी की देह पर श्रम और जाति का बोझ।
इसलिए स्त्री-मुक्ति का प्रश्न किसी एक जाति को दोषी ठहराकर समाप्त नहीं किया जा सकता।
असल सवाल यह है कि हम स्त्री को आखिर कब उसकी भूमिका से अलग करके मनुष्य की तरह देखेंगे?
कब बेटी केवल किसी कुल की मर्यादा नहीं होगी?
कब पत्नी केवल किसी पुरुष के जीवन की व्यवस्था नहीं होगी?
कब बहू केवल घर के श्रम की नई नियुक्ति नहीं होगी?
और कब माँ अपने बच्चों के भविष्य के साथ अपने वर्तमान पर भी अधिकार रखेगी?
मनुवादी मानसिकता का सबसे गहरा अवशेष शायद वही है जहाँ स्त्री से पूछा नहीं जाता कि वह क्या चाहती है—उसके लिए तय कर दिया जाता है कि उसे क्या चाहना चाहिए।
यही वह जगह है जहाँ विरोध शुरू होना चाहिए।
क्योंकि स्त्री को घर देना पर्याप्त नहीं है।
उसे अपने घर के भीतर अपनी इच्छा का अधिकार देना होगा।
उसे सम्मान देना पर्याप्त नहीं है।
उसे निर्णय में बराबरी देनी होगी।
उसे देवी कहना पर्याप्त नहीं है।
उसे मनुष्य मानना होगा।
