गोवा डायरी 2026 (7): पांचवां दिन दूसरा प्रहर –
एक अलग गोवा से गुजरना
संजय श्रीवास्तव
पालोलेम गोवा का का सबसे आखिरी प्वाइंट तो नहीं कहा जा सकता लेकिन तब भी यहां आते आते गोवा का बहुत शांत और सुकून वाला रंग तो जरूर घुला मिलता है. हालांकि इसके आगे गोवा का एक और समुद्र तट है पोलम, जो गोवा और कर्नाटक की सीमा के करीब है. हम वहां तो नहीं गए, पालोलेम से वापस लौट पड़े. हमने यहां से पुर्तगालियों द्वारा समुद्र के किनारे बनवाए काबो दे रामा किले की ओर जाने का फैसला किया. पुख्ता तौर पर कह सकता हूं कि ये रास्ता बहुत खूबसूरत है. रास्ते में समुद्र कुछ दूर तक आपके साथ कुछ दूरी पर चलता है, समुद्र से सटी मीठे पानी की लैगून मिलती है, मनोहारी प्रकृति मिलती है. शांत सड़क और अपनी ही जिंदगी में मग्न गांव. अच्छा ही किया जो मैंने रेंट पर कार ली और वो भी खुद ड्राइव करने के लिए. इससे गोवा के दो दिन में मेरी घुमक्कड़ी का अंदाज और शानदार हो गया. …अन्यथा मैं कैसे उस सड़क पर ड्राइव कर पाता, जो पग पग पर लैंडस्केप के दर्शन कराती हुई मोहित कर रही थी.
पालोलेम से काबो दे रामा फोर्ट करीब 40 किमी है. इस किले को सदियों पुराना कहा जाता है, क्योंकि ये पुर्तगालियों के आने से पहले स्थानीय हिंदू शासकों का किला था. पुर्तगालियों ने 1763 में सोंडा के राजा से इसे अपने कब्जे में लिया और इसके बाद इसे फिर से बनाया. यानि मौजूदा पुर्तगाली किले के अवशेष भी करीब ढाई सदियों से ज्यादा पुराने हैं. इसके नाम के साथ राम का नाम जुड़ने की भी एक कहानी है. वैसे ये किला पुर्तगालियों के लिए समुद्र और तट पर नजर रखने वाला महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाना था, जिससे वो समुद्री हलचल की टोह लेते रहते थे. बाद में इसे जेल भी बना दिया गया.

खैर, पहले मेरे साथ पालोलेम से काबो दे रामा तक की सड़क यात्रा पर साथ साथ ही निकलते हैं. इस रास्ते को साउथ गोवा की सबसे सुंदर कोस्टल ड्राइव्स में एक कहा जा सकता है. अगर बारिश हो रही हो तो आनंद ही आनंद, क्योंकि तब नेचर का जादू और पतली काली रोड दोनों मिलकर बड़ा जादू रचते हैं. कुछ देर समुद्र साथ चलता है, फिर ओझल हो जाता है लेकिन होता आसपास ही है. सड़क लगातार लेटराइट चट्टानों, छोटे गांवों के बीच से निकलती है. कभी किसी मोड़ पर अरब सागर भी अचानक सामने आ जाता है. नारियल के पेड़ और हरियाली तो हर जगह ही हाथ हिलाती मिलती है.

पालोलेम से चलते ही रास्ते में पहले एक रास्ता बटरफ्लाई बीच की ओर कटता है, यहां तितलियों और डाल्फिन मिल जाती हैं. हम उधर नहीं गए. फिर कोला बीच पड़ता है. हम गुजरे कोला में ही समुद्र से सटी मीठे पानी की लैगून के ऊपर बने पुल से. किनारे नावें खड़ी थीं. कुछ झोपड़ियां और कॉटेज. जैसे ही मैंने इसको देखा तुरंत कार रोक दी. मंत्रमुग्ध सा इस जगह को देखता रह गया. फिर धन्यवाद उस आविष्कार को जिसने कभी कैमरे की शादी मोबाइल के साथ कराई होगी. इसने हम सबको वो हर खूबसूरत चीज में कभी भी कहीं भी क्लिक करने से लैस कर दिया. तो कोला की मीठे पानी की लैगून ऐसी जगह है, इसे ब्लू लैगून या इमराल्ड लैगून भी कहते हैं.
अब रास्ता धीरे धीरे बहुत शांत होता चला जाता है. कुछ कारें सामने से गुजरती हैं और कुछ बहुत तेजी में लग रहे पीछे से वाहन चालक. खेत, चट्टानी समतल से मैदान, रास्ते में कुछ ऊपर नीचे. फिर एक रफ की 200 – 400 मीटर की रोड, यहां समुद्र थोड़ा ऊपर नजर आता है. बस इससे मुश्किल 300 मीटर दूर ही काबो दे रामा खड़ा है. सड़क के दोनों ओर कारों की लंबी पार्किंग.
इस किले का प्रवेश द्वार पारंपरिक किले से ज्यादा किसी बड़े मकान का गेट लगता है. साथ पत्थर की दीवार की मजबूत चारदीवारी, जो ढाई सदियों से अटल अचल है. अंदर एक बड़े कमरे से गुजरते ही अंदर सबकुछ खुला खुला. एक चर्च. थोड़ा आगे चारदीवारी के बीच नीचे की ओर उतरती और समुद्र से मिलती सी सीढ़ियां. एक ओर ऊपर किले का ऊपरी सिरा, जहां चौड़ी और कुछ ऊंची सीढ़ियां ले जाती हैं. ऊपर पहुंचते ही उत्तर और दक्षिण की ओर समुद्र का दायरा फैला नजर आता है. दरअसल इस किले से पुर्तगाली समुद्र में हर आते जाते जहाज और नावों पर नजर रखते थे. ये किला तोपों से लैस उनका महत्वपूर्ण ठिकाना था. हालांकि इसे बनाना कतई आसान नहीं रहा होगा. किले के पुर्तगाली दौर के अवशेष और तोपें आज भी वहां मौजूद हैं.
अब इस किले का रिश्ता राम से क्या था, जो इसके नाम से राम को भी जोड़ दिया गया. कहते हैं कि वनवास के दौरान राम और सीता ने इस समुद्री जगह पर कुछ समय बिताया था, यहां आश्रय लिया था. गोवा सरकार भी किले के नाम को इसी स्थानीय मान्यता से जोड़ती है. इतिहास इस कथा की पुष्टि नहीं करता, लेकिन लोकविश्वास आज भी इसके साथ जुड़ा हुआ है.
किले से बाहर निकलने पर बाहर कुछ छोटी दुकानें और एक दो बड़े रेस्तरां हैं. यहां कई तरह के जूस मिल जाएंगे. नारियल पानी मिल जाएगा लेकिन दिल्ली की तरह यहां भी नारियल पानी 70 रुपए का ही. ये बात समझ में नहीं आई. नारियल विपुल इस जगह में आखिर क्यों ये इतना महंगा.
करीब तीन बजने वाले थे. हमें अब यहां से चांदोर जाना था, कहा जाता है कि सदियों पुराना पुर्तगाली वैभव और स्थापत्य कला वहां अब भी फोंटेनहास की तरह ही नजर आती है. चर्च के आसपास का एरिया बहुत सुंदर, विहंगम और खुला लगता है, पुराने स्मारकों और स्तंभों के बीच ऊंचा सा भव्य गंभीर सा चर्च. लेकिन चांदोर की कहानी सिर्फ पुर्तगाली दौर से शुरू नहीं होती. इसका पुराना नाम चंद्रपुर था और यह भोज तथा बाद में कदंबों के दौर में एक महत्वपूर्ण राजधानी रहा है.
बताने को ये भी है कि जब हम काबो दे रामा से चले तो चांदोर वहां से करीब 35 किलोमीटर था. ये रास्ता हमें और अनदेखे गोवा के अंदर लग गया. ये इतना शांत और गांवनुमा था कि हमें शक होता था कि हम सही रास्ते पर जा रहे हैं ना. चांदोर वैसे गोवा से कहीं ज्यादा पुराना है. यहां 17वीं सदी की ब्रिगेंजा परिवार की बहुत भव्य हवेली और 200 साल पुरानी कुछ और हवेलियां हैं. ब्रिगेंजा हाउस गांव के चौक की एक पूरी तरफ फैली हुई विशाल हवेली है और अब दो पारिवारिक हिस्सों में बंटी हुई है.
संजय श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से साभार
